Sunday, 29 December 2013

जब तक जीवन ज्योति

जब तक जीवन ज्योति मेरे तन मेँ . . .
तेरा चेहरा वसा रहेगा मेरे मन मेँ . . .

मुझसे कब तक दूर रहेगा मेरे जीवन 
सूना पड़ा है तेरे बिन यह मेरा आँगन
आजा तू सब बंधन तोड़कर मेरे पास 
दोनो मिल गायेंगे मधुर गीत उपवन मेँ . .

बेहोस रहा बदहवास रहा जब तक 
तूने खूब साथ निभाया है तब तक 
अब खड़ा हुआ हूँ चलने को तेरे साथ 
तू अब ना देख पीछे अपने जीवन मेँ . . .

बक्त ने मुझको बहुत खूब समझाया 
तेरे प्रेम का हर पल अहसास दिलाया 
कर देँगेँ उस चीज को तौबा हम भी 
अब मुझको ना छोड़ जीवन वन मेँ . . .

हम साथ एक नया कारवाँ बनायेँगेँ 
अपने प्रेम की एक नई रीत चलायेँगेँ 
मेरे मन को तू पड़ लेना तेरे मन को हम
तब रुह एक हो जायेँगी इसी जीवन मेँ . . .

"जय कुमार"

आसियाने बना लिए

पंछी ने उड़कर नये आसियाने बना लिए।
उसने मुजको छोड़ नये फ़साने बना लिए। 

कल  से ऊब गया होगा सायद ये आदमी ,        
तब तो उसने अपने नये ज़माने बना लिये। 

मेरी सौबत उसको रास ना आई होगी शायद ,
तब तो उसने और कई नये घराने बना लिए। 

मेरी मुहब्बत में कमी रह गई होगी शायद ,
इसलिए उसने अपने नए दीवाने बना लिए। 

धुंदला पड़ गया होगा शायद अब मेरा चेहरा ,
तब तो उसने अपने नये आईने बना लिये। 

"जय कुमार "
  


  

Saturday, 28 December 2013

राजस्थान की भूमि

यह राजस्थान की भूमि ,
पालन करती वीरोँ का।  . . 
यहाँ पनपती है संस्कृति , 
जो सृजन करती हीरोँ का . . 


पग पग पर महल कोठरी , 
जन जन मेँ वसी वीरता , 
इतिहास अधूरा हो जायेगा , 
इस भूमि के वीरोँ के बिन , 
मरुभूमि वंदन करती वीरोँ का . . 


पृथ्वीराज से योध्दाओँ ने , 
इस धरा को खून से सीँचा था , 
राणा साँगा की वो तलवारेँ , 
अमर अमिट जीवन करती , 
लोहा लिया था जिनने , 
अन्याय की जंजीरोँ का . . . 

 
उस राजपूतानी पन्ना को , 
इतिहास भुला ना पायेगा , 
जब वलिदान की बात चलेगी  , 
पन्ना माँ का नाम दुहरायेगा , 
ममता का गला घोँटकर  , 
सामना किया वक्त की लकीरोँ का . . .


महाराणा प्रताप की भुजाओँ ने , 
अपनी हिम्मत दिखलाई थी , 
अकबर भी कांप उठा था , 
राज भक्त की भक्ति देख , 
मुगल सेना भी घबराई थी , 
झुकना जिसने उचित ना समझा ,  
भेष रखा था फकीरोँ का . . . 


यह राजस्थान की धरती , 
वीरोँ की जहाँ फसल उपजती , 
अभिनंदन करती वीरोँ का . . .
अभिनंदन करती वीरोँ का . . .
अभिनंदन करती वीरोँ का . . . 

"जय कुमार " १६/०९ /२०१३ 

जो है पास

जो है पास में उसको कौन रोता है।
अपने खेत में बबूल कौन बोता है।
यहाँ जीवन से ही आशा है सभी को ,
वर्ना दोस्तो मुर्दा तो मौन होता है।

" जय कुमार "

Friday, 27 December 2013

मेरी जिद

मेरी जिद है तुजपर मर मिटने की।
तेरी जिद है खुदपर मर मिटने की। 
हम दोनों कि राहे अलग अलग है ,
पर दोनों कि जिद है मर मिटने की।


मेरी तेरी कहानी को  नाम  क्या दे।
अहसास जिन्दा है पहचान क्या दे।
मुजमें तू जिन्दा है तुजमे मै  नहीं ,
फिर इस रिश्ते को अंजाम क्या दे।


मेरी  मजबूरी  ये  नहीं  कि  तू  दूऱ है।
मेरी मजबूरी ये नही कि तू मजबूर है।
लोग लांखो मिलते ज़माने कि राहों में ,
मेरी मजबूरी दिल को सिर्फ तू मंजूर है।   

जब  मेरी  हरेक  साँस पर नाम  तेरा है । 
जब  मेरी  हरेक  चीज पर  हक़ तेरा  है । 
क्यों ना सारे बंधन तोड़  एक हो जाएँ हम  ,
अब तो मेरी रूह पर भी सिर्फ हक़ तेरा है ।

"जय कुमार "



   

Thursday, 26 December 2013

मेरे हालत

 मेरे हालत आज मेरे खिलाफ हो  गये
 मेरे अपने किसी ओर के साथ हो गये
 किसी को खबर क्या दर्द क्या होता है ,
 नसीब के तारे ना जाने कहाँ खो गये।

 कश्तियाँ  डूबी मांझी से जाकर पूंछो
 जिंदगी कैसे लुटी मेरे हमराह से पूंछो
 राह के फासले इतने बड़ा दिए उसने ,
 मंजिल न मिले तो मंजिल से पूंछो।

 जब बेहोश थे हर पल साथ था तेरा
 बैठे थे तो उठाने का प्रयाश था तेरा
 जब खड़े हुये  चलने  को साथ तेरे ,
 तब बहुत दूर से खड़ा हाथ था तेरा। 

" जय कुमार "

Monday, 23 December 2013

साँझ ना देखी जिसने

साँझ ना देखी जिसने , 
वो भोर को क्या जाने . . . 
पतझड़ ना देखा जिसने , 
वो बसंत को क्या माने . . .

सुख दुख की छाँव धूप , 
रात दिन का जोड़ा खूब , 
श्याम श्वेत के रंग निराले , 
जो जीवन के रंग ना जाने , 
वो जीवन को क्या माने . . .

अंधेरो की राह जब तक , 
रोशनी की महफिल तब तक , 
कुछ अच्छा कुछ बुरा यहाँ , 
जो असत्य को ना पहचाने, 
वो सत्य को कैसे माने . . .

ऊपर नीचे धरती आकाश , 
आंगे पीछे और दूर पास , 
ज्ञान अज्ञान साथ रहते , 
अपनी अपनी भाषा कहते , 
जिसे निशा का आभाष नहीँ , 
वह दिन को क्या माने . . .


"जय "

Sunday, 22 December 2013

मेरी मजबूरी

मेरी  मजबूरी ये  नहीं  की  तू  दूर  है  दोस्त 
मेरी मजबूरी ये नहीं कि तू मजबूर है  दोस्त 
लोग लाखों मिलते हैं ज़माने कि इन राहो में
तेरी  वेवफाई  मुजको  कहाँ  मंजूर  है दोस्त 

"जय कुमार"   

मेरे भाव

कभी बुरे वक्त के हाल पर रोये
कभी अपने ही बदहाल पर रोये   
मेरी राहों ने मुझे कब रोका था
हम तो अपनी ही चाल पर रोये

"जय कुमार"

विखरना नही चाहता

चल चुका हूँ लौटना नहीँ चाहता ।
टूट चुका हूँ विखरना नही चाहता ।

तेरे दम पर जी रहा हूँ ये जिँदगी ,
उठ चुका हूँ बैठना नहीँ चाहता ।

अंधेरी राह मेँ उजालोँ की तलाश ,
चल चुका हूँ लौटना नहीँ चाहता ।

कौन कहता की तलाश जारी नहीँ ,
ढूड़ना जारी पर बताना नहीँ चाहता ।

कल की बात है जब वो मेरे साथ था ,
बिछड़ चुका अब मिलना नहीँ चाहता ।

जिसकी तलाश मेँ जिँदगी खोई है ,
वो अब मुड़कर देखना नहीँ चाहता ।

कई हकदार है इस जिँदगी के यार ,
हिस्से हो चुके हैँ बँटना नहीँ चाहता ।

"जय कुमार" १८/१२/२०१३ 

जख्म पर जख्म

जख्म को खुरेच कर क्या देखते हो दोस्त ,
तुने मेरे दिल को खुरेच कर तो देखा होता ।

जख्म पर जख्म देना तो कोई तुमसे सीखे ,
दर्द की परतो को कुरेदकर तो देखा होता ।

टूटकर चाहा दीवाना कहा जमाने ने मुझको ,
एक नजर दिल मेँ झाँक कर तो देखा होता ।

मैँ भटकता रहा जिन राहोँ पर उम्र भर ,                    
मेरे दर्द को राहोँ से पूँछकर तो देखा होता ।

मँजिल ना मिलती कोई गम ना था हमको ,
पर सही राहोँ पर चलकर तो देखा होता ।

मेरे जज्बात को भूल गया तू कोई बात नहीँ ,
अपने दिल के स्पंदन को छूकर तो देखा होता ।

कब तक साथ निभाया यहाँ वादो ने दोस्तो ,
एक बार रुह से प्यार कर तो देखा होता ।

"जय कुमार" १५/१२/२०१३ 

मेरे भाव

अपने गमोँ को छुपाकर तो देखा होता ।
ओरो पर फिदा होकर तो देखा होता ।
कितना सुकून मिलता है जह्न को मित्रो ,
किसी को खुशी देकर तो देखा होता ।।

तपकर के ओरो को प्रकाश दिया होता ।
गमोँ के हलाहल को खुशी से पिया होता । 
नम आँखो से विदा जमाना करता है ,
मुझे तूने हँसकर तो विदा किया होता ।।

"जय कुमार" 05/12/2013     

Wednesday, 4 December 2013

मेरे भाव

आज फिर कोई मुझे तड़पाने आ गया ।
मेरा सोया हुआ दर्द वो जगाने आ गया ।
कब तक छुपाऊँगा तुझसे अश्क अपने ,
मेरे आँखो के समुन्दर बहाने आ गया ।।

"जय कुमार" 03/12/2013               

मेला लगो

अबे कछु नई बिगड़ो अबे सबई सम्हल जाए रे ।
काय फसोँ आफत मेँ तै राम राम काये ने गाए रे ।

रातई दिन ते माया जोड़े कर कर उलटे काम ,
तोरो जो महर अटरिया कोनऊ संगे ने जाए रे ।

कछु करम तो अब तै नोने करले मूरख मानस ,
जो लोक सुधर जेहे भैया वो भी सुधर जाए रे ।

कोनऊ की काये ते सुन रओ अपने मन की सुन ,
जो जंजाल तो चलो आरओ काये देखन जाए रे ।

मेला लगो सदियोँ से पंछी को ऐसई पसायेँ ,
अब राम सहारो लेईके पिँजरा से उड़ो जाए रे ।

"जय कुमार" 03/12/2013

बात ईमान की

बस बात ईमान की करते सब ।
यहाँ काम दाम पर करते सब ।
किसको महसूस होता दर्द उसका ,
पहले अपना घर भरते सब । ।

दर्द को दर्द कहा जमाना दूसरा होगा ।
प्रेम को प्रेम कहा जमाना दूसरा होगा ।
अब वासनायोँ मेँ डूबा हमारा शहर ,
कहते है लोग कि इरादा दूसरा होगा ।।

किस किसको गुनहगार ठहरायेँ यहाँ ।
किस किस पर उंगली उठायेँ यहाँ ।
इक दिन देखा चलो हिसाब करते है ,
खुदको ही पहला गुनहगार पायेँ यहाँ ।।

"जय कुमार" 01/12/2013

मेरे भाव

ना जाने अब वो शहर कैँसा होगा ।
ना जाने अब मेरा रब कैँसा होगा ।
वक्त की डाल से मैँ टूटा हूँ दोस्तोँ ,
ना जाने हवाओँ का रुख कैँसा होगा ।।                  

"जय कुमार" 29/11/2013