Friday, 20 November 2015

ऊँचाई न

ऊँचाई न रही ,,,,,,उड़ानों में
जज्बा न दिखता जवानो में

भविष्य गुम रहा वीरानों में

" जय कुमार "२०/११/१५

बस्ती में

बस्ती में,,देखा दीवानो को
करीब से जाना वीरानो को

"जय कुमार"२०/११/१५

सख्त हालात

सख्त हालात में भी, रस्म ए मुहब्बत निभाता रहा 
रेगिस्तान की धरती पर वफ़ा के फूल खिलाता रहा 
सांसे उखड़ी थी ,,,,,अँधेरी रात में , आँधी शबाब पर
शीत लहर का कहर मैं आश का दीपक जलाता रहा

"जय कुमार "२०/११/१५

Wednesday, 18 November 2015

कलम उठती

कलम उठती नहीं सच लिखने के लिए
तैयार सब खड़े क्यों,,,,,बिकने के लिए

मुफलिसी के मर्ज,,,,,,सजते झोपडी में
अमीरों की रोटियाँ,,,,,,,सिकने के लिए

मुहब्बत की बात,,,,,रात के आगोश में
उजालों में छोड़ा,,,,,,,,बिलखने के लिए

वागवान की  हकीकत क्या,,,बयाँ करूँ
फूलों को खिलाया,,,,,,मसलने के लिए

दिल चुरा कर ले गये वो,,,,,इक पल में
चोर तो आते ही,,,,,,,,,,,,लूटने के लिए

अरमान दिल के दिल में ही जिये रोज
छोड़ जाते हमदम,,,,सिसकने के लिए

जय वादों के टूटने से,,,,,,,,,,मत टूटना
वादे तो होते बस,,,,,,,,,,,,टूटने के लिए

"जय कुमार "१८/११/१५


वफादारी गर

हर ख़ुशी गम में यारी जिंदगी बन जाती है
वफादारी गर हो दोस्ती बंदगी बन जाती है

"जय कुमार "

Monday, 16 November 2015

कुछ मुहीम

कुछ मुहीम छेड़ते है ,,,,,,,जमाने के अंत की
इंसान को समझे नहीं,,,,,बात करते पंथ की
इंसानियत के गीत हो , बैर के न हो निसान
आज फिर जरुरत है , साबरमति के संत की

"जय कुमार " १७/११/१५




झूठ सच

झूठ सच होने ,,,पर अड़ा है
करेला चन्दन पर,,, चढ़ा है

सत्य देखने की क्षमता नहीं  
झूठ का जाल लगता बड़ा है

सत्य सिमट रहा है कोने में
असत्य पैर पसार के खड़ा है

गोडसे के भक्त,,,, बढ़ते रहे
राजघाट अब,,,,सूना पड़ा है

"जय कुमार "





Saturday, 14 November 2015

बंदगी कहते

कैंसी ये बंदगी दरिंदगी में 
इबादत ये कैंसी गंदगी में 
जन्नत तो धरती पे होगी 
सुकूं गर दोगे जिन्दगी में

" जय कुमार "

Monday, 9 November 2015

दीपक जला

दीपक जला आऊँ ,, किसी कुटिया में
ख़ुशी जल भर आऊँ किसी लुटिया में
दीपावली के इस ,,,, पावन प्रकाश में
लक्ष्मी को देंखूं अपनी बहु बिटिया में

"जय कुमार "९/११/१५

रोज रोज

रोज रोज का पंगा हो
भाई भाई का दंगा हो
परिवार जो लड़ते रहें
 राजनेतों का धंधा हो 

"जय कुमार "९/११/१५

शांति का

शांति का आलाप कर
शुध्दता की जाप कर
संत आज बनने लगे
खतरे को,,, माप कर

"जय कुमार "९/११/१५

क्यों चल

क्यों चल रहे हो अकड़कर
कैंसे रहोगे,,,,,,, झगड़कर
सदियों से साथ,,, रहे हम
इक दूजे,,, हाथ पकड़कर

" जय कुमार "९/११/१५





आफत से

आफत से कहदो जरा दूर रहना ,
हर हाल में जीने की कसम खाई है।
भले ही गर्दिश में रहे हो सितारे ,
जिन्दगी की हर रस्म निभाई है।
डरा न पायी कभी भी मुफलिसी
तम में दीपक से लड़ने का दम कंहा 
मुसीबत में ताकत दुगनी होती ,
हमने तो सीरत ही ऐंसी पाई है।

" जय कुमार "

Sunday, 8 November 2015

हौंसलो

हौंसलो की कहानी लिखता हूँ
जिंदगी की रवानी लिखता हूँ
दिल में पुष्पों सी कोमलता
फौलाद की जवानी लिखता हूँ

" जय कुमार "८/१०/१५

Saturday, 7 November 2015

इस दौर

इस दौर में जरा दूरी बनाकर रख ,
करीबी लोग ही गिराया करते है
तपाक से गले मत लग जाना यार 
हाथ मिलाकर गिरेवान पकड़ते है

Friday, 6 November 2015

टुकड़ो पर

टुकड़ो पर जीने से मर जाना अच्छा है
जिल्लत के महलों से घर जाना अच्छा है
जीना मौत से बत्तर मत बनाना यारों
मरने से पहले कुछ कर जाना अच्छा है

"जय कुमार "६/१०/१५

दरद अब

दरद अब  गीत गाने लगे 
जख्म भी मुस्कराने लगे
काल के खेल में फंसकर
प्रीत के साथी...जाने लगे

"जय कुमार "

Thursday, 29 October 2015

जख्मों

जख्मों की बहारों से ।
झूठे उन ..सहारों से ।
उम्मीद रख्खी हमने ,
दूर जाते किनारो से ।।
"जय कुमार"28/10/15

तू एक

तू एक ही ..गुनाह कर !
हर कविता पे वाह कर !!
"जय कुमार"28/10/15

भले बुरे

भले बुरे के भेद में ..... उलझा रहा हूँ ।
अपने अवगुण रोज मैं सुलझा रहा हूँ ।।
"जय कुमार"28/10/15

जब से सगे

जबसे सगे ही ,,,,,,,,कटने लगे हैं !
जमाने हम पर ,,,,,,,हँसने लगे है !!

किसको रही परवाह रिश्तों की ,
रिश्तों में व्यापर ,,चलने लगे है !

बैठा बूढ़ा बरगद ,,,गुमसुम अब ,
 घास की इज्जत ,,करने लगे है !

वजूद जिससे बोझ ,लगने लगा ,
टहनी को तना ,,,,,खलने लगे है !

प्रबन्ध का होता ,,, अनुबन्ध जी ,
सबंध जब से,,,, बिखरने लगे है !

मायूसी के मौसम ,,,,,सजते चले ,
उम्रदराज घर से ,,,,डरने लगे है !

चन्द पैसों की भूख ,,,,जाती नहीं ,
स्वारथ से साथी , मिलने लगे है !

वासनाओं में दौडा ,,,,,जय अंधा ,
मरम प्यार के ,,,,,,बदलने लगे है !!

"जय कुमार"28/10/15

Sunday, 25 October 2015

हौसलों के

हौसलों के पंख लगाकर उड़ जाऊँगा ।
संघर्षो को पैर बनाकर ..बढ़ जाऊँगा ।
दुर्गम हिमालय जो मेरा .. पथ रोकेगा ,
संकल्पो की डोर बाँधकर चढ़ जाऊँगा ।।
"जय कुमार"25/10/15

इंसानियत

इंसानियत से गिरे हुए ।
तिजोरी अपनी भरे हुए ।
झूठ मालामाल हुआ अब ,
सत्य के कपड़े फटे हुए ।
छिलके सन्तरे के पहने ,
अन्दर से जो .. कटे हुए ।
बनते रहते जेन्टल मेन ,
भीतर से जो . लुटे हुए ।
कंगारू पत्थर . चमकते ,
नींव के पत्थर हिले हुए।
हाथ मिलाते हमदर्दी से ,
दिल में गहरे गिले हुए ।।
"जय कुमार"24/10/15

Thursday, 22 October 2015

उजड़ने

उजड़ने की सूरत पाये बहारोँ से ।
दरद के सैलाब .. आये सहारों से ।
प्यार को ढ़ूढ़ते रहे उम्र- ए- हयात ,
खुशी इक से न मिली गम हजारोँ से ।
मोहब्बत किरदार से सब जमाने में ,
नजरे मिली कहाँ दिल के नजारों से ।
उम्मीद रखता हूँ भरोसा जिंदा है ,
भँवर में फँस गया प्यार किनारों से ।
टूटे दिल के सहारे मिलते गर ये कहीं ।
खरीद लेता इक दिल फिर बाजारों से ।।
"जय कुमार"23/10/15

मोहब्बत

मोहब्बत किरदार से करता रहा ।
हुस्न पर तेरे यूँ ही .. मरता रहा ।
इस रोग में दरद होता कहाँ कभी ,
परवाना बन शमा से जलता रहा ।।
"जय कुमार"22/10/15

सत्य

सत्य असत्य का दंगल हुआ ।
सत्य का सदैव , मंगल हुआ । ।
"जय कुमार"22/10/15

Tuesday, 20 October 2015

पूँछ लिया

पूँछ लिया किसी ने चलते चलते तेरी मंजिल क्या है ??
ख्वावो का खूबसूरत शहर पल में धराशाही हो गया ।।
"जय कुमार"18/10/15

बिना

बिना सर पैर का झूठ है ,
पर चलता बेहद खूब है ।।
"जय कुमार"18/10/15

मुफलिसी

मुफलिसी के जब मर्ज सजते है ।
जिंदगी के तब बारह बजते है ।
फैला देता हाथ तब वो सामने ,
निवालों के दरवाजे खटकते है ।।
"जय कुमार"17/10/15

छाती पर

छाती पर सिर्फ दुश्मन वार करते है ,
पीठ पर वार करना दोस्तों से सीखें ।।
"जय कुमार"17/10/15

लाल प्याज

लाल प्याज की लत बुरी , सर पे बैठी दाल ।
अच्छे दिन जे आ गये ,,,, काये करें मलाल ।
काये करें मलाल ,,,,,, बाबा कहाँ अब आवे ।
जनसेवक को राज ,,,,, विदेशन पैंसा जावे ।।
"जय कुमार"16/10/15

धरती की कहानी

धरती की कहानी अम्बर सुनायेगा ।
आज जो दिया कल लौटके आयेगा ।
संघर्ष को जिसने सीने से लगाया ,
समय उसके ही गीत गुन गुनायेगा ।।
"जय कुमार"15/10/15

अंतर्मन में

अंतर्मन में मद मस्त हो जा !
अंतस की गहराई में सो जा !
खुली खिताब पड़े दुनिया ये ,
मैं में रमकर तू मैं में खो जा !!
"जय कुमार"15/10/15

जमाना

जमाना .. बदल गया ।
मयखाना बदल गया ।
स्वार्थ की पी मदिरा ,
याराना .. बदल गया ।।
"जय कुमार"14/10/15

दोस्तों का

दोस्तों का ख्याल जब जब जहन में आया ,
मेरी पीठ के जखम गहरे ..... हरे हो गये ।।
"जय कुमार"14/10/15

अपनी माँ

अपनी माँ के पैर,,, सहला न पाया !
लख्ते जिगर कभी कहला न पाया !!

दूध पिलाया था ,,,,,,,,अपने खून से ,
उसे दो बूँद पानी ,,,,,पिला न पाया !

गंदगी पर लेट छाती से लगा रखा ,
सुकून से दो पल उसे सुला न पाया !

तरसती रही वो ,,,,,,दो निवालों को ,
डर बीबी का जुबाँ ,,,,हिला न पाया !

खाँसने की रोज ,,,,,,आवाज सुनता ,
बाजार से मैं दवा ,,,,,,,,,,ला न पाया !

तड़पती रही टूटी ,,,,,,,,खाट पर माँ ,
फिर भी मैं ,,,,,,,,तिलमिला न पाया !

दुआ देती रही ,,,,,,,बेसुद बिस्तर में ,
दो पल उसके करीब ,,जा न पाया !

चली गई दुनिया को ,,,छोड़कर माँ ,
ममता भरी आँखे,,,, भुला न पाया !

हरेक बरष तरपण,,, करता माँ का ,
तस्वीर से नजरे,,,, ,मिला न पाया !

सजा का हकदार ,,,,हूँ मेरे भगवन ,
जय बेटे का फर्ज ,,,,निभा न पाया !!

"जय कुमार"13/10/15

बनाया

बनाया था झूठी रेत से जो घरौंदा ,
जर्रा सी हवा के झोंके से उड़ने लगा ।।
"जय कुमार"12/10/15

"आज का आदमी"

"आज का आदमी"
आदमी के चेहरे अनेक ,
पढ़ना बड़ा मुश्किल हुआ ।
आदमी की जुबान अनेक ,
सुनना बड़ा मुश्किल हुआ ।
बाते प्रेम व विश्वास की ,
कार्य स्वार्थ तक सीमित ,
आदमी के दिखावे अनेक ,
देखना बड़ा मुश्किल हुआ ।।

"जय कुमार"12/10/15

दरद मेरे

दरद मेरे , मिटा दीजिए ।
प्यास मेरी बुझा दीजिए ।
राह पड़ा मुर्दा कहने लगा ,
इक रोटी खिला दीजिए ।।
"जय कुमार"11/10/15

कहीं मिले

कहीं मिले कहीं फरियाद से रहे ।
वो जखम गहरे आबाद से रहे ।
मिलन की तमन्ना जिंदा रही दिल में
भूले बिसरे ख्वाव याद से रहे ।
यूँ तो सबकुछ पाया जिन्दगी से ,
बिन उसके हरपल बर्बाद से रहे ।
"जय कुमार"10/10/15

अड़ खड़े

अड़ खड़े ,, ऐँठे रहे ।
छिप यहाँ कैसे रहे ।
कहर की वो रात थी ,
बुत बने ,,, बैठे रहे ।
शहर की हरेक गली ,
छिप गई ,, ऐसे रहे ।
दर बदर होकर गये ,
कल चले , जैसे रहे ।
समय के हर पहर में ,
जय लुटे ,, वैसे रहे ।।
"जय कुमार"

बहकते नहीं

बहकते  नहीं कदम किसके इस जमाने में ।
आकर मिलो आज हमसे इक मयखाने में ।
कैंसी ये मुहब्बत ..... कैंसे ये फसाने अब ,
भुला देगेँ दुनिया को ..... पीने पिलाने में ।।
"जय कुमार"6/10/15

भली बुरी

भली बुरी लगती नहीं , मोटी जिनकी खाल ।
वोटों की टाँनिक मिले , बदले उनकी चाल ।।
"जय कुमार"5/10/15

ज्ञानी अपने

ज्ञानी अपने ज्ञान का ,, ,,,,,करत रहे गुणगान !
जड़ता जग जाहिर करें , खोत जाय सम्मान !!

"जय कुमार"

चीरकर सीना

चीरकर सीना मुश्किलों का ,
चलने का दम रखता हूँ ।
गरल पीकर भी जिन्दगी में,
हँसने का दम रखता हूँ ।
काल के कहर झेलकर जिये
डरा नहीं नियति से कभी ,
काली रात की आँधिओं में ,
जलने का दम रखता हूँ ।।

"जय कुमार"4/10/15

खुशबु पुष्प

खुशबु पुष्प की लेकर चला गया कोई ।
बीज खार के .. बोकर चला गया कोई ।
हर रन्ज सह लेता हर राह चल लेता ,
दरद प्यार का...देकर चला गया कोई ।।
"जय कुमार"3/10/15

राम राम कहते

राम राम कहते चलो , सबकी राखे राम ।
एक राम के नाम से , बिगड़े बनते काम ।
बिगड़े बनते काम , ताज सर पे आ जावे ।
साथ रहे आवाम , राज के सब सुख पावे ।।
"जय कुमार"30/09/15

कभी साथ

कभी साथ मिलकर वादे सजाये थे ।
प्यार की फसलोँ के बीज लगाये थे ।
मिलने बिछड़ने का सवाल नहीं था ,
दिया बाती बनके दीपक जलाये थे ।।
"जय कुमार"29/09/15

हर तरफ

हर तरफ एक ही ,,,,,,,,,,मंजर देखा है !
खिले फूलों पर ,,,,,,,,,,,, खंजर देखा है !!

फसल प्यार की जहां उगा करती थी ,
उसी जमीन को ,,,,,,,,,,,,,बंजर देखा है !

मुखौटा लगाकर ,,,,,,,,,,,घूम रहा है तू ,
दिखता नहीं जो ,,,,,,,,,,,,अंदर देखा है !

उछल कूंद अभिमान में ,,,,,,,करता तू ,
रूप आदमी में,,,,,,,,,,,,,,,, बंदर देखा है !

किसान की लड़की ,,,,,,,जवान हुई है ,
पिता के दिल में, ,,,,, , बबंडर देखा है !

हमेशा खुश मैं ,,,,,,,,रखता हूं उसको ,
आंखों में उसके ,,,,,,,,,समुंदर देखा है !
 
इतना मुस्कराता है ,,,,,,,,,महफिल में ,
दिल में खुशी का,,,,,,,, खंडर देखा है !!


"जय कुमार"27/09/15

मौसम आँगन

मौसम आँगन में सजते रहे ।
दीमक दामन में लगते रहे ।।
शहनाई की आवाजें गुमी ,
आबरू के वस्त्र जलते रहे ।
कफन जनाजा ढूंढ़ता रहा ,
जिस्म भेड़िया निगलते रहे ।
कत्ल रूह का होता रोज ही ,
गुमनामी के गीत बजते रहे ।
नीली नीली आँखों के ख्वाब ,
भरे बाजार में मचलते रहे ।
जीत की उम्मीद में रोज ही ,
जय हार दहलीज चढ़ते रहे ।।
"जय कुमार"24/09/15

अड़ खड़े

अड़ खड़े ,, ऐँठे रहे ।
छिप यहाँ कैसे रहे ।।
कहर की वो रात थी ,
बुत बने ,,, बैठे रहे ।
शहर की हरेक गली ,
छिप गई ,, ऐसे रहे ।
दर बदर होकर गये ,
कल चले , जैसे रहे ।
समय के हर पहर में ,
जय लुटे ,, वैसे रहे ।
"जय कुमार"23/09/15

पानी की चाह

पानी की चाह से नदिया खुद रास्ता बनाती है ।
नियमों से अपने प्रकृति खुद संतुलन बैठाती है ।
दिल भर जाते तन मर जाते प्रेम रुहानी हो तो ,
कायनात खुद अर्श से फर्स पर राह दिखाती है ।।
"जय कुमार"23/09/15

विश्वास

विश्वास हिमालय सा अटल हो ।
मन निश्चल निर्मल गंगा जल हो ।
लड़ जाये हम हर इक बदी से ,
भुजाओं में फौलाद सा बल हो ।।
"जय कुमार"22/o9/15

Thursday, 17 September 2015

शब्दों से तीर

शब्दों  से  तीर  चलाता  हूँ ।
शब्दों  से  नीर   बहाता  हूँ ।।

मैं प्यार को  शब्दों में लिखूँ ,
शब्दों  से  गीत  बनाता  हूँ ।

शब्दों में अहसास ह्रदय के ,
शब्दों  से  मीत  रिझाता हूँ ।

शब्द  प्रेम  की  अनूभूति है ,
शब्दों  से  प्रीत  बढ़ाता  हूँ ।

शब्दों  की  माला  गूंथू   मैं ,
सुन्दर सी  रचना लाता हूँ ।

अंतस में जब भाव उमड़ते ,
शब्दों से  खूब  सजाता  हूँ ।

चलते फिरते हरपल ही मैं  ,
शब्दों का जाम पिलाता हूँ ।

भाव किसी के पडकर के मैं ,
शब्दों  में  उन्हे  बताता   हूँ ।

भाव ह्रदय  कागज पे लिखूँ ,
अजय प्रेरणा  बन  जाता हूँ ।।

"जय कुमार"16/09/15

Wednesday, 16 September 2015

हिंसा से धरती

हिंसा से धरती थर्राये , अहिंसक राज्य लाना होगा
मूँक पशुओं की सुन पुकार , वीर तुम्हे आना होगा

कृष्ण तुम्हारी गैया कटती , शिव का नंदी घायल है
गौमाता के आँखों में आँसु , लहू से लथपथ आँचल है
दूध दही की नदिया सूखी , अब कर्त्तव्य निभाना होगा

हिंसा से धरती थर्राये , अहिंसक राज्य लाना होगा
मूँक मूंपशुओं की सुन पुकार , वीर तुम्हे आना होगा

अनाचार और दुराचार से , पीड़ित पर्यावरण हुआ
मानव नीति भूल चला है , मानवता का क्षरण हुआ
देश धर्म के खातिर अब , क्रांति बिगुल बजाना होगा

हिंसा से धरती थर्राये , अहिंसक राज्य लाना होगा
मूँक पशुओं की सुन पुकार , वीर तुम्हे आना होगा

माता की मूक कराह क्यों , तुम्हे सुनाई देती नहीं
देखकर अनाचार जवानी , क्यों अंगड़ाई लेती नहीं
दूध कीमत भुला चुके हो , कर्ज तुम्हे चुकाना होगा

हिंसा से धरती थर्राये , अहिंसक राज्य लाना होगा
मूँक पशुओं की सुन पुकार , वीर तुम्हे आना होगा

हिन्दुस्तान की धरती पर , क़त्लखाने सरेआम है 
मूक पशुओ की यूं हत्या , सर पर हमारे इल्जाम है
खून बहाकर अपना अब , गौमाता को बचाना होगा

हिंसा से धरती थर्राये , अहिंसक राज्य लाना होगा
मूँक पशुओं की सुन पुकार , वीर तुम्हे आना होगा

"जय कुमार "१६/०९ /१५








Sunday, 13 September 2015

लुटी लुटी हर

लुटी लुटी हर बस्ती है ।
जान आप की सस्ती है ।।
कोमलता को कुचल रहे
शहरों में जबरजस्ती है ।
उम्र ए लिहाज भूल रहे
आवारों की ... मस्ती है ।
लज्जा के ..तटबंध टूटते
मिटने वाली .. हस्ती है ।
दीपक की तम से यारी
छेदों वाली .... कस्ती है ।
"जय कुमार"28/08/15

अपने ही गुलशन

अपने ही गुलशन में हम ,
आओ आग लगायें आज !
आरक्षण कि माँग करें हम ,
अपना चमन उजाड़े आज !!

जितना तुम हुड़दंग करोगे !
झोली उतनी , खूब भरोगे !
जातिये शक्ति दिखाकर के ,
फूट का बिगुल बजायें आज !!

आरक्षण कि माँग करें हम ,
अपना चमन उजाड़े आज !!

बँट जाओ तुम चारों ओर !
निकलेगी खुशियों की भोर !
तोड़ फोड़ के आग लगा के ,
भारत का सर झुकायें आज !!

आरक्षण कि माँग करें हम ,
अपना चमन उजाड़े आज !

भारत माँ के आँसु पीकर !
मिट्टी के दर्दो पर जीकर !
राष्ट धर्म के चिथड़े करके ,
अपना काम बनाये आज !!

आरक्षण की माँग करें हम ,
अपना चमन उजाड़े आज !!

कोई उँचा ,,,,,,, कोई नीचा !
कोई पिछड़ा कोई अगड़ा !
भारतीय दिखता न कोई ,
आओ चलन बिगाड़े आज !!

आरक्षण की माँग करें हम ,
अपना चमन उजाड़े आज !!

"जय कुमार"27/08/15

आरक्षण की आग

आरक्षण की आग में जल रहा सारा देश है ।
घोड़ों को जंजीर बँधी गधों में लगती रेस है ।
सियासती पैँतरों से हार रही सारी जनता ,
योग्यता के कत्ल से दूषित हुआ परिवेश है ।।
"जय कुमार"27/08/15

Saturday, 12 September 2015

"आरक्षण"


एक पौधा कुछ विशेष जाति वर्णो के लोगों के लिए लगाया गया । कहा गया कुछ बर्षो में फल लेकर समाप्त कर देंगे । यह पौधा अपनी साखायें बढ़ाता रहा । खाद पानी भरपूर दिया गया जड़े मजबूत होती रहीं जमीन पर पकड़ बनाकर , इसका स्वरुप निरंतर बड़ता चला गया । एक विशाल वृक्ष बन फलने फूलने लगा । फल बहुत मीठे हुए एवं कम योग्यता कम प्रयास से मिलने लगे । यह फल केवल वो पा सकते थे जिनके लिए यह वृक्ष लगाया गया था । इसकी छाँव में रहने वाले वर्ण के कुछ योग्य लोग जिनने भरपूर दोहन कर इस वृक्ष के फलों का उपयोग किया एवं समृध्द होते चले गये । उनके अन्य साथियों को कम ही लाभ हुआ । फिर समृध्द लोग वृक्ष के मीठे फलों को छोड़कर जाने को तैयार नही हुए ।
जिन्हे इसके नीचे नही रखा गया वो इसके मीठे फलों को देख इस वृक्ष की छाँव में आने को आतुर हुए एवं संघर्ष करने लगे ।
वृक्ष के नियम नियंत्रण रखने वाली संस्थायें एवं लोग अपने स्वार्थ बस इसका स्वरुप बढ़ाते रहे । संघर्ष होते रहे स्वरुप बढ़ता गया । अब यह वृक्ष जमीन लीलते हुए अपने स्वरुप को बड़ाता रहता है । समृध्द हो चुके लोग सरलता से मिलने वाले मीठे फलों को छोड़ने को तैयार नहीँ है । कुछ इसकी छाँव पाने के लिए संघर्ष कर रहे है , जिनमें कुछ पिछड़े तो कुछ समृध्द सामिल है । नियंत्रक निजी स्वार्थ बस कुछ निर्णय लेने की स्थिति में कभी नहीँ दिखे ।
जमीन जो सर्वोपरि है उसकी चिंता किसी को नहीं , निजी स्वार्थ के लिए यह वृक्ष आज तक जीवित है । इसके मीठे फल , जमीन को विघटित समाज में जहर घोलने लगे है ।
जमीन को लीलता जा रहा यह वृक्ष , क्या खत्म नहीं होना चाहिए ?
क्या इस वृक्ष के नियम आधार अब भी नहीं बदलने चाहिए ?
क्या आरक्षण आर्थिक आधार पर नहीं होना चाहिए ?

"जय कुमार"

हाथ छूट

हाथ छूट जाते है ।
साथ टूट जाते है ।
वक्त के साथ हरेक ,
घाव सूख जाते है ।।
"जय कुमार"26/08/15

"काया"


उम्र ए हयात निकलती रही ।
समय रेत जाल बुनती रही ।
सँवारता रहा .. रोज उसको ,
वो अपना रुप बदलती रही ।।

"जय कुमार"25/08/15

कुदरत में सब

कुदरत में सब बस रहे , लाखों जिनके नाम ।
कण कण में जीवित भये , करत उसे प्रणाम ।।
"जय कुमार"25/08/15

अधलिखे गीत

अधलिखे गीत गुनगुनाना चाहते हैं !
खोटे सिक्के हम ,,,चलाना चाहते हैं !!

खूंखार चेहरा ,,,,,,,,,,,आइने में देखते !
मुखौटा जगत को दिखाना चाहते हैं !!

कमजोर को दबाकर मजबूत बनते !
डर को अपने हम,, छुपाना चाहते हैं !!

भीड़ में बैठे बनकर ,,,समाज सेवक !
विज्ञापन अपना ,,,,,कराना चाहते है !!

जंगली कानून,,,,,, शहरों में आ गया !
मजलूम को सब ,,,,,,दबाना चाहते है !!

इसकी टोपी उसके सर रखकर यारो !
होशियारी अपनी ,,,,बताना चाहते है !!

"जय कुमार"

रूखा रुखा मौसम

रूखा रुखा मौसम उजड़ा उजड़ा चमन हुआ ।
महफूज रखने वाला परदा क्यों कफन हुआ ?
बचपन लूट लिया रखवाले ..... उस माली ने ,
खिला खिला चेहरा वीरानों में ... दफन हुआ ।।
"जय कुमार"21/ 08/15

काल की डाल

काल की ,डाल बैठा
मैं मैं ,,,,,,,मिमयात है

स्वारथ की बन्शी से
सबई खो,,,रिझात है 

प्रेम के ,,,,,,,,,अँगना में
छुरियाँ ,,,,,,,,चलात है

प्यार के ,,,परिन्दों पर
बन्दिशें ,,,,,,,लगात है

माया के ,,,,,,,जालों में
साजिश,,,,,,, रचात है 

वासनाओं,,,,,,,, में पड़
जीवन ,,,,,,,,,,नचात है 

मिटने वाले,,, तन को
खूबई ,,,,,,,,,,सजात है 
 
एक कटोरा ,,,,मिट्टी
तन की ,,,,,औकात है

"जय कुमार "१९/०८/१५

बात बनाकर

बात बनाकर ।
चाल चलाकर ।
चले गये ..तुम ,
नजर चुराकर ।।
ख्वाव दिखाकर ।
राज ... बताकर ।
भुला गये ..सब ?
हौँठ .. सिलाकर ।।
साथ मिलाकर ।
खुशी सजाकर ।
लूट लिया क्यों ?
प्यार दिखाकर ।।
नीर .. बहाकर ।
बीज . उगाकर ।
काट दिया क्यों ?
फूल . खिलाकर ।।
"जय कुमार"18/08/15

कहानी हौंसलों

कहानी हौंसलों की फिर आज सुनाने आया हूँ ।
लहरों के विपरीत कस्ती मैं बहाने आया हूँ ।
कफन बाँध के चला खुशबू ए मिट्टी के खातिर .
वाजू ए कातिल का दमखम अजमाने आया हूँ ।।
"जय कुमार"16/08/15

वतन के खातिर

वतन के खातिर साथ जियेंगे हम ।
वतन के खातिर साथ मरेंगे हम ।
शिकवे हो लाख ... दरम्याँ हमारे ,
वतन के खातिर साथ चलेंगे हम ।।
"जय कुमार"15/08/15

चाल चलन की

चाल चलन की चासनी , चाचा रहे चटाय ।
चंचल चपल चोर मना , चारों ओर नचाय ।।
"जय कुमार"12/08/15

पीर पराई देख

पीर पराई देख जो , मन ना हुआ उदास ।
ह्रदय नहीं पत्थर वो , पीर नहीं आभास ।।
देश धरम पर ना चले , जीवित भी वो लाश ।
लहू नीर सा बह रहा , जन जीवन वो नाश ।।
करम पथ को छोड़ चले , माँग रहे अधिकार ।
जी रहे उस मानस के , जीवन को धिक्कार ।।
राष्ट धरम सर्वोपरी ,,,,,,, भाषा धरम न जात ।
एक ध्वज के नीचे खड़े , एक गीत वो गात ।।
"जय कुमार"12/08/15

मन की बात कहते

मन की बात कहते ही , मनमानी कर जात ।
भोले आम लोगों को ,,,, बातन से बहलात ।।
छोटे छोटे नाम के , बड़े बड़े प्रचार ।
सीधे सीधे काम के , बड़े बड़े औजार ।।
अच्छे दिन की चाह में , दिखती ना थी खोट ।
सपथ ली काले धन की ,,,, दे आये हम वोट ।।
फुल पावर में आ गये , पाँच साल ना आँच ।
फौलाद जरूरी नहीं , रक्षा करे अब काँच ।।
भैंस तुमारी हो गई ,,,,, लाठी दी पकड़ाय ।
जहाँ तुम ले जाओ जी , देश वहीं पर जाय ।।
"जय कुमार"11/08/15

काल की डाल पर

काल की डाल पर घौंसले बनाने थे ।
दरदरे जख्मों पर मरहम लगाने थे ।
रफ्तार तेज रही हयात ए सफर की ,
एक वक्त में उम्र के पुष्प खिलाने थे ।
आसमाँ में आफत धरती पे कहर था ,
दलदली राहों पर दो पैर जमाने थे ।
साहिल के बीच भँवर का साथ मिला ,
सदियों के बिछड़े दिन रात मिलाने थे ।
हाथ जल चुके थे होम लगाने में ,
जिम्मेदारियों के चप्पू चलाने थे ।
जय पराजय का साथ रहा जिंदगी भर ,
हाथों में भाले लिए खड़े जमाने थे ।।
"जय कुमार"10/08/15

बीच राह पर

बीच राह पर दंगल होने लगे है ।
शहर के लोग आपा खोने लगे है ।
कोई लुट जाता कोई पिट जाता ,
कानून के रखवाले सोने लगे है ।
झुलझता दामन नये फूलों के संग ,
क्या अंगारों की फसलें बोने लगे है ।
शहर बह जायेगा जालिम तेरा भी ,
मासूम लोग आँख भिगोने लगे है ।
लुटा घरौंदा मुफलिसी में आज फिर ,
जय बिखरे फूलों को पिरोने लगे है ।।
"जय कुमार"9/08/15

मक्कारी का

मक्कारी का खाके माल ।
फूल गये है उनके गाल ।
आसमान पे पैर रखे वो ,
नोट देखके लालम लाल ।।
भूल गये सारे सुर ताल ।
बदल रही है उनकी चाल ।
फँसते सीधे - साधे लोग ,
बिछा रखे साजिश के जाल ।।
"जय कुमार"8/8/15

असली सूरत

असली सूरत छुपाते रहे ।
बनावटी रुप दिखाते रहे ।
घर रोशन करने के लिए ,
सबके घौंसले जलाते रहे ।
किसी को देखा उजाले में ,
जले दीप क्यों बुझाते रहे ।
खिलखिलाते पंछियों को ,
रंज व गम से मिलाते रहे ।
गहरी नींद सो गया कल मैं ,
सफर के साथी बुलाते रहे ।
जय बैचेनी में मिला क्या ,
रोज ही अश्क बहाते रहे ।।
"जय कुमार"06/08/15

काँटो में पुष्प

काँटो में पुष्प से खिलने वाले ।
समय की धारा बदलने वाले ।
वो भारतरत्न अब्दुल कलाम ,
सच्चे कर्म योग पे चलने वाले ।।
भारत माँ के सच्चे सपूत को _/\_ विनम्र श्रद्धांजलि !!

वो इंसान

वो इंसान ,,,,,, बेमिमाल थे ।
भारत माँ के सच्चे लाल थे ।
अंतिम साँस तक कर्म पथ चले ,
भारतरत्न अब्दुल कलाम थे ।।
भारत माँ के सच्चे सपूत को _/\_ अश्रुपूर्ण हार्दिक विनम्र श्रद्धांजलि !!

नयी खोजो

नयी खोजो डगर आज रे ।
नई तो बच हे ने लाज रे ।।
जमीन के भये बटवारे ।
गाँव सुकड़े शहर पसारे ।
गाँव से हो रयो पलायन ,
गाँव के गिर रये साज रे ।।

नयी खोजो डगर आज रे . .
आदमन की भीड़ भारी ।
जनता से कुदरत हारी ।
भियाने का हुईये जानो ,
नियोजन की करो बात रे ।।
नयी खोजो डगर आज रे . .
बेटन खो खूब पढ़ा दयो ।
बिटिया को मरवा दयो ।
बिन बेटी सब सूना सूना ,
बिटिया पर हो नाज रे ।।
नयी खोजो डगर आज रे . .
पेड़ काटे बन गये बीहड़ ।
शेर बचे न बचे न गीदड़ ।
कहर काहे बरपा रओ अब ,
प्रकृति पे गिरा ने गाज रे ।।
नयी खोजो डगर आज रे . .
"जय कुमार"27/07/15

भुनसारे सें सकारे से

भुनसारे सें सकारे से ,
काहे उड़ा दई चादरिया ,
मोहे बतादे साँवरिया ।।
आज कछु नौनो नइ लग रओ ।
जियरा मोरो मोसे झगड़ रओ ।
कौन घरी ऐंसी आ गई अब ,
अब काहे छुपावे बाबरिया ।।

मोहे बतादे साँवरिया . .
सोलह श्रृँगार करत तें मोरे ।
जैंसी सजी थी मैं व्याव तोरे ।
लाल चुनरिया फिर उड़ा दई ,
अब काहे सजाबे बाबरिया ।।
मोहे बतादे साँवरिया . .
चार कहार लगे थे डोली में ।
सबई जने भी रोये डोली में ।
गाँव काहे अब बिदाई में आओ ,
अब मोहे सुनादे साँवरिया ।।
मोहे बतादे साँवरिया . .
जब अग्नि संग लये फेरे सात ।
लकड़ियाँ काहे जोर रये आज ।
मोरो संग बस रओ आज लो ,
संग काहे छुड़ावे साँवरिया ।।
मोहे बतादे बाबरिया . .
भुनसारे सें सकारे सें
काहे उड़ा दई चादरिया
मोहे बतादे साँवरिया ।।
"जय कुमार"27/07/15

आँखों में आज

आँखों में आज नमी क्यों है ।
चाहत में आज कमी क्यों है ।
उलझे उलझे लफ्ज हमारे ,
ये गलतफहमी बड़ी क्यों है ।
रिश्तों में गर्माहट बड़ रही ,
लफ्जों की नदी जमी क्यों है ।
एक रूह दो जिश्म हमारे है ,
शक की दीवार खड़ी क्यों है ।
सूखा सूखा प्यार का वाग ,
जख्म कि दुनिया हरी क्यों है ।।
"जय कुमार"26/07/15

सरेआम कत्ल

सरेआम कत्ल हुआ बेकसूर बाजार में ।
ताजा खबर आई ये आज के अखवार में ।
काँटों के शहर दामन रोशनी से भरे है ,
इंसानियत रो पड़ी इंसान के प्यार में ।।
"जय कुमार"26/07/15

मेरी रंगत

मेरी रंगत नहीं . . . नगीने में ।
क्या रखा खैरात की पीने में ।
मेरी मेहनत ... मुझे प्यारी है ,
मैं खुश हूँ खुशबु ए पसीने में ।।
"जय कुमार"25/07/15

पत्थर लेके

पत्थर   लेके  खड़े  हुए ।
जिद पे अपनी अड़े हुए ।
रोब  दिखाते पत्थर  से
शीशे  के  घर  बड़े  हुए ।

"जय कुमार"24/07/15

मेरी उम्मीद

मेरी उम्मीद से ज्यादा ,, निकलते गये ।
दर्द , चोट जख्म बन  नासूर बनते गये ।
मिटाता रहा खुदको गम मिटाने के लिए ,
नासाज हम हुए गम और सम्बलते गये ।।
"जय कुमार"24/07/15

सूरज तेज

सूरज तेज
बिखरे चहुँओर
रोशन दिशा
पुष्प खुशबु
बिखरे चहुँओर
कण महके

चाँद चाँदनी
बिखरे चहुँओर
कण चमके
साँवन नीर
मोती बन बरसे
नदी श्रँगार
ओढ़ चुनर
प्राकृत हरियाली
धरा बहके
ठंडी बयार
साथ सुहानी शाम
मन बहके
इंद्र धनुष
खूबसूरत छटा
खग चहके
वन में मोर
प्राकृतिक छटा में
करता नृत्य
"जय कुमार"24/07/15

क्या सगे

क्या सगे , क्या सौतेले है ।
सबने अपने खेल खेले है ।
साथ रहा कोई छोड़ गया ,
इस दुनिया के ये मेले है ।।
"जय कुमार"24/07/15

जब जब

जब जब मुँह पर ताले होंगे ।
ईमान के मुँह ,,,, काले होंगे ।।
"जय कुमार"24/07/15

ताल तलैयाँ

ताल तलैयाँ भर रहे ,,,,,,,, मेघ करें बौछार ।
बन मोती जल बरस के , शीतल करे बयार ।।
हरि चुनरिया ओड़ के , धरा रही मुस्काय ।
रूप बदल पर्वत रहे , नव जीवन को पाय ।।
बीज पड़े खिलने लगे ,,,,,,,, आशा नई जगाय ।
छोड़ चले आलस्य को , नव जीवन खिल जाय ।।
"जय कुमार"23/07/15

हँसने का

हँसने का एक सबब ,
रोने के हजार हुए ।
बनाने का एक जरिया ,
मिटाने के हजार हुए ।
एक को पकड़ले बाँकी
छोड़कर जीवन जी ,
बढ़ने का एक रास्ता ,
लौटने के हजार हुए ।।

"जय कुमार"23/07/15

भारत माँ का

भारत माँ का ,, मान तिरंगा
देशवाशियों कि शान तिरंगा
देश भक्तो में …… जोश भरे
मतवालों की ,,, जान तिरंगा

जोश का ,,,,, सन्देश तिरंगा
भारत का ,, परिवेश तिरंगा
हँसकर मौत से ,, गले मिले
शहीदों का ,,,,,,, भेष तिरंगा
"जय कुमार "22/07/15

Wednesday, 19 August 2015

काल की

काल की डाल बैठा
मैं मैं मिमयात है
स्वारथ की बन्शी से
सबई खो रिझात है
प्रेम के आँगना में
छुरियाँ चलात है
प्यार के परिन्दों पर
बन्दिशें लगात है
माया के जालों में
साजिश रचात है
पड़े वासनाओं में
जीवन नचात है
मिटने वाले तन को
खूबई सजात है
एक कटोरा मिट्टी
तन की औकात है
"जय कुमार "१९/०८/१५

Wednesday, 22 July 2015

ममता भरा

ममता भरा
स्नेह नेह हो केवल
माँ का आँचल
खिलता पुष्प
महके मधुवन
माँ का आँचल

नींद सुहानी
ममता की कहानी
माँ का आँचल
खिलती धूप
पीपल की हो छैया
माँ का आँचल
शाँत हो नदी
समुंदर गहरा
माँ का आँचल
पुष्प कोमल
मनका हो पावन
माँ का आँचल
बहती नदी
बरसता बादल
माँ का आँचल
प्यार से प्यारा
निश्छल हो निर्मल
माँ का आँचल
सदाँ सुहाना
ईश्वर का दर्शन
माँ का आँचल
सुबो सुहानी
शाम की हो रंगत
माँ का आँचल
धरा से बड़ा
ब्रम्हाण्य की सीमायें
माँ का आँचल
"जय कुमार"22/7/15

"व्यापम की व्यथा"


व्यापम अब व्यापक हुआ , रहा न शिव पर नाज ।
दाग लगे वजीरों के , बन बैठे सरताज ।।
जाल बिछा अब मौत का , बचा न पाये साख ।
भरम टूटा मामा से , महल बनाकर लाख ।।
व्यापम की माया बड़ी , खोल रही अब पोल ।
खुल्ले को टटोल रही , बंद किये वो खोल ।।
बहुत समय से दबा जो , बाहर आया दोश ।
आँख खोलकर देख लो , कैँसे हो मदहोश ।।
रोज बबाल मच रहे , बाहर दिखते एक ।
कुछ के मुँह बंद किये , मरघट जाके देख ।।
"जय कुमार"21/7/15

मेरे हँसने

मेरे हँसने का सबब पूछते हो ,
क्या फिर नया रुलाने का वादा है ।
बड़े अदब से पेश आते हो दोस्त ,
क्या कोई जख्म देने का इरादा है ।।
"जय कुमार "21/07/15

गुजरे पल

गुजरे पल
वापिस नहीं आते
खुशबु बाँकी
जख्म भरते
दर्द घटता रहा
निशान बाँकी

गुजरे पल
वापिस नहीं आते
टीस रहती
खुशी व गम
साथ रहते रहे
फूल व काँटे
बदन गौर
चमकती धूप में
मुरझा गया
उम्र निकली
चमकता चेहरा
लकीरो भरा
टूटती साँस
मिट्टी का मिट्टी हुआ
प्यारा बदन
"जय कुमार"21/07/15

व्यापम व्यापम

व्यापम व्यापम हो गया , अब सारा भोपाल ।
विधान सभा चली नहीं ,,,, सारी काली दाल ।
सारी काली दाल ,,,,,,, धूम धड़ाके बिक गई ।
बिछे मौत के जाल ,,, फँसके साँस रुक गई ।।
"जय कुमार"20/07/15

अपना नहीं

अपना नहीं
ओरों का दुख बड़ा
प्रेम से भरा
कल की नहीं
आज में खुश रहा
जीवन भला

टीस न रख
नित नया जीवन
बुरा न भला
खिला जो फूल
काँटो के बीच रहा
मुस्कुराते ही
कोई चुनौती
जीवन नहीं हुआ
कर्म चुनौती
पकड़ राह
चित चिँतन नित
मंजिल मिले
"जय कुमार"20/07/2015

दर्पण कल

दर्पण कल कहने लगा ,,,,,, तेरी सूरत नाय ।
अपनी सूरत देख ले , जन्म सफल हो जाय ।।
"जय कुमार"18/07/15

पढ़ले हर शख्स

पढ़ले हर शख्स वो किताब बन ।
देखले हर शख्स वो हिसाब बन ।
उलझन में न रह न रख किसी को ,
सुनले हर शख्स वो आवाज बन ।।
"जय कुमार"18/07/'15

सीख लेकर इतिहास

सीख लेकर इतिहास से वर्तमान सुधार ले ।
बेसकीमती विचार हम पूर्वजो से उधार ले ।
मजहब भाषा रंग रुप , जाति बंधन तोड़के ,
समाज हमारा उज्जवल हो ऐंसा आधार ले ।।
"जय कुमार"18/07/15

खिला है फूल

खिला है फूल
खुशबू है बिखरी
कुछ समय
काँटो का जाल
वासनाओ का खेल
जीवन खत्म

सूर्य सा ताप
ज्वालामुखी का लावा
नाम जवानी
"जय कुमार

काया माया

काया माया इक हुई , तनिक घड़ी की बात ।
माया आवत जात है , तन मरघट लो साथ ।।
"जय कुमार"

मायने बदलते

मायने बदलते नहीं अच्छे नाम से ।
मतलबी पूछते है तुझे तेरे दाम से ।
सस्ती लोकप्रियता दो दिन टिकती ,
शोहरत मिलती है अच्छे काम से ।।
"जय कुमार"16/07/15

रात निकल

रात निकल जाती है , ख्वाहिशों में मचलाते हुए ।
दिन निकल जाता है , नाकामी पर झुंझलाते हुए ।
खुशी की चाह में यार , रंज का मेला मिलता रहा ,
उम्र निकल जाती है , पहेलियों को सुलझाते हुए ।।
"जय कुमार"15/07/15

राज खुलते

राज खुलते रहे ।
हाथ मिलते रहे ।
साथ ना छोड़ेगे ,
लोग कहते रहे ।।
समय की मार ने ।
ताज के खुमार ने ।
तोड़ दिया घरौंदा ,
भरोसे की डार ने ।।
विष विश्वास हुआ ।
लुटा अहसास हुआ ।
छोड़ने वालो का ये ,
दिल निवास हुआ ।।
मोह की माया से ।
मिट्टी की काया से ।
रंज बहुत पाले है ,
पाया न पाया से ।।
"जय कुमार"14/07/15

बनते बिगड़ते

बनते बिगड़ते खेल देखिए ।
पटरी एक , दो रेल देखिए ।
जम्हूरियत की सियासत में ,
साँप नेवले का मेल देखिए ।।
"जय कुमार"1/07/15

साम्प्रदायिक

साम्प्रदायिक हवा में बह गये वो ।
चोट करने की बातें कह गये वो ।
मजहब तो मानव के लिये बनते ,
मानवीयता में पीछे रह गये वो ।।
"जय कुमार"30/06/15

ताल तलैयाँ

ताल तलैयाँ भर रहे ,,,,,,,, मेघ करें बौछार ।
बन मोती जल बरस के , शीतल करे बयार ।।
हरि चुनरिया ओड़ के , धरा रही मुस्काय ।
रूप बदल पर्वत रहे , नव जीवन को पाय ।।
बीज पड़े खिलने लगे ,,,,,,,, आशा नई जगाय ।
छोड़ चले आलस्य को , नव जीवन खिल जाय ।।
"जय कुमार"28/06/15

राज करन

राज करन को सब खड़े , देखत नाही देश ।
कुछ तो है परदेश से ,,,, कुछ घूमे परदेश ।।
"जय कुमार"28/06/15
प्रकृति ने फूल दिये , जग ने बोये शूल ।
समाज में दुर्जन बने , रहे प्रकृति मूल ।।
"जय कुमार"28/06/15

हँसने का

हँसने  का सबब पूछते हो मेरा 
क्या फिर नया रुलाने का वादा है
बड़े अदब से पेश आते हो दोस्त
क्या फिर कोई जख्म देने का इरादा है

"जय कुमार "

भारत माँ का

भारत माँ का ,, मान तिरंगा
देशवाशियों कि शान तिरंगा
देश भक्तो में …… जोश भरे
मतवालों की ,, जान तिरंगा

जोश का ,,,,, सन्देश तिरंगा
भारत का ,, परिवेश तिरंगा
हँसकर मौत से ,, गले मिले
शहीदों का ,,,,,,, भेष तिरंगा


"जय कुमार "

Sunday, 28 June 2015

दर्पण में मुँह

दर्पण में मुँह देख के , समय रहा इतराय ।
हम चारों पन देखते , तुम तो गये बुढ़ाय ।।
"जय कुमार"२८/०६/१५ 

पीठ तहुलुहान

पीठ तहुलुहान हुई ये दोस्तों का प्यार है ।
छाती अभी साबत दुश्मन का इंतजार है ।
भरोसे वफा की इस खूबसूरत आदत में ,
फूल मुरझाये है अब जख्मों की बहार है ।।
"जय कुमार"२८/०६/१५

दर्द

दर्द कौन समझता है एक बेरोजगार का ।
रोज बाजार सजता है..बस भ्रष्टाचार का ।
घोड़ों को दोड़ने का...मौका कहाँ मिलता ,
लोगो को इंतजार है गधों के व्यवहार का।।
"जय कुमार"

Saturday, 27 June 2015

तपन से डरे

तपन से डरे बिखरने लगे ।
आश से मिले सँवरने लगे ।
जिंदगी डोर साँस से बँधी ,
वक्त से चले बदलने लगे ।
खुमार चड़ा रहा बर्षो तक
समय से जले उतरने लगे ।
मुखातिब रोज खुद से हुए ,
आईने से ..... बिगड़ने लगे ।
मुलाकात मन से की कभी ,
मन से मिले निखरने लगे ।।
"जय कुमार"27/06/15

यूँ ख्याली

यूँ ख्याली पुलाव न पकाया करो ।
बेवजह बातों से न जलाया करो ।
चाहते तुमको दिलो जान से यारा ,
यूँ शक के तीर न अजमाया करो ।।
"जय कुमार"27/06/15

जाते

गुजर जाते हो....मुस्कुराते हुए ।
जानते न तुमे यह...बताते हुए ।
क्या कर रहे हो , क्या जता रहे
गैर बनके यूँ हाथ मिलाते हुए ।।
"जय कुमार"27/06/15

नवनीत विचार

नवनीत विचार लिये , नव प्रभात आया है ।
घोर तम को मिटाकर , नव प्रकाश आया है ।
भोर का संदेश लेकर , प्रकाश तेरे द्वार पर ,
दूर का सफर करके , भानु मिलने आया है ।।
"जय कुमार"26/06/15

आँधियोँ में

आँधियोँ में आसियाना ...... जाने किधर गया ।
हवाओं ने किया रुख जिस तरफ उधर गया ।
पत्थरों के वार संग तेज बारिष का कहर था ,
मिट्टी का बना था घर ... टूटकर बिखर गया ।।
"जय कुमार"25/06/15

लोग कहते है इन

लोग कहते है इन आँखों में बेइंतहा कशिश है ,
यह कशिश इश्क के दरिये में जलकर मिली है ।
"जय कुमार"25/06/15

मुश्किलें सच्चाई

मुश्किलें सच्चाई की राह पे आती हैं ,
जो चले नहीं वो क्या जाने ।
बुरी नजर खिले फूलों पर होती है ,
जो खिले नहीं वो क्या जाने ।
खुशी व गम मिलना तय जिन्दगी में ,
तब राह नेक पकड़ लेना ,
नेकी के अहसास मेँ ही रब मिलते है ,
जो मिले नहीं वो क्या जाने ।।

"जय कुमार"25/06/15

ग्रीष्म में पत्ती

ग्रीष्म में पत्ती का अक्कसर ,
डाली हाथ .... छोड़ देती है ।
सख्त हालात में ..अक्कसर ,
दुनिया साथ ..छोड़ देती है ।।
"जय कुमार"25/06/15

Tuesday, 23 June 2015

"हाइकु"


मिलते चले
राह में मिला जो भी
दीवाना कहाँ
कुछ कहते
कुछ सुनते चले
चला बसेरा
ठौर ठहर
चलते है पहर
मेरी डगर
रास्ते मंजिल
रास्ते ही प्यार बने
रास्ते हैं चले
मुसाफिर का
मुकद्दर चलना
राहों से दोस्ती
गैर का घर
मेरा पल दो पल
बसेरा रहा
गाँव नगर
बसे बड़े शहर
राह नजर
कहते नहीं
खामोश अफसाना
प्यार है न्यारा
"जय कुमार"23/06/15

जज्बात प्यार के


जज्बात प्यार के मचल जाते है ।
वेहया होकर वो निकल जाते है ।
नाजुक दिल मेँ छुपे हैं अरमान जो ,
बेरहम होकर वो कुचल जाते है ।
शाम सूनी सुबह की आस करती ,
पहर इक आस में निकल जाते है ।
सर मुड़ाया एक अरसे बाद मैने ,
आसमाँ के जमे जल पिघल जाते है ।
"जय कुमार"22/06/15

कभी बुरे वक्त


कभी बुरे वक्त के हाल पर रोये ।
कभी अपने ही बदहाल पर रोये ।
मेरी राहों ने मुझे कब रोका था ,
हम तो अपनी ही चाल पर रोये ।।
"जय कुमार"22/06/15

भरम हमारे


भरम हमारे सब .. टूट गये ।
दिल की दौलत वो लूट गये ।
यह रुत .... तन्हाई में बीती ,
उस रुत के साथी . रूठ गये ।।
"जय कुमार"20/06/15

Sunday, 21 June 2015

जब तक जीव

जब तक जीवन ज्योति तन में
तेरा चेहरा मेरे ……… मन में
आजा सब …… बंधन तोड़कर
मिल गीत …. गायें मधुवन में 

"जय कुमार "२२/०६ /१५ 

Friday, 19 June 2015

हर तरफ एक


हर तरफ एक ही मंजर देखा ।
खिले फूल पर ही खंजर देखा ।
खिलते थे पुष्प प्रेम के कभी ,
उस जगह को ही बंजर देखा ।।
"जय कुमार"18/06/15

टूटे ख्वाबों


टूटे ख्वाबों की ..... कसक ना रख ।
बिछड़ी राहों की....भनक ना रख ।
वक्त निकल गया.... गमों का अब ,
उलझे सवालों की सनक ना रख ।।
"जय कुमार"17/06/15

की आदत हो गई


दूरियों को सहने की आदत हो गई ।
आँखों को बहने की आदत हो गई ।
घर की बिखरी चीजें समेटते रहते ,
अकेले यूँ रहने की .. आदत हो गई ।।
"जय कुमार"17/06/15

बात थी छोटी


बात थी छोटी बबाल बड़ा था ।
छोटी राई का पहाड़ खड़ा था ।
अपवाहों से एक के हुए हजार ,
देखत रस्सी का साँप पड़ा था ।।
"जय कुमार"16/06/15

रुखी सूखी मिल


रुखी सूखी मिल भी जाये बसर कैंसे हो ।
भारी चट्टान पर हथोड़े का असर कैंसे हो ।
मुफलिसी के नासूर सजते रहे पल - पल ,
भूख की आग में जिँदगी का सफर कैँसे हो ।।
"जय कुमार"16/06/15

तरसती नजरों


तरसती नजरों से देखकर हमें ना बहकाया करों ।
एक अरसे से सोये जज्बात उन्हें ना जगाया करो ।
मुहब्बत में वेहयाई के तोहफे बहुत मिलें मुझको ,
अश्क बहाकर सूखी आँखें उन्हें ना बहलाया करो ।।
"जय कुमार"15/06/15

गुमसुम गुमसु


गुमसुम गुमसुम,,,,रहते हो तुम ।
क्या गम है जो,,,, सहते हो तुम ।
छुपा रखे है ........... दर्द हजारों ,
क्या सच है क्या कहते हो तुम ।।
"जय कुमार"15/06/15

अनजाने शहर


अनजाने शहर में अनजाना सफर है ।
किसे ढ़ूँढ़ती आँखे वेगाना वेखबर है ।
तन्हाई का आलम .... तन्हा हर कोई ,
रास्ते शोर से भरे गुमसुम नजर है ।।
"जय कुमार"14/06/15

वो मुहब्बत की


वो मुहब्बत की कहानी सी लगती है ।
वो आती रंगीन जवानी सी लगती है ।
घूँघट में छुपा चेहरा देखता उसका ,
वो गाती सुबह सुहानी सी लगती है ।
प्यार में ये जमाना नामुराद क्या हुआ ,
वो चढ़ती शराब पुरानी सी लगती है ।
खुशबु बिखर जाती राह में चलने से ,
रुखे चेहरों पर रवानी सी लगती है ।
मौसम बदलते इक इशारे पर उसके ,
कुदरत उसपे दीवानी सी लगती है ।।
"जय कुमार"12/6/15

जज्बात का दरि


जज्बात का दरिया हूँ , साथ बह लेना ।
काँटों से भरा सफर हूँ , साथ रह लेना ।
वक्त पर वयाँ कर लेना हाल -ए-दिल ,
दिल में छुपाये हो जो , बात कह लेना ।।
"जय कुमार"11/06/15

छोड़कर यूँ


छोड़कर यूँ परदेश जाना .... अच्छा नहीं ।
सदियों का यूँ प्रेम भुलाना .. अच्छा नहीं ।
माना अनबन हो जाती थी कभी - कभी ,
गैर की यूँ महफिल सजाना अच्छा नहीं ।।
"जय कुमार"11/06/15

झूठ बोलो


झूठ बोलो .... तो कमाल की बात है ।
सत्य बोलो ... तो बबाल की बात है ।
ना जाने कैंसा ...... विवेक मानव का ,
कुछ न बोलो तो सवाल की बात है ।।
"जय कुमार"11/06/15

मान टूट मेरा गया ,,,,,,, देखा मरघट घाट ।
शोलों में जलने लगा , जीवन का परिपाट ।।
"जय कुमार"11/6/15

झूठ को चिल्लाने


झूठ को चिल्लाने दो....ईमान अभी बाँकी है ।
सच्चाई कहने के लिए जुबान अभी बाँकी है ।
कातिल हौंसले पस्त ना होंगे ... हमारे कभी ,
खून से सने इस जिस्म में जान अभी बाँकी है ।।
"जय कुमार"10/6/15

ऐंसी क्या बात


ऐंसी क्या बात थी जो कह ना सके ।
ऐसा क्या दर्द था जो सह ना सके ।
पत्थर दिल बन गये तुम कैंसे यार ,
जज्बात का दरिया था बह ना सके ।।
"जय कुमार"9/06/15

Tuesday, 9 June 2015

कल के फूल


कल के फूल अब शूल बने है ।
शेरनी ने अब सियार जने है ।
बिगड़ गया माहौल समाज का
बिपदाओं के.... जंगल घने है ।।
"जय कुमार"8/6/15

नाम मिला ।


किसी को नाम मिला ।
किसी को काम मिला ।
भरी महफिल में मुझे ,
जाम... बदनाम मिला ।।
"जय कुमार"8/6/15

प्यार करने


प्यार करने का ये इनाम मिला
सारे जहाँ में बदनाम मिला
करते रहे मुहब्बत उससे हम
दीवाना मुझे इक नाम मिला
"जय कुमार"8/6/15

जिन्दगी दो

जिन्दगी दो कदम चले , मुश्किलें चलें पाँच ।
हुकूमत तेरी न चले , समय के साथ नाँच ।
समय के साथ नाँच , ओर कोई राह नहीं ।
जहाँ से आये तुम , जाना भी होगा वहीं ।।
"जय कुमार"8/6/15

चापलूस


चापलूस बनकर रहे , बड़ी कुत्तों कि फौज ।
सुलझों को दाना नहीं , चापलूसों की मौज ।।
"जय कुमार"7/6/15

दिखाबा ज्ञान


दिखाबा ज्ञान का करेँ , वे ज्ञानी ना होत ।
ज्ञानी खुद में ही रमें , अहं वहम को खोत ।।
"जय कुमार"7/6/15

छवि निहारत


छवि निहारत रहते जा , मिट्टी में मिल जात ।
जिस तन में तल्लीन है , जो मरघट तक जात ।
जो मरघट तक जात , खबर नहीं का होत है ।
चिड़िया फुर हो जात , देह बेखबर सोत है ।।
"जय कुमार"7/6/15

मासूम ख्वाबों


मासूम ख्वाबों का खूबसूरत जमाना था ।
बचपन हँसता हरेक गम से बेगाना था ।।
गाय के संग वो दूर तलक भागकर जाना ।
यारों के संग वो बेर अमरुद को खाना ।
मटर खाते थे खेतों में चोरी से चुनके ,
बचपन मौज मस्ती का महकता खजाना था ।।
बावड़ी के पानी में वो कूदकर उछलना ।
टीलों पे चढ़कर रपट रपट कर खिसकना ।
कपड़े की गेंद व लकड़ी का गिल्ली डंडा ,
बचपन खिलखिलाते खेलों का दीवाना था ।।
बहिन को चिड़ाना बड़े भैया को छकाना ।
दादी की लाठी पर दादू का जब हँसना ।
माँ की मीठी फटकार बापु का लाड़ प्यार ,
बचपन अनचुने खिले फूलों का अफसाना था ।।
"जय कुमार"

कागज कलम


कागज कलम भूल गये , मोबाइल पे बात ।।
लाज शर्म सब छोड़के ,,,,,,,,, ईलू ईलू गात ।।
"जय कुमार"2/6/15

गंग हाथ


गंग हाथ लेकर खड़े ,,, झूठ बोलते रोज ।
हाँडी घर खाली पड़ी , बनते राजा भोज ।।
"जय कुमार"2/6/15

वक्त


वक्त निकलता रहा ।
बर्फ पिघलता रहा ।
आँसुओं का सैलाव ,
अक्स बदलता रहा ।।
"जय कुमार"1/6/15

राजनीति की


राजनीति की राह में , घर भरने पर जोर ।
भाषण में गीता कहें , सबके सब जो चोर ।।
"जय कुमार"1/6/15

वाह वाही


वाह वाही की माया , दिखती चारों ओर ।
वाह वाह जिसको नहीँ , हो जाता वो बोर ।।
"जय कुमार"1/6/15

लाज शरम सबई


लाज शरम सबई भूल कें
अपनो खेरो घरई भूल कें
ईलु ईलु गाऊँ लगे ।
लरका उजारे जाऊँ लगे ।।
लरकोरी जा तोरी उमरिया
देख देख के पतरी कमरिया
भैया बंशी बजाऊँ लगे ।
लरका उजारे जाऊँ लगे ।।
खबर सबर तो छोड़ छाड़ कें
चिट्रटी चिठ्रठा फोड़ फाड़ कें
मोबाइल पे बतयाऊँ लगे ।
लरका उजारे जाऊँ लगे ।।
भैया गये पड़न खो काँलेज
सिगरट को हो गयो नाँलेज
दवाकें पाऊच चबाऊँ लगे ।
लरका उजारे जाऊँ लगे ।।
बी ई कर लई डिग्री ले लई
फीस ने दद्दा कि जानईं ले लई
खेत में बखर अब चलाऊँ लगे ।
लरका उजारे जाऊँ लगे ।।
ये की जोरी ओकी जोरी
ठलुओं के संग कुठियाँ फोरीं
चौंतरा पे बतयाऊँ लगे ।
लरका उजारे जाऊँ लगे ।।
"जय कुमार" 31-05-15

कुछ बोलूँ


कुछ बोलूँ तो बबाल करते है ।
चुप रहूँ तो सवाल करते है ।
क्या कहेंगे लोग के रोग में ,
हम जिंदगी हलाल करते है ।।
"जय कुमार"29/05/15

Monday, 8 June 2015

कछु हमाई


कछु हमाई भी सुन लईओ
कछु तुमाई भी सुन लेहें
अपनी अपनी चलईओ ने ।
बिना राग के गईओँ ने ।।
बिना राग के गईओ ने . . !
एक जगाँ हम बैठे नईयाँ
मुलक भरे में घूमत भैयाँ
हमकों कछु पड़ईओं ने ।
बिना राग के गईओं ने ।।
बिना राग के गईओं ने . . !
अपनों मान संग में रखिओ
उल्टी पुल्टी एक न बकिओ
जोन घरे पानी ने मिलवे
ओके घरे तुम जईओं ने ।
बिना राग के गईओ ने ।।
बिना राग के गईओ ने . . !
चार रुपया तोरे हो गये
ये जमाने में तुम खो गये
जो तो आवत जावत रेत है ,
ये पे तुम इठलईओ ने ।
बिना राग के गईओ ने ।।
बिना राग के गईयों ने . . !
बऊ दद्दा की सेवा करने
सबेरे सँझे राम खो भजने
जो तन तोरो जेने बनाओ
ओखो कबऊँ भुलईओ ने ।
बिना राग के गईओ ने ।।
बिना राग के गईओ ने . . !
"जय कुमार"28/05/15

Wednesday, 27 May 2015

परिवार आज बँट


परिवार आज बँट रहे , अपने अपने काम ।
समाज आज बदल चुका , अपने अपने राम ।
अपने अपने राम , धर्म के अब दंगल होवे ।
राह - राह पर खून , मनुज मनुजता खोवे ।।
"जय कुमार"27/5/15

खुले आशमान


खुले आशमान में उड़ना चाहता हर कोई ।
दर्द की आहट से भागना चाहता हर कोई ।
कामयाबी तो शूलों की नोंक पर चलती है ,
फूल भरी राह पे चलना चाहता हर कोई ।।
"जय कुमार"27/5/15

आज सुनों तुम


आज सुनों तुम मोरे सँयां ।
ऐसें ना पकड़ो तुम बैंयाँ ।
रोजई रोज छेड़त रेत हो ,
मोखो अच्छो लगत नैंयाँ ।।
"जय कुमार"27/05/15

एक बात हम


एक बात हम तुमसें कय दयें ,
हमसे प्रीत लगईओ ने ।
बोलत चालत तो तुम रईयो ,
नैना हमसे मिलईओ ने ।।
अपने खेत में तुम जईओ ।
कुरा करकट खूब पटईओ ।
जिनके लिगों जाने सो जाने ,
इते तो नजर उठईओ ने ।।
मुलक में तुम घूमत रेने ।
अपनी बातेँ खूब सुनाने ।
हम जानत तुमको अच्छे से ,
अपनी जात बतईओ ने ।।
उतई हते तुम जिते हते हम ।
मगर की आँखे होती है नम ।
तनक मनक बचा जो रखी हो ,
अपनो डोल बजईओ ने ।।
"जय कुमार"27/05/15

Tuesday, 26 May 2015

नामुराद तेरी


नामुराद तेरी रुशवाई का गिला नहीं ।
कागज की कलियाँ थी फूल खिला नहीं ।
"जय कुमार"25/05/15

पर्वत को चीरकर


पर्वत को चीरकर रास्ता बनाने का दम रखते है ।
जमाना बदल गया लोगों से ताल्लुक कम रखते है ।।
"जय कुमार"25/05/15

अंधों की नगरी में


अंधों की नगरी में , बैंरो का राज ।
घोड़े के नाम पे , गधे के सर ताज ।
"जय कुमार"24/05/15

मेहनत के हाथ


मेहनत के हाथ रहे , नयन से बहे खून ।
हाथ में कुदाली रही , तब रोटी दो जून ।
तब रोटी दो जून , जीवन यूँ बढ़ता रहा ।
राह में रहे शूल , फूलों का घेरा सहा ।।
"जय कुमार"24/05/15

महाराणा से वीर


महाराणा से वीर का गुणगान लिख दूँ ।
अपनी भारत माता का सम्मान लिख दूँ ।
भारत भूमि पर जन्म लिया हम सबने ,
दिल के हर हिस्से पे हिदुस्तान लिख दूँ ।।
"जय कुमार"23/05/15

नयन नीर


नयन नीर से भर गये ,,,देख जगत की रीत !
जीवन भर जो संग रहे ,,,,,गात बिदाई गीत !!
गात बिदाई गीत ,,,,,साथ मरघट तक जावे !
तीन दिवस के बाद , उन्ही की खाख उड़ावे !!
"जय कुमार"23/05/15

जिंदगी एक


जिंदगी एक खुली किताब बना ।
रोशनी बिखेरता आफताब बना ।
फिसलन न रहे तेरे दामन में यार ,
उलझे ना कोई वो हिसाब बना ।।
"जय कुमार"
20/05/15

हर पल जिनका


हर पल जिनका जिक्र करे दिल ,
जाने वो कहाँ पर खोये हुए है ।
हर आरजू में वो हर दुआ में वो ,
जाने किस कंधे पर रोये हुए है ।
मशरुफ है जमाने के रंगो में अब ,
जाने किन बाँहों में सोये हुए है ।
मस्त निगाही का भरम इस कदर ,
किन ख्वाबों को सँजोये हुए है ।।
"जय कुमार19/05/15

ख्वाब में तकदीर


ख्वाब में तकदीर जगाते क्यों हो ?
रेत को मुठ्रठी में दबाते क्यों हो ?
चलना तेरा काम है चलते जाना ,
पानी पर तस्वीर बनाते क्यों हो ?
"जय कुमार"17/05/15

मुहब्बत जीत जाये


मुहब्बत जीत जायेगी तुम जो साथ दो ।
रुत हँसेंगी शक की जंजीर जो काट दो ।
रुठकर क्या मिला तन्हाई के सिवा यार ,
फासले मिट जायेंगे बढ़कर जो हाथ दो ।।
"जय कुमार"15/05/15

मेरी बस्ती में


मेरी बस्ती में ना आया करो ,
यह ख्वाबों से सजाई गई है ।
जतन से सँभारा मैने तन को ,
हस्ती मिट्रटी में दबाई गई है ।
हाड़ माँस का पुतला बना हूँ ,
इंसाँ बना इज्जत बाढ़ाई गई है ।
चेहरे पर चमक चार दिन की ,
वक्त की चाल चलाई गई है ।
जिंदगी चंद पलों का खेल है ,
आयु की लगाम लगाई गई है ।
"जय कुमार"14/05/15

दोस्ती एक प्यारा


दोस्ती एक प्यारा अहसास होता है ।
क्या गम है जब दोस्त पास होता है ।
खून का रिश्ता नहीं भरोसे का रिश्ता ,
रिश्तों में रिश्ता बेहद खास होता है ।।
"जय कुमार"11/05/15
मैं तो एक मुसाफिर हूँ तेरा ,
जहाँ ले जायेगी चला जाऊँगा ।
जिंदगी तेरी नाव में बैठा हूँ , 
तू जब कहेगी उतर जाऊँगा ।।

11/5/15