चल रही इस जिंदगी की
राह कब ये रूठ जाए
बुलबुला पानी का ये जो
जाने कब ये फूट जाए
लोभ के बंधन में बंदकर
लूटते अपने को ही हम
मोह जालों में फंसकर
मारते अपने को ही हम
जाल मकडी से बुने हैं
सांस कब ये टूट जाए
चल रही इस जिंदगी की
राह कब ये रूठ जाए
बुलबुला पानी का ये जो
जाने कब ये फूट जाए
काम का कीड़ा पनपता
तन को करता रोज घायल
प्रेम प्राण तक ना पुहुचा
कान में बजे है पायल
चाह सूरत तक रही जब
आत्मा राह रूठ जाए
चल रही इस जिंदगी की
राह कब ये रूठ जाए
बुलबुला पानी का ये जो
जाने कब ये फूट जाए
"जय कुमार "