तमाम उम्र देखा
जिसे दर्पण में
हर पल बदलता
बो दर्पण मुझे
कुछ सन्देश देता
नियति से सरोकार
कराना चाहता
हर दिन मुझे
चेतावनी देता
बहुत कहना चाहता
झुर्रियों को स्पष्ट
दिखाता हर बार
पहला स्वेत केश
उसी ने दिखाकर
प्रयास किया फिर
केश फूले काँसकी
तरह दिखाये
मांस सिकुड़ता
झुर्रियां बिखर गई
वह सम्हलने का
सन्देश देता रहा
लेकिन मैंने
एक ना सुनी
वह दिन आया
दर्पण सामने था
मैं कुछ देख
ना पाया
"जय कुमार " २५ /०५ /१४
जिसे दर्पण में
हर पल बदलता
बो दर्पण मुझे
कुछ सन्देश देता
नियति से सरोकार
कराना चाहता
हर दिन मुझे
चेतावनी देता
बहुत कहना चाहता
झुर्रियों को स्पष्ट
दिखाता हर बार
पहला स्वेत केश
उसी ने दिखाकर
प्रयास किया फिर
केश फूले काँसकी
तरह दिखाये
मांस सिकुड़ता
झुर्रियां बिखर गई
वह सम्हलने का
सन्देश देता रहा
लेकिन मैंने
एक ना सुनी
वह दिन आया
दर्पण सामने था
मैं कुछ देख
ना पाया
"जय कुमार " २५ /०५ /१४