काल की ,डाल बैठा
मैं मैं ,,,,,,,मिमयात है
स्वारथ की बन्शी से
सबई खो,,,रिझात है
प्रेम के ,,,,,,,,,अँगना में
छुरियाँ ,,,,,,,,चलात है
प्यार के ,,,परिन्दों पर
बन्दिशें ,,,,,,,लगात है
माया के ,,,,,,,जालों में
साजिश,,,,,,, रचात है
वासनाओं,,,,,,,, में पड़
जीवन ,,,,,,,,,,नचात है
मिटने वाले,,, तन को
खूबई ,,,,,,,,,,सजात है
एक कटोरा ,,,,मिट्टी
तन की ,,,,,औकात है
"जय कुमार "१९/०८/१५