अपनी चौखट दीप जलाये, हमने आज हजार से
मिट्टी दीपक खूब खरीदे , अबकी बार बाजार से
जला पटाके मरे है पंक्षी, पर्यावरण हुआ प्रदूषित
सुनना नहीं आज से हमको, अगले दिनों अखबार से
"जय कुमार"04/10/18
अपनी चौखट दीप जलाये, हमने आज हजार से
मिट्टी दीपक खूब खरीदे , अबकी बार बाजार से
जला पटाके मरे है पंक्षी, पर्यावरण हुआ प्रदूषित
सुनना नहीं आज से हमको, अगले दिनों अखबार से
"जय कुमार"04/10/18
सत्य मार्ग पर चलते रहना, इतना भी आसान नहीं
रातें दिन को खूब चिढ़ाती, दिनकर का सम्मान नहीं
कांटों वाली राहे मिलती , पैरो पर छाले पड़ते
हरेक द्वार पर संकट मिलता, मौसम से मेहमान नहीं
हाथ हवन में हर दिन जलते,दिल पर ठोकर लगती है
कौन है अपना कौन पराया, कर सकते पहचान नहीं
आत्म बल की कठिन परीक्षा, पल पल हर दिन होती है
वुद्दि विवेक से उत्तर बनते, प्रश्नों का अनुमान नहीं
पैर पसारे तम है फैला, सत्य सिमटता कोने में
झूठ ने सौहरत है पाई, सच का अब गुणगान नहीं
सत्य मार्ग पर चलते रहना, इतना भी आसान नहीं
रातें दिन को खूब चिढ़ाती, दिनकर का सम्मान नहीं
"जय कुमार "21/10/18
लोग जो दिल से प्यार करते हैं
जिंदगी वो इंतजार करते हैं
हर दर्द दवा का काम करता
दिल में सफर जब यार करते हैं
जय कुमार
मेरे केवल कुछ कहने से, कैंसे तुम यूं रूठ गये हो
अहसासों की छोड़ी बगिया, फूलों जैंसे टूट गये हो
कुछ कड़वी बातों से मेरी, आपका शायद है मन मैला
मेरे मन मंदिर में तेरा, प्रेम प्रकाश केवल है फैला
जैसे बाती मिले तेल से, वैसे दिल से दिल मिल जाता
प्रीतम तुम जब रहो साथ में, जीवन का हर पल खिल जाता
ह्रदय से ह्रदय जब मिलता, प्रेम पथ पर पथिक है चलता
ह्रदय का दामन अब छोड़ा , शीशे जैसे फूट गये हो
कुछ कहनी कुछ ना कहनी थी, कहने से जब मैं चूक गया
ह्रदय की प्रिय एक ना पड़ी , प्रेम का फूल तब सूख गया
कल तक तेरा मेरा ना था, चलते थे हम साथ साथ में
सारा घर खुशबु से महकता, रहते थे जब हाथ हाथ में
नजर मिलाने से क्यों डरते, क्या काला जो दिल में रखते
वेहयाई की भनक न लगी, चोरों जैंसे लूट गये हो
मेरे केवल कुछ कहने से, कैंसे तुम यूं रूठ गये हो
अहसासों की छोड़ी बगिया, फूलों जैंसे टूट गये हो
"जय कुमार"14/10/2018
Mere Bhav
Tuesday, 27 September 2016
उन परिंद्रो को दर्द ए गम की फिक्र कहां
इश्क ए दरिया में जिंदगी बसर करते है
उन दरख्तों को हवायें कहां डरा पाती
सीने में जिनके बबंड़र सफर करते है
रोज मिलते है जमाने की राहों में लोग
भूलते नही जो दिल पर असर करते है
पुष्प खिलते है बागों में हर दिन ही नये
महकते वो जो काँटों में बसर करते है
इक रोज पत्थर भी पिगल जाता मगर
हम अपने जज्वातों में कसर करते है
बेपनाह मुहब्बत के जज्वात वयां नहीं
चाह में उसकी जय रूह नजर करते है
"जय कुमार"
पढ़ले हर कोई किताब की तरह
छुपाये न कुछ भी नकाब की तरह
उलझन न रख अपने दामन में यार
देखले हर कोई लिबास की तरह
कभी न कभी वह सामने आ जाता
जनाब उस बिगड़े हिसाब की तरह
इश्क वक्त के साथ करे गहरा असर
पुरानी बंद उस शराब की तरह
लाख जिंदगी जिये ऐशो आराम
सुकूं नहीं उसके आदाब की तरह
जिंदगी मीठे जहर का नाम दोस्त
महफिले-यार के शबाब की तरह
हिज्र की आग को बयां करु कैंसे
जला है तू जय आफताब की तरह
"जय कुमार "16/09/18
यह मेरी मौलिक रचना है
पढ़ले हर कोई किताब की तरह
छुपाये न कुछ भी नकाब की तरह
उलझन न रख अपने दामन में यार
देखले हर कोई लिबास की तरह
कभी न कभी वह सामने आ जाता
जनाब उस बिगड़े हिसाब की तरह
इश्क वक्त के साथ करे गहरा असर
पुरानी बंद उस शराब की तरह
जिंदगी मीठे जहर का नाम दोस्त
महफिले-यार उस शबाब की तरह
"जय कुमार "16/09/18
दिल बिकता रहा रोज बाजार में
सिर्फ घाटा है दिल के व्यापार में
कम लोग ही मुनाफे में पाते हैं
खबर पहली है आज अखबार में
" जय कुमार "11/09/18
आस आसमान से टूटती रही
जिंदगी जन्म से लूटती रही
गिरा उठा चलने को हर दफा
भरोसे की गगरी फूटती रही
"जय कुमार "11/09/18
मुहब्बत को तू सरेआम न कर
वादों को अपने गुमनाम न कर
बेकार के वहम रहें हैं दिल में
बेरहम बेबजह बदनाम न कर
"जय कुमार "
"हाइकू"
होंठ बाँसुरी
कानन हो कुंड़ल
मोहन मारो
गायन संग
वन में जो घूमत
माखन चोर
माखन चोर
गौवरधन धारी
कृष्ण मुरारी
रास रचाये
माखन चोरी खाये
मन मोहन
यशोदा प्यारो
नंदलाल कहायो
देवकी जायो
मन बसिया
रस रसिया कृष्ण
कण कण में
कारे तन में
प्रेम को है उजारो
बसा भक्ति में
मोर मुकुट
मुरली के धारक
कृष्ण हमारो
गीता का ज्ञान
करा कर्म का भान
जन सम्भारो
"जय कुमार"
हौंसलों को पर दिया करो
कभी अपने को जिया करो
जिंदगी से मुहब्बत हो गर
थोड़ी थोड़ी ही पिया करो
रंज पाले है खूब दिल में
बेवजह ही हँस लिया करो
सुकूं मिले दिल को जिससे
काम वो भी कर लिया करो
चिराग अँधेरे से हारते नहीं
एक चिराग जला लिया करो
मौसम की रवानी को देखके
बूँदों में ही भीग लिया करो
दिल दे न गवाही यार वो
काम हरगिज न किया करो
इस रंग बदलती दुनिया में
एक पहचान बना लिया करो
इश्क याद आये महफिल में
अपने अश्क छुपा लिया करो
मुहब्बत की गैरत मर जाये
जज्जवात दबा लिया करो
गुलशन को हो जरुरत तेरी
हँसते हुए कुर्बानी दिया करो
सारे गमों को कह अलविदा
जिंदा दिली से जिया करो
"जय कुमार"
मुहब्बत का नूर जब गहरा देखोगे
शिद्दत से चाहने पर पहरा देखोगे
उल्फत की कहानी जब सामने होगी
मेरी आँखों में तब चेहरा देखोगे
"जय कुमार "
नर्रा नर्रा मैं हार गओ
मोरी बात सुनत नईंया
मनकी बात कहत नईंया
जबसें आओ हे खैतन सें
कठवा बैला लय जौतन सें
ऊंगो ऊंगो जो बैठो हे
पैले जैसौं लगत नईंया
मनकी बात कहत नईंया
हफ्ता भर में ब्याव मोडी को
सूत चुकाने हे करोढी को
खैतों से कछु नई निकरो
पानी टेम पे गिरत नईंया
मनकी बात कहत नईंया
खून पसीना एकई करके
दिनई रात देखई करके
कछु फसल जो हाथे आई
मंडी में भाव मिलत नईंया
मनकी बात कहत नईंया
भीड़ लगी काये खोरन में
बैठे रोबे सब दोरन में
ओके घरे आफत आ गई
बेवजे कोऊ मरत नईंया
मनकी बात कहत नईंया
अर्थी उठ रई फिर किसान की
दुनिया समझे अनजान की
जो हालत में हम रेत हे
ओ में कोऊ रहत नईंया
मनकी बात कहत नईंया
का अनहोनी जा होन लगी
धरती मईया अब रोन लगी
जैंसौ दर्द किसान सहत हे
बैंसौ दर्द कोऊ सहत नईंया
मनकी बात कहत नईंया
नर्रा नर्रा मैं हार गओ
मोरी बात सुनत नईंया
मनकी बात कहत नईंया
"जय कुमार "25/05/18
गांव लिखता हूँ शहर नहीं जानता
भोर लिखता हूँ दुपहर नहीं जानता
आग दिखती है पानी लिए रहता
कलम पकड़ी है खंजर नहीं जानता
प्रेम में धोखा आता नहीं हमको
रिश्ते निभाता हूँ जहर नहीं जानता
चला सख्त राहों पर मंजिल न मिली
राह का राहगीर सफर नहीं जानता
मुहब्बत रोती रही आज चुपचाप
बेदर्द उसकी तु नजर नहीं जानता
तोड़ दिया दिल को सीसे की तरह
आग लगाता है असर नहीं जानता
मतला मिसरा मक्ता आता नहीं
गजल कैसे लिखूँ बहर नहीं जानता
"जय कुमार"12/05/18
हर बार धोखे मिले नाम उसका सरकार लिखता हूँ
दगे की कहानी छुपाता नहीं बार बार लिखता हूँ
मुहब्बत देखने दिखाने हाथ से हाथ मिलाने की
जनाब अंदर के मनसूबों की मैं दरकार लिखता हूँ
ईमान की कसम खाए बैठे हैं मखमली कुर्सी पर
मुल्क की बज्म ए इंसाफ को बाजार लिखता हूँ
मुहब्बत रात के आगोश में उजाले में छोड़ जाते
बहरूपी इनके इश्क के बिगड़े किरदार लिखता हूँ
जमीन छीन ना ले कोई दिल की मैं चौकस रहता
हर रोज दिल में उसका नाम लाखों बार लिखता हूँ
उजाड़ गया हर मौसम को जय देखते ही देखते
बड़ा बेवकूफ़ हूँ मुहब्बत को सदाबहार लिखता हूँ
"जय कुमार "01.05.2018