Thursday, 29 October 2015

जख्मों

जख्मों की बहारों से ।
झूठे उन ..सहारों से ।
उम्मीद रख्खी हमने ,
दूर जाते किनारो से ।।
"जय कुमार"28/10/15

तू एक

तू एक ही ..गुनाह कर !
हर कविता पे वाह कर !!
"जय कुमार"28/10/15

भले बुरे

भले बुरे के भेद में ..... उलझा रहा हूँ ।
अपने अवगुण रोज मैं सुलझा रहा हूँ ।।
"जय कुमार"28/10/15

जब से सगे

जबसे सगे ही ,,,,,,,,कटने लगे हैं !
जमाने हम पर ,,,,,,,हँसने लगे है !!

किसको रही परवाह रिश्तों की ,
रिश्तों में व्यापर ,,चलने लगे है !

बैठा बूढ़ा बरगद ,,,गुमसुम अब ,
 घास की इज्जत ,,करने लगे है !

वजूद जिससे बोझ ,लगने लगा ,
टहनी को तना ,,,,,खलने लगे है !

प्रबन्ध का होता ,,, अनुबन्ध जी ,
सबंध जब से,,,, बिखरने लगे है !

मायूसी के मौसम ,,,,,सजते चले ,
उम्रदराज घर से ,,,,डरने लगे है !

चन्द पैसों की भूख ,,,,जाती नहीं ,
स्वारथ से साथी , मिलने लगे है !

वासनाओं में दौडा ,,,,,जय अंधा ,
मरम प्यार के ,,,,,,बदलने लगे है !!

"जय कुमार"28/10/15

Sunday, 25 October 2015

हौसलों के

हौसलों के पंख लगाकर उड़ जाऊँगा ।
संघर्षो को पैर बनाकर ..बढ़ जाऊँगा ।
दुर्गम हिमालय जो मेरा .. पथ रोकेगा ,
संकल्पो की डोर बाँधकर चढ़ जाऊँगा ।।
"जय कुमार"25/10/15

इंसानियत

इंसानियत से गिरे हुए ।
तिजोरी अपनी भरे हुए ।
झूठ मालामाल हुआ अब ,
सत्य के कपड़े फटे हुए ।
छिलके सन्तरे के पहने ,
अन्दर से जो .. कटे हुए ।
बनते रहते जेन्टल मेन ,
भीतर से जो . लुटे हुए ।
कंगारू पत्थर . चमकते ,
नींव के पत्थर हिले हुए।
हाथ मिलाते हमदर्दी से ,
दिल में गहरे गिले हुए ।।
"जय कुमार"24/10/15

Thursday, 22 October 2015

उजड़ने

उजड़ने की सूरत पाये बहारोँ से ।
दरद के सैलाब .. आये सहारों से ।
प्यार को ढ़ूढ़ते रहे उम्र- ए- हयात ,
खुशी इक से न मिली गम हजारोँ से ।
मोहब्बत किरदार से सब जमाने में ,
नजरे मिली कहाँ दिल के नजारों से ।
उम्मीद रखता हूँ भरोसा जिंदा है ,
भँवर में फँस गया प्यार किनारों से ।
टूटे दिल के सहारे मिलते गर ये कहीं ।
खरीद लेता इक दिल फिर बाजारों से ।।
"जय कुमार"23/10/15

मोहब्बत

मोहब्बत किरदार से करता रहा ।
हुस्न पर तेरे यूँ ही .. मरता रहा ।
इस रोग में दरद होता कहाँ कभी ,
परवाना बन शमा से जलता रहा ।।
"जय कुमार"22/10/15

सत्य

सत्य असत्य का दंगल हुआ ।
सत्य का सदैव , मंगल हुआ । ।
"जय कुमार"22/10/15

Tuesday, 20 October 2015

पूँछ लिया

पूँछ लिया किसी ने चलते चलते तेरी मंजिल क्या है ??
ख्वावो का खूबसूरत शहर पल में धराशाही हो गया ।।
"जय कुमार"18/10/15

बिना

बिना सर पैर का झूठ है ,
पर चलता बेहद खूब है ।।
"जय कुमार"18/10/15

मुफलिसी

मुफलिसी के जब मर्ज सजते है ।
जिंदगी के तब बारह बजते है ।
फैला देता हाथ तब वो सामने ,
निवालों के दरवाजे खटकते है ।।
"जय कुमार"17/10/15

छाती पर

छाती पर सिर्फ दुश्मन वार करते है ,
पीठ पर वार करना दोस्तों से सीखें ।।
"जय कुमार"17/10/15

लाल प्याज

लाल प्याज की लत बुरी , सर पे बैठी दाल ।
अच्छे दिन जे आ गये ,,,, काये करें मलाल ।
काये करें मलाल ,,,,,, बाबा कहाँ अब आवे ।
जनसेवक को राज ,,,,, विदेशन पैंसा जावे ।।
"जय कुमार"16/10/15

धरती की कहानी

धरती की कहानी अम्बर सुनायेगा ।
आज जो दिया कल लौटके आयेगा ।
संघर्ष को जिसने सीने से लगाया ,
समय उसके ही गीत गुन गुनायेगा ।।
"जय कुमार"15/10/15

अंतर्मन में

अंतर्मन में मद मस्त हो जा !
अंतस की गहराई में सो जा !
खुली खिताब पड़े दुनिया ये ,
मैं में रमकर तू मैं में खो जा !!
"जय कुमार"15/10/15

जमाना

जमाना .. बदल गया ।
मयखाना बदल गया ।
स्वार्थ की पी मदिरा ,
याराना .. बदल गया ।।
"जय कुमार"14/10/15

दोस्तों का

दोस्तों का ख्याल जब जब जहन में आया ,
मेरी पीठ के जखम गहरे ..... हरे हो गये ।।
"जय कुमार"14/10/15

अपनी माँ

अपनी माँ के पैर,,, सहला न पाया !
लख्ते जिगर कभी कहला न पाया !!

दूध पिलाया था ,,,,,,,,अपने खून से ,
उसे दो बूँद पानी ,,,,,पिला न पाया !

गंदगी पर लेट छाती से लगा रखा ,
सुकून से दो पल उसे सुला न पाया !

तरसती रही वो ,,,,,,दो निवालों को ,
डर बीबी का जुबाँ ,,,,हिला न पाया !

खाँसने की रोज ,,,,,,आवाज सुनता ,
बाजार से मैं दवा ,,,,,,,,,,ला न पाया !

तड़पती रही टूटी ,,,,,,,,खाट पर माँ ,
फिर भी मैं ,,,,,,,,तिलमिला न पाया !

दुआ देती रही ,,,,,,,बेसुद बिस्तर में ,
दो पल उसके करीब ,,जा न पाया !

चली गई दुनिया को ,,,छोड़कर माँ ,
ममता भरी आँखे,,,, भुला न पाया !

हरेक बरष तरपण,,, करता माँ का ,
तस्वीर से नजरे,,,, ,मिला न पाया !

सजा का हकदार ,,,,हूँ मेरे भगवन ,
जय बेटे का फर्ज ,,,,निभा न पाया !!

"जय कुमार"13/10/15

बनाया

बनाया था झूठी रेत से जो घरौंदा ,
जर्रा सी हवा के झोंके से उड़ने लगा ।।
"जय कुमार"12/10/15

"आज का आदमी"

"आज का आदमी"
आदमी के चेहरे अनेक ,
पढ़ना बड़ा मुश्किल हुआ ।
आदमी की जुबान अनेक ,
सुनना बड़ा मुश्किल हुआ ।
बाते प्रेम व विश्वास की ,
कार्य स्वार्थ तक सीमित ,
आदमी के दिखावे अनेक ,
देखना बड़ा मुश्किल हुआ ।।

"जय कुमार"12/10/15

दरद मेरे

दरद मेरे , मिटा दीजिए ।
प्यास मेरी बुझा दीजिए ।
राह पड़ा मुर्दा कहने लगा ,
इक रोटी खिला दीजिए ।।
"जय कुमार"11/10/15

कहीं मिले

कहीं मिले कहीं फरियाद से रहे ।
वो जखम गहरे आबाद से रहे ।
मिलन की तमन्ना जिंदा रही दिल में
भूले बिसरे ख्वाव याद से रहे ।
यूँ तो सबकुछ पाया जिन्दगी से ,
बिन उसके हरपल बर्बाद से रहे ।
"जय कुमार"10/10/15

अड़ खड़े

अड़ खड़े ,, ऐँठे रहे ।
छिप यहाँ कैसे रहे ।
कहर की वो रात थी ,
बुत बने ,,, बैठे रहे ।
शहर की हरेक गली ,
छिप गई ,, ऐसे रहे ।
दर बदर होकर गये ,
कल चले , जैसे रहे ।
समय के हर पहर में ,
जय लुटे ,, वैसे रहे ।।
"जय कुमार"

बहकते नहीं

बहकते  नहीं कदम किसके इस जमाने में ।
आकर मिलो आज हमसे इक मयखाने में ।
कैंसी ये मुहब्बत ..... कैंसे ये फसाने अब ,
भुला देगेँ दुनिया को ..... पीने पिलाने में ।।
"जय कुमार"6/10/15

भली बुरी

भली बुरी लगती नहीं , मोटी जिनकी खाल ।
वोटों की टाँनिक मिले , बदले उनकी चाल ।।
"जय कुमार"5/10/15

ज्ञानी अपने

ज्ञानी अपने ज्ञान का ,, ,,,,,करत रहे गुणगान !
जड़ता जग जाहिर करें , खोत जाय सम्मान !!

"जय कुमार"

चीरकर सीना

चीरकर सीना मुश्किलों का ,
चलने का दम रखता हूँ ।
गरल पीकर भी जिन्दगी में,
हँसने का दम रखता हूँ ।
काल के कहर झेलकर जिये
डरा नहीं नियति से कभी ,
काली रात की आँधिओं में ,
जलने का दम रखता हूँ ।।

"जय कुमार"4/10/15

खुशबु पुष्प

खुशबु पुष्प की लेकर चला गया कोई ।
बीज खार के .. बोकर चला गया कोई ।
हर रन्ज सह लेता हर राह चल लेता ,
दरद प्यार का...देकर चला गया कोई ।।
"जय कुमार"3/10/15

राम राम कहते

राम राम कहते चलो , सबकी राखे राम ।
एक राम के नाम से , बिगड़े बनते काम ।
बिगड़े बनते काम , ताज सर पे आ जावे ।
साथ रहे आवाम , राज के सब सुख पावे ।।
"जय कुमार"30/09/15

कभी साथ

कभी साथ मिलकर वादे सजाये थे ।
प्यार की फसलोँ के बीज लगाये थे ।
मिलने बिछड़ने का सवाल नहीं था ,
दिया बाती बनके दीपक जलाये थे ।।
"जय कुमार"29/09/15

हर तरफ

हर तरफ एक ही ,,,,,,,,,,मंजर देखा है !
खिले फूलों पर ,,,,,,,,,,,, खंजर देखा है !!

फसल प्यार की जहां उगा करती थी ,
उसी जमीन को ,,,,,,,,,,,,,बंजर देखा है !

मुखौटा लगाकर ,,,,,,,,,,,घूम रहा है तू ,
दिखता नहीं जो ,,,,,,,,,,,,अंदर देखा है !

उछल कूंद अभिमान में ,,,,,,,करता तू ,
रूप आदमी में,,,,,,,,,,,,,,,, बंदर देखा है !

किसान की लड़की ,,,,,,,जवान हुई है ,
पिता के दिल में, ,,,,, , बबंडर देखा है !

हमेशा खुश मैं ,,,,,,,,रखता हूं उसको ,
आंखों में उसके ,,,,,,,,,समुंदर देखा है !
 
इतना मुस्कराता है ,,,,,,,,,महफिल में ,
दिल में खुशी का,,,,,,,, खंडर देखा है !!


"जय कुमार"27/09/15

मौसम आँगन

मौसम आँगन में सजते रहे ।
दीमक दामन में लगते रहे ।।
शहनाई की आवाजें गुमी ,
आबरू के वस्त्र जलते रहे ।
कफन जनाजा ढूंढ़ता रहा ,
जिस्म भेड़िया निगलते रहे ।
कत्ल रूह का होता रोज ही ,
गुमनामी के गीत बजते रहे ।
नीली नीली आँखों के ख्वाब ,
भरे बाजार में मचलते रहे ।
जीत की उम्मीद में रोज ही ,
जय हार दहलीज चढ़ते रहे ।।
"जय कुमार"24/09/15

अड़ खड़े

अड़ खड़े ,, ऐँठे रहे ।
छिप यहाँ कैसे रहे ।।
कहर की वो रात थी ,
बुत बने ,,, बैठे रहे ।
शहर की हरेक गली ,
छिप गई ,, ऐसे रहे ।
दर बदर होकर गये ,
कल चले , जैसे रहे ।
समय के हर पहर में ,
जय लुटे ,, वैसे रहे ।
"जय कुमार"23/09/15

पानी की चाह

पानी की चाह से नदिया खुद रास्ता बनाती है ।
नियमों से अपने प्रकृति खुद संतुलन बैठाती है ।
दिल भर जाते तन मर जाते प्रेम रुहानी हो तो ,
कायनात खुद अर्श से फर्स पर राह दिखाती है ।।
"जय कुमार"23/09/15

विश्वास

विश्वास हिमालय सा अटल हो ।
मन निश्चल निर्मल गंगा जल हो ।
लड़ जाये हम हर इक बदी से ,
भुजाओं में फौलाद सा बल हो ।।
"जय कुमार"22/o9/15