Monday, 28 August 2017

कौन कहता  वक्त हर  जख्म  भर देता
मेरे   दिल  के  जख्म   हरे  के  हरे  रहे

सूख  जाता  होगा समुंदर  तेज धूप में
मेरी आंखों  में  अश्क  भरे  के भरे रहे

कागज और  स्याही धमाल  करते रहे
धरातल  पर सारे  वादे धरे के धरे रहे

जिंदा  करते  रहे  वादे   ख्वाहिशों  को
वफाओं   के  आलम   मरे  के  मरे  रहे

अमन  चैन  की  बातें बज्म में  बैठकर
घर  के  अंदर  मासूम  डरे  के  डरे रहे

"जय कुमार "

खुशी इक से नहीं मिली , गम हजारों का झेला है
साथ  देता रहा सबका , सफर मेरा ही अकेला है
टूटे वादों  कि कहानी , कही न जाती अब मुझसे
मुहब्बत रोज  रोती है  ,  जज्वातों  का  झमेला है

सूख जाते है आंसू भी, तपन जब प्यार की तपती
याद उसकी सताती है , धूप  चांदनी  सी  लगती
मीठी आवाजे अब भी , हवा  कानों  तक लाती है
हाथ  मिलकर   चले गये , वक्त  ने  खेल  खेला है

लहरों की इक ख्वाहिश, बस साहिल से मिलना है
कलियों की इक ख्वाहिश , फूलों   सा   खिलना है
लहरे  दम  तोड   देती , फूल  खिलकर   टूटते  है
तमाशा  रोज  होता  है , यह  जमाने  का  मेला  है

"जय कुमार "

Sunday, 27 August 2017

राम रहीमा  कर  रहे , काले   कूले  काम
रावण जलते ही कहे , मैं ही इक बदनाम

जय कुमार

Saturday, 26 August 2017

एक प्रयास _/\_  . .

गीत  गजलों  की  भाषा हूँ ।
दर्द  मजलूम  का  गाता  हूँ ।

आँसू सूख गये  आंखों  से ,
उनका मैं  मर्ज  सुनाता  हूँ ।

बिछोना  है धरती जिनकी ,
उनके  मैं    बीच   पाता  हूँ ।

गीत  शहनाई  के न  आते ,
मजबूरी मन की सुनाता हूँ ।

घोर निराशा  के  अंधेरों में ,
एक आशा दीप जलाता हूँ ।

जिन्हे  जमाने ने धुतकारा ,
मैं  उनको  गले  लगाता हूँ ।

वतन पर जो  जान  लुटायें ,
मैं उनको शीश झुकाता हूँ ।

कदम मिलाकर ही चलने में ,
मैं  जय  विश्वास  जताता हूँ।

"जय कुमार"

Tuesday, 22 August 2017

कब तक यूं अब रोना होगा
होने   दो  जो   होना    होगा
चोखे   बीज  हमारे  हैं  जब
फल भी चोखा  सोना  होगा

"जय कुमार "




Friday, 18 August 2017

रिश्तों की डोर  कच्ची  हो चली है !
घर  की  दीवार पक्की  हो चली है !
गांव  के  स्वर्ग  को  छोड़कर  भागे ,
शहर की दुनिया सच्ची हो चली है !!

"जय कुमार"

घरों की दीवार  पक्की हो  गई है ।
शहर की दुनिया सच्ची हो गई है ।
चकाचौंदी दुनिया स्वार्थ  से भरी ,
रिश्तों की डोर  कच्ची हो  गई है । ।

"जय कुमार"

बात    बनाकर  ।
चाल   चलाकर ।
चले  गये    तुम ,
नजर   चुराकर ।।

ख्वाव दिखाकर ।
राज     बताकर ।
भुला  गये   सब ?
हौँठ   सिलाकर ।।

साथ मिलाकर ।
खुशी सजाकर ।
लूट लिया क्यों ?
प्यार  दिखाकर ।।

नीर    बहाकर ।
बीज   उगाकर । 
काट दिया क्यों ?
फूल  खिलाकर ।।

"जय कुमार"

Tuesday, 15 August 2017

जाति  धर्म  की  बाते   करके
विचारों  को  कैद  कर  लिया
कभी दरिया  को  देखा  नहीं
बस कुंआ से पानी भर लिया

"जय कुमार "

Sunday, 13 August 2017

मौत

मौत तू   इतनी   मगरूर  मत  हो
जिंदगी जिया मैं जिंदगी की तरह

"जय कुमार "

कदम    पीछे   हटाना  अब   नहीं
चल  चुका  हूं  बहाना  अब   नहीं

मंजिल   इंतजार  करती  हो  जब
दूरी   से     घबराना    अब    नहीं

नर्म  राह  कि  चाहत  से   निकल
आलस्य  को  बुलाना  अब   नहीं

सपने   नहीं   हकीकत   है    यही
काम  से  दिल  चुराना  अब  नहीं

कल क्या  हुआ  कल  क्या  होगा
इस आज  को भुलाना  अब  नहीं

वक्त ने  खेल   खेला  रुलाने   का
किसी और  को रुलाना अब नहीं

हाथ  नहीं  जब  दिल  मिलते   थे
वह   गुजरा   जमाना   अब   नहीं

जिस्म  कि  चाहत रही प्रेम  कहां
इनसे   दिल   लगाना  अब   नहीं

गुजरा  जय  आग  के  दरिया   से
मुहब्बत  का  फंसाना   अब  नहीं

"जय कुमार "२१/०९/१७

मंदिर मस्जिद में बहुत बैठा लिया
कभी  दिल  में   बैठाकर तो  देखो
सारी   रंजिशे  भूल   जाओगे तुम
आंखों  से  पर्दा  हटाकर  तो देखो

"जय कुमार "

Saturday, 12 August 2017

पीड़ा

हमारे क्रांतिकारी, हमारे नये भारत के जनक, हमारी धरोहर , विश्व के गौरव, जिनकी आत्म शक्ति का लोहा दुनिया ने माना व अनुशरण किया, जिनने अपना जीवन देशवासियों के भविष्य के लिए खपा दिया, उनके अनगिनत नाम है मुख्य नाम मंगल पांडे , झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, राष्ट पिता महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, लाला लजपत राय, लोकमान्य तिलक , चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, बी आर अंबेडकर, लाल बहादुर शास्त्री, जवाहर लाल नेहरू इत्यादि !!

हमारे देश को एक नई दशा व दिशा देने में इन व इन जैसे हजारों महापुरूषों ने अपना योगदान दिया हम इनके योगदान की बदौलत हम आज नई पहचान बनाने में कामयाब रहे है !!

हमारी आजादी के ७० साल हो चले है शुरूवात से हमने अपने महापुरूषों के योगदान को समझा सम्मान दिया !

लेकिन समय के साथ धीरे धीरे महापुरूषों को बांटने का काम होता रहा हमने अपने अपने आदर्श पुरूष बना लिए बांट लिए, यहां तक भी कोई बात नहीं, बंटे हुए इन लोंगो ने महापुरूषों की निंदा शुरू कर दी, कोई किसी को श्रेष्ठ मानने लगा, कोई किसी को, आम लोगो के बीच बदनाम किया गया,  राजनैतिक पायदे के लिए यह सब चलता रहा ! कुछ महापुरूषों के निर्णयों पर आये दिन सवाल किये जाते रहे है , आज खुले आम सोशल मीडिया पर हमारे नायको को बिना तथ्य के बदनाम किया जाता है  हर दिन आपको जहर उगलने बाली बाते मिलेगी !!खुलेआम अपशब्दों का प्रयोग किया जाता है जो पीड़ादायक है !!!!

इन नायको के रास्ते अलग रहे होगे, लेकिन नियत सबकी एक ही थी मंजिल सबकी एक ही थी , उस वक्त के हालातों के अनुसार उन्होंन उचित निर्णय लिए हमें यह समझना होगा !!

हमारे ही महापुरूषों का हम ही अपमान करें जिन्हे संसार प्रेरणा का स्त्रोत मानता है यह कहां तक उचित है ??

"जय कुमार"

Friday, 11 August 2017

मचलने के बहाने ढूढते हो

बहारों   के   दीवाने    ढूंढते   हो
बहकते अब  परवाने  ढूंढते   हो
मुहब्बत तो खूब करते हो हमसे
मचलने   के   बहाने   ढूंढते   हो

"जय कुमार "

ख्वाहिश दवा मांगती रही
बदलती हवा  मांगती रही
जिंदगी   एक  न   हो  पाई
मोहलते सवा मांगती रही

"जय कुमार "११/०८/१७

दिल्ली के दरबारों  का सच क्यों कोई  लिखता  नहीं
सत्तर  बर्ष   के  बूढे   सपने  सत्य  तुमे  दिखता  नहीं 
वादे  और   इरादे  इनके  लगते  नदी  के  दो साहिल
पैकिंग  चाहे सुंदर  करलो  सदियों  झूठ छिपता नहीं

"जय कुमार "

Thursday, 10 August 2017

बीच  राह  पर  दंगल   होते
लोग शहर  के  आपा  खोते

कोई  लुटता  कोई   पिटता 
कानूनी      रखवाले    सोते

झुलझ गया दामन फूलों से 
अंगारों   की   फसलें   बोते 

शहर  जल जायेगा जालिम
मासूम  लोग आँख  भिगोते

मंजर  मौत  के  मन में  बैठे
अमन  चैन   कोने   में  रोते

मुफलिसी  में   लुटा  घरौंदा
जय बिखरे फूलों को पिरोते 

"जय कुमार"9/08/15

Sunday, 6 August 2017

असली   सूरत  छुपाते  रहे ।
बनावटी रुप    दिखाते  रहे ।

घर  रोशन  करने  के   लिए ,
सबके  घौंसले  जलाते  रहे ।

किसी  को  देखा  उजाले में ,
जले  दीप  क्यों  बुझाते रहे ।

खिलखिलाते   पंछियों   को ,
रंज  व  गम से  मिलाते  रहे ।

गहरी नींद सो  गया  कल मैं ,
सफर  के साथी  बुलाते रहे ।

जय  बैचेनी  में   मिला  क्या ,
रोज  ही  अश्क  बहाते  रहे ।

"जय कुमार"

Friday, 4 August 2017

वासना  इंसान  को  हैवान  बना  देती है
साधना जीवन को  वरदान  बना देती है
किसी ने न देखा अपनी आँखो से ईश्वर
भावना  पाषाण को भगवान बना देती है

"जय कुमार"

Tuesday, 1 August 2017

एक प्रयास _/\_ . . . . .

यह  तेरा  आसियाना   है  जो
फूलों से घिरा ठिकाना  है  जो
खूबसूरत   जमाने   के  सपने
फँसा   इसमें   दीवाना  है  जो

मिलकियत  तेरी बस पानी है
एक दिन  तो इसे बह जानी है
शोहरत  में  डूबा है  तू  इतना
यह पल दो पल की कहानी है

जाति  धर्म  के  फंदो  में  फँसा
रंग  रुप के  इन कुंदो में फँसा
इस  तन  की  विसात क्या  है
चार  दिन  के चिन्हो  में  फँसा

रजनी  भोर   की   निशानी  है
भोर   रजनी  की    कहानी  है
दोपहर  के   सूर्य  की  रोशनी
साँझ    आने   पर    पुरानी  है

"जय कुमार"01-08-14