हिफाजत के दानवों से देश
हैरान हो गया ।
देख के दरिन्द्रगी मुर्दा भी
परेशान हो गया ।
रहम की भीख माँगता रहा
हाथ फैलाए ,
क्या राम रहीम गंगा का चमन
वीरान हो गया ।।
कदमों के निशानों को परछाई
हटाने लगी है ।
अक्स को अंधेरे की साज़िश
मिटाने लगी है ।
मौक़ा परस्ती मौके में बैठा
सियार वो अब ,
वजूद को मिटाने मीठा विष
पिलाने लगी है । ।
गैरत के पत्थरो से घायल
मकान हो गया ।
इंसान क्या इंसानियत से
अनजान हो गया ।
उठकर चलता चलकर रुकता
कुछ ना कहता ,
लगता वो बूढ़ा शहर अब
बेजान हो गया ।।
"जय कुमार"25/07/14