Sunday, 25 May 2014

तमाम उम्र देखा

तमाम उम्र देखा
जिसे दर्पण में
हर पल बदलता 
बो दर्पण मुझे
कुछ सन्देश देता 
नियति से सरोकार
कराना चाहता
हर दिन मुझे
चेतावनी देता
बहुत कहना चाहता
झुर्रियों को स्पष्ट
दिखाता हर बार
पहला स्वेत केश
उसी ने दिखाकर
प्रयास किया फिर
केश फूले काँसकी
तरह दिखाये
मांस सिकुड़ता
झुर्रियां बिखर गई
वह सम्हलने का
सन्देश देता रहा
लेकिन मैंने
एक ना सुनी
वह दिन आया
दर्पण सामने था
मैं कुछ देख
ना पाया


"जय कुमार " २५ /०५ /१४




जब चल दिये

जब चल दिये तो घबराना कैंसा ।
राहों  की रंगत पर बौराना कैंसा ।
मंजिल है तेरी फलक के उस पार ,
फिर रास्तों से यह याराना कैंसा ।

"जय कुमार " २५/०५ /१४

मुझे वक्त

मुझे वक्त के हाथ में सौंपता रहा ।
जहर मिला प्यार परोसता रहा ।
साथ चलने को खड़ा होता रहा मैं ,
मेरे जज्बे को खंजर खौंपता रहा ।

"जय कुमार" 23/05/14

मन का परिंद्रा

मन का परिंद्रा उड़ता रहता ।
जीवन की राहें चुनता रहता ।
कुछ पाने के खातिर ये यहाँ ,
ह्रदय की बातेँ कहता रहता ।

निर्मल जल सा बहता रहता ।
पावन वायु सा बड़ता रहता ।
किसी से क्या लेना देना उसे ,
अपनी मौज में चलता रहता ।

पग पग पर ये बसता रहता ।
सारे जग में ये घूमता रहता ।
अपना बनाता कभी किसी को
जन जन में ये पलता रहता ।

"जय कुमार" 23/05/ 14

सत्कर्म

सत्य , सत्कर्म , सदमार्ग पर चलता चल ।
मोहन , मृदुलता , मन में भरता चल ।
जीवन नाव फँसती रहती भँवर में यहाँ ,
संयम , सदाचार , सदभाव में जीता चल ।

"जय कुमार" 23/05/14

Monday, 12 May 2014

ना जाने कहाँ

ना जाने कहाँ से आ गये
बड़ो मीठो राग सुना गये
मोइरी बातें सुनके भैया
बे मोइहो लबरा बना गये

ना जाने कहाँ से आ गये …

हमई खो तो लूटत रये बे
हमई खो तो कूटत रये बे
उनने खाई रबड़ी मलाई
बे हमें तो मठा पकरा गये

ना जाने कहाँ से आ गये …

मोइरे घर में तो रहत रये 
मोइरो तो बे खाऊत रये
जिनके संगे मैं बैठत रयो 
बे मोरी ओइसे भिडा गये

ना जाने कहाँ से आ गये ....

रहत रये हम संगें सदईं
गले मिलत रये हम सदईं
उनने चलीं ऐसी चाले खूबई
बे दूध में जहर मिला गये

न जाने कहाँ से आ गये.....




"जय कुमार " १३/०५ /१४

निर्मल मन

निर्मल मन
शांत जल बहाव
रहता स्थिर

पवन वेग
आग ज्वाला ना कर
पाती आस्थिर

सत्कर्म मन
रहता उदार है
दया से भरा

पुष्प खुशबु
स्वाभाव से देता है
ना कि समय

हित निर्णय
जगत का करे वो
विवेकवान

प्रेम सागर
भरा रहता जहाँ
सदभाव हो

चलना कार्य
मानव का कर्तव्य
बढ़ाता भाग्य

पाना व खोना
विचलित ना करें
समभाव हो

जन्म व मृत्यु
भयभीत ना करें
सत्य ज्ञान हो

"जय कुमार" 12/05/14

याद हर पल

याद हर पल सताती रही ।
उन बातों को बताती रही ।
जिनने छीना चैन अब तक
वही उम्मीदें बँधाती रही ।

नजरें हमसे चुराती रही ।
जख्म का दर्द बढ़ाती रही ।
कुछ तलाश करने चला मैं
वो हर जज्बा मिटाती रही ।

प्रेम राज को छुपाती रही ।
बेजान फूल खिलाती रही ।
चले जिन राहों पर हम ,
वो हर निशां मिटाती रही ।

भावों को आग दिखाती रही ।
बहरों को राग सुनाती रही ।
कुछ हाथ आता कैंसे उसको
अंधों को दर्पण दिखाती रही ।

"जय कुमार" 12/05/14

गोद में तेरी

गोद में तेरी
सोया तो जन्नत भी
कम लगी माँ

तुझे जो पाया
हरेक मन्नत भी
कम लगी माँ

सिलवट जो
देखी तेरी आँखे भी
नम लगी माँ

जग जननी
पालन करती हो
रब सम माँ

तेरे आँचल
की छाँव सुकुन का
सागर है माँ

ज्येष्ठ की गर्मी
तेज धूप आग में
हिमालय माँ

शांत धारा हो
गंगा की यमुना में
समायी हो माँ

जर्रा जर्रा में
ममता तेरे भरी
मेघ धारा माँ

वात्सल्य मूर्ति
राम महावीर में
भी बसी हो माँ

ईश्वर पूजा
करते जिसे मेरी
वो है प्यारी माँ

मेरा वंदन
कोटिश नमन है
जगत की माँ


"जय कुमार" 11/05/14

जन्म हुआ तो

जन्म हुआ तो
बधाई गीत गाये
हर्ष मनाये

थोड़ा चला जो
चारो तरफ दोड़ा
कल्पना लोक

किशोर हुआ
संवेगों में घिरा तु
बेबाक चला

जवानी दगा
लेकर आई जब
मस्त मगन

भूला जीवन
सोया नींदभर तु
अहं में मन

बुढ़ापा जब
आया देह थकी तो
रोना आ गया

सोना भूला तु
खोने को कुछ नहीं
जींड़ शरीर

दिन आया वो
पत्ता टूटा डाली से
उड़ा आकाश

छोड़ी अपनी
धन दौलत बच्चे
महिल सब

रहा बस तु
कर्म धरम मर्म
ले गया साथ

"जय कुमार" 10/05/14

जीतकर

जीतकर भी हारा सा लगा कभी ।
पाकर भी खोया सा लगा कभी ।
कुछ अजीब खेल है जिंदगी का ,
मुनाफे में भी ठगा सा लगा कभी ।

"जय कुमार" 10/05/14

चलते चलते

चलते चलते कई राहें छूट गई ।
पाने पाने में कई चाहें छूट गई ।
जिसकी चाहत रही जिंदगी भर ,
अपना बनाने में वो बाहें छूट गई ।

"जय कुमार" 10/05/14

चकमक की

चकमक की
चिंगारी पल भर
में खत्म होती

प्रकाश देती
जग जन जीव को
एक चिंगारी

अहसासों के
दृढ़ता से भरे भावों
का प्रकाश वो

अहं मद को
निर्मूल कर जाता
लोभ मुक्त वो

वो अहसास
जीवित रहा सदा
स्वप्न रहा जो

दृष्टि पटल
पाया ना कभी मैंने
मन में बैठा

सिंचित किया
जीवन की बगिया
उन्ही पलों ने

रोशन कर
जर्रा जर्रा नूर वो
मन की आशा

"जय कुमार" 10/05/14

टूटता पत्ता

टूटता पत्ता
चलती हवाओं में
किधर गया

आत्मा से हुआ
अलग तन अब
बिखर गया

बचती देह
पंच तत्वों में मिली
प्रकृति साथ

शून्य से शुरु
किया तूने जीवन
शून्य में खत्म

अच्छे बुरे के
बीज बोये जो तूने
अमर रहे

धरोहर में
जग को छोड़े फल
जो खट्टे मीठे

"जय कुमार" 08/05/14

मुझे अपने

मुझे अपने गम में तु , शामिल कर ले ।
अपनी मुहब्बत को तु , हासिल कर ले ।
किसी की याद में आँसु बहाता क्यों है ,
मुझे अपने दिल के तु , काबिल कर ले ।


jay kumar 08/05/14

सच बोला तो

सच बोला तो जमाने ने ,
बबाल खड़े किये ।
कुछ ना बोला तो जहां ने ,
सवाल खड़े किये ।

"जय कुमार" 08/05/14

Wednesday, 7 May 2014

कलम चले

कलम चले
देश के हितार्थ में
क्राँति को लाये

कलम चले
समाज के हितार्थ
सुधार लाये

कलम चले
प्रेम के बखान में
संसार पाये

"जय कुमार" 06/05/14

स्वपन दशा

स्वपन दशा में रहता हूँ ।
सबकुछ सच्चा कहता हूँ ।
निर्जन वन में घूमा करता ,
जल से मिलकर बहता हूँ ।

"जय कुमार" 06/05/14

सभ्यता की नींव में

सभ्यता की नींव में ,
कमजोर पत्थर लगाये है ।
समाज के दर्पण पर ,
कोयले की राख चढ़ाये है ।
मानव छला मानव से
पशु जाति को भी पछाड़ा ,
मानव ने नवाजातों को ,
जहर मिले दूध पिलाये है ।

"जय कुमार" 6/05/14

विश्वास की नींव

विश्वास की नींव पर घर खड़ा कीजिए ।
चरित्र की ईंट पर प्रेम गारा लगा दीजिए ।
सद्भाव की दीवारे ऐसी नफरत ना दिखे ,
छोटी छोटी खुशियों के खपेल बिछा लीजिए ।

"जय कुमार" 02/04/14

चलने के लिए

चलने के लिए दो पैर काफी होते ।
बढ़ने के लिए हौंसले काफी होते ।
अहं मद लालच ने भटकाया है ,
खाने के लिए अनाज काफी होते ।

जीने के लिए जीवन काफी होता ।
छोड़ने के लिए अहं काफी होता ।
कुछ पाने के खातिर झगड़ते क्यों ,
पाने के लिए प्रेम ही काफी होता ।

समझने के लिए खुद को समझ लो ।
झगड़ने के लिए खुद से झगड़ लो ।
मैं का खेल समझा तो सब समझा ,
बिछड़ने के लिए मैं से बिछड़ लो ।

"जय कुमार" 2/05/14

मुहब्बत के दरिया

मुहब्बत के दरिया में डुबकी ना लगाई मैंने ।
हुस्न के मेले में कोई बात ना चलाई मैंने ।
देखता रोज शहर के बाजारों में लैला मजनु ,
अपने दिल में मुहब्बत की आग ना लगाई मैंने ।

"जय कुमार" 02/05/14

जब बात निकल

जब बात निकल पड़ी है , फिर छुपाउँ कैंसे ।
दर्द को कुरेद ही दिया है , आह छुपाउँ कैंसे ।
मीठे जहर का समुंदर प्यार मौत होती नहीं ,
यह मर्ज हो ही गया है , फिर मिटाउँ कैंसे । ।

"जय कुमार" 2/05/14

चल पड़ो तो

चल पड़ो तो , रुकने का नाम ना लेना ।
निकल पड़ो तो , लौटने का नाम ना लेना ।
तेरे हौंसलो को कौन रोक पाया है मानव ,
मुश्किल चाहे हो , हारने का नाम ना लेना ।

"जय कुमार" 01/05/14

एक बार फिर

एक बार फिर मिट्रटी के घर बनाइये ।
प्रेम की खुशबु से फिर घर महकाइये ।
आपसी प्रेम जहाँ वहाँ रब का निवास ,
परिवार के फूलों से ही घर सजाइये ।

"जय कुमार" 01/05/14

चाँद की चाँदनी

चाँद की चाँदनी , फीकी लगती थी , तेरे सामने ।
फूलों की खुश्बु , फीकी लगती थी , तेरे सामने ।
कुछ सोचने समझने का बक्त कहाँ था तेरे सिवाय ,
जमाने की अदायें , फीकी लगती थी , तेरे सामने ।।

"जय कुभार" 01/05/14

तेरी तस्वीर आँखो

तेरी तस्वीर आँखो में बसा रखी है ।
हरेक बात जिह्न में बिठा रखी है ।
तुझको भूलकर जीना संभव कहाँ ,
मैंने हर टीस दिल में दबा रखी है ।

"जय कुमार" 01/05/14

कुछ बात तो

कुछ बात तो थी मेरे यार में ।
तड़पता रहा जिसके प्यार में ।
धीरे धीरे साँसे कम हो रही ,
आँखे खुली रखी इंतजार में ।

"जय कुमार" 01/05/14

उसकी बो अदाये

उसकी बो अदाये कहर ढाती रही ।
उसकी बो नजरे जहर पिलाती रही ।
ऐसा बना मैं परवाना मेरे यारो ,
उसके दर्द में रातें बसर होती रही ।


"जय कुमार" 01/05/14

बेआबरु हो गये

बेआबरु हो गये वो जमाने के सामने ।
लालची हो गये वो खजाने के सामने ।
हमारा तो प्यार का रिश्ता था उनसे ,
रूशवा हो गये वो दीवाने के सामने ।

"जय कुमार" 01/05/14

बचपन से ही हाथों

बचपन से ही हाथों में फफोले मिले ।
जवानी मे बोझ से लदे ठेले मिले ।
दो पन बीत गये राहत ना मिली ,
बुढ़ापे में भी मेहनत के मेले मिले ।

"जय कुमार" 01/05/14

मेरी हालत

मेरी हालत नाजुक देख ,
मौका परस्त मुस्कराने लगे ।
कमजोर जगह ढ़ूड़ ढ़ूड़ ,
शाखों को बिखराने लगे ।
लोमड़ी जात अब लोगों के
खून में दोड़ने लगी यारो ,
मेहनत से बनाये खाने को ,
मिलके दावत उड़ाने लगे ।

"जय कुमार" 01/05/14

दर्द के समंद

दर्द के समंदर हमारे दिल में लहराते है ।
हमारी मेहनत से जमाने बदल जाते है ।
झोपड़ी में रहते मुफलिसी के मारे हम ,
दुनिया के महलों को हम ही जगमगाते है ।

"जय कुमार" 01/05/14

मेरे हाथों के छाले

मेरे हाथों के छाले , दुनिया के उजाले बने ।
मेरे हाथों की बलि , ताज के उजाले बने ।
पसीने से नहाया करते है हम हर दिन ,
मेरे खून के दरिया से , दुनिया के किनारे बने ।

जय कुमार 01/05/14

मुश्किलों में जीते

" श्रमिक कहते है "

मुश्किलों में जीते है हम ,
मुश्किल जिंदा रखती है ।
मुमकिन है कि तुम जल जाओ ,
हम तो जिन्दा रहते है ।

एक नहीं दो चार नहीं हम ,
लाखों गमों को सहते है ।
मुमकिन है कि तुम जल जाओ ,
हम तो जिंदा रहते है ।

सीने में है दर्द समुंदर ,
आँखों में अंगारे है ।
हाथो में बसते विश्वकर्मा ,
पांव कभी नहीं हारे है ।
खुशियों से है बैर हमारा ,
हम गमो से यारी करते है ।

मुमकिन है कि तुम जल जाओ ,
हम तो जिंदा रहते है ।

सर पर छाया आसमान की ,
सारी धरा बसेरा है ।
तुम करते महलों का पहरा ,
हम धरा का पहरा करते है ।

मुमकिन है कि तुम जल जाओ ,
हम तो जिंदा रहते है ।

कभी पर्वत के सीने को चीरा ,
कभी सारी धरा खंगाले है ।
कभा शाह का ताज बनाकर ,
हम अपने हाथ कटवाते है ।

मुमकिन है कि तुम जल जाओ ,
हम तो जिंदा रहते है ।

मुश्किलों में जीते है हम ,
मुश्किल जिंदा रखती है ।
एक नहीं दो चार नहीं हम ,
लाखो गमों को सहते है ।

मुमकिन है कि तुम जल जाओ ,
हम तो जिंदा रहते है ।

"जय कुमार" 01/05/14

खुले दिल से

खुले दिल से तारीफ ही किया करो ।
किसी के जीवन को जी लिया करो ।
इतने कंजूस क्यों बनते हो यारो ,
सिर्फ 'बहुत खूब' ही कह दिया करो ।

"जय कुमार"30/04/14

कुछ सोचा

कुछ सोचा नहीं करते वो ।
आये जो मन में कहते वो ।
किसी का ख्याल कहाँ उन्हे ,
हवाई ख्यालो में रहते वो ।

"जय कुमार" 30/04/14

खुले दिल से

खुले दिल से तारीफ ही किया करो ।
किसी के जीवन को जी लिया करो ।
इतने कंजूस क्यों बनते हो यारो ,
सिर्फ 'बहुत खूब' ही कह दिया करो ।

"जय कुमार" 30/04/14

कुछ सोचा नहीं

कुछ सोचा नहीं करते वो ।
आये जो मन में कहते वो ।
किसी का ख्याल कहाँ उन्हे ,
हवाई ख्यालो में रहते वो ।

"जय कुमार" 30/04/14

अपने ही दोषों

अपने ही दोषों से लड़ना होगा ।
अपने ही आप से भिड़ना होगा ।
कोई उँगली पकड़ ना चलायेगा ,
अपने ही पैरो पर चलना होगा ।

"जय कुमार" 29/04/14

तेरी मौत महबूबा

तेरी मौत महबूबा बनकर आयेगी ।
अपने महबूब को साथ ले जायेगी ।
छोड़ जायेगी तुझे तेरे अपनों के हवाले ,
अपना पैगाम ये दुनिया को दे जायेगी ।

तेरी दौलत के खजाने काम ना आयेगे ।
तेरे ही अपने इसे नौँच नौंच खायेगे ।
तुजे अकेला जाना होगा सब छोड़कर ,
यमराज जब तुझको लेने को आयेगे ।

तेरी साख सब राख में मिल जायेगी ।
तेरी शोहरत मिट्रटी में मिल जायेगी ।
बस कुछ दूर तलक साथ ले जायेगे ,
तेरी दुनिया राम राम सत्य गायेगी ।

कुछ दिन याद कर भी ले शायद कोई ।
कुछ बातें तेरी भी कर ले शायद कोई ।
अब भी संभल कर गुजर कुछ ऐसा ,
सदियों तक याद कर भी ले शायद कोई ।

"जय कुमार"29/04/14

तुम्हारा काम हो

तुम्हारा काम हो मेरा नाम हो जाए ।
मेरा जाम हो तुमारा बदनाम हो जाए ।
फितरत तो देखो इस इंसान की यारों ,
उनकी दौलत मेरे लिए ईनाम हो जाए ।

"जय कुमार" 28/04/14

शक वो बीज है

शक वो बीज है जो काँटो को जन्म देता है ।
फलते फूलते रिस्तों को ये निगल लेता है ।
रिस्तों की डोर बड़ी नाजुक होती मित्रो ,
ये भरम के नाजुक रेशों को लील लेता है ।

"जय कुमार" 28/04/14

जर्रा को शोला

जर्रा को शोला बनाना है , हवा दिया करो ।
पिछड़े को आगे बढ़ाना है , उत्साह दिया करो ।
कोई माँ के पेट से सीखकर नही आता मित्रो ,
नवकुँवारो को कवि बनाना है , दाद दिया करो ।

"जय कुमार" 29/04/14

जिनने मजलूमों पर

जिनने मजलूमों पर जुल्म ढाये है ।
वही अब सराफत की बज्म आये है ।

वही दिल में बसे रहे हमेशा मेरे ,
जिनने जिंदगी भर सितम ढाये है ।

तजुर्बा बहुत हो जाता है उनको ,
जिनने जमाने के जख्म खाये है ।

इंसां की बस्तियों से दूर रहे होगे ,
तब तो वो कहीं से इल्म लाये है ।

मुहसिन बने वो जमाने के सामने ,
भरोसे पर जिनने जुल्म ढाये है ।

"जय कुमार" 28/04/14

टूटे ख्वाबों

टूटे ख्वाबों की कसक खूब होती है ।
साख से बिछड़ पत्तियाँ खूब रोती है ।
भँवर पास हो साहिल हो दूर तब ,
माँझी के साथ कस्तियाँ खूब रोती है ।

"जय कुमार"  28/04/14

हसरतों को पनप जाने

हसरतों को पनप जाने दो ।
चूड़ियों को खनक जाने दो ।

मैं तेरा गुनहगार हूँ मुझको ,
तेरी चाहत में भटक जाने दो ।

खाली पड़ी दिल की पनाहगाह ,
चंद यादों को अटक जाने दो ।

बीरान पड़ी है मेरी बागिया ,
कुछ फलों को लटक जाने दो ।

मुझसे बहुत चाले चल चुके ,
अब मोहरों को भटक जाने दो ।

कहो ना दर्दे दिल की दास्तां ,
लबों पर ही अटक जाने दो ।

सदियों से प्यासा दिल मेरा ,
जय सीने से लिपट जाने दो ।

"जय कुमार" 27/04/14

ख्वायिशों को कफन

ख्वायिशों को कफन पहनाया ना करो ।
जले दीपकों को ऐसे बुजाया ना करो ।

शक्ति का समुंदर समाया तेरे अंदर ,
अपनी हिम्मत को ऐसे मिटाया ना करो ।

जिसमें ना रह पाये एक साथ दो भाई ,
कच्चे धागों के ऐसे घर बनाया ना करो ।

जिस जश्न में मुहब्बत ना दिखे यारो ,
महफिलों को फिर ऐसीं सजाया ना करो ।

इंसान की फितरत इंसान ही पड़ लेता ,
मजहब के नाम पर आग लगाया ना करो ।

भूखे बच्चे रोते हो शहर की सड़को पर ,
आग के दरिये में यूँ घी बहाया ना करो ।

नफरत की ज्वाला में जलती रही सरहदें ,
तपाक से उनको यूँ गले लगाया ना करो ।

देख ली हो रंगत वफाओं जफाओं की ,
दिल दे ना गवाही हाथ मिलाया ना करो ।

सदियों से सपने लूटकर करते रहे राज ,
तुम हवाओं में बस्तियाँ बसाया ना करो ।

"जय कुमार" 27/04/14

बाजार में गये

बाजार में गये पोसाक खरीदने हम ,
दिल ने कहा कफन भी खरीद लो ।

"जय कुमार" 26/04/14

मेरे प्यार को तुम

मेरे प्यार को तुम , बदनाम ना करो ।
मेरे जज्बातों को , सरेआम ना करो ।
चला गया अपना सब कुछ छोड़कर ,
दिल की दौलत को , बेनाम ना करो ।

"जय कुमार" 26/04/14

ना जाने हम क्यों

ना जाने हम क्यों उन पर मर मिटते थे ।
ना जाने क्यों अपने आप से ही पिटते थे ।
आँधियाँ आयीं ख्वाव टूट गये मेरे सारे ,
खोखले पेड़ थे वो हम जिनसे लिपटे थे ।

"जय कुमार" 26/04/14

मन मीत की चाहत

मन मीत की चाहत , कहाँ तक ले गई ।
प्रीत रीत निभाते हम , जहाँ तक ले गई ।
राहत की आस लगाते रहे हम यारो ,
आस की आशा थी , वहाँ तक ले गई ।

"जय कुमार" 26/04/14

तेरा चेहरा देख

तेरा चेहरा देख मन मुस्कराता है ।
बहारों के आने से पुष्प खिल जाता है ।
कोई फिक्र ना रहती यारो मुझको ,
प्रीत का मन मीत जब मिल जाता है ।

"जय कुमार" 26/04/14