फूलों से जख्म ,,,,खाते रहे ऐसे
कांटो पर प्यार,,, आने लगा है
रिश्ते खून के ,,,,पानी बने ऐसे
भूले कौन पराया कौन सगा है
"जय कुमार "
राजघाट की बाती रोती
गीता की परिपाटी रोती
अनाचार व,,दुराचार से
भारत मां की माटी रोती
जाति धरम पर दंगे होते
भाई भाई में ,,,,,,पंगे होते
दुबक रहे सच्चे ,कोने में
झूठे हर दिन ,,,,चंगे होते
वृध्दों का सम्मान नहीं है
रिश्तो मे अब जान नहीं है
टूट टूट कर,,,बिखरे ऐसे
संस्कारों की खान नहीं है
राम नाम पर धंधा होता
झूठी जाप से चंगा होता
मरने वाले ,,बहुत मिलेगे
पाखंडियो का फंदा होता
"जय कुमार "26/07/16
हर खुशी गम का सच्चा साथी यार होता है
अनकहा अनसुना एक सच्चा प्यार होता है
कड़ी धूप में छांव बन , साथ रहता वो दोस्त
गिले सिकवे से परे खुशी का संसार होता है
हर राज का राजदार ,,,, बनता रहे वो दोस्त
गम एक भी नहीं खुशियां ,,,,,, हजार होता है
गमों के बादल या ,,,,,,, दुर्गम रास्ते हों हजार
साथ हो दोस्त पतझड़ में भी,बहार होता है
सच्चे दोस्त को कभी ,,,,,,, खोना न मेरे यारों
जिंदगी में यह मोतियों का ,,,,,,,,, हार होता है
सारे रिश्ते होते है जमाने के ,, अलग अलग
दोस्त सारे रिश्तों का ,,,,,,, उपसंहार होता है
"जय कुमार"22/07/16
चुन चुन कर अब गोली मारों ,,, घाटी के गद्दारों को !
सय मिलती हो जिनसे उनको , काटो ऐसे तारों को !
जिस भाषा में समझे आका,,, , उसमें समझाना होगा ,
भारत अब न सहन करेगा , लाल चौक के नारों को !!
"जय कुमार " 15/07/16
कश्मीर सुलग रहा है फिरसे , आग लगी है घाटी में
खून की होली खिल रही है , कुन्डलवन की माटी में
लाल चौक से भाले चलते , ,,,हिंदुस्तान की छाती में
कहीं भूल तो बडी हुई है ,,,,,,,,,,,घाटी की परिपाटी में
कुर्सी दिल्ली की चुप रहती ,,, घाटी में नाग पलते हैं
दूध हमारा पी पी कर के ,, घाटी में जहर उगलते हैं
आतंकियों के समर्थन में ,,,,,,,,, घाटी में नारे लगते हैं
फूलों के बागों में आकर ,,,,,,,, कुकुरमुत्ता से बढ़ते हैं
नमन हमारा उस सेना को ,,,,,,, खडी हुई है घाटी में
छांट छांट कर गोली मारती ,,,, आतंकी की छाती में
कोई रंग रंग नहीं रहा ,,,,,,,,,,,,,,, रंग रंगीला खाकी में
गद्दारों के मंसूबों को ,,,,,,,,,,,,,,,,,, मिला रहा है माटी में
"जय कुमार" 13/07/16