Monday, 24 July 2023

हिफाजत के दानवों से देश
हैरान हो गया ।
देख के  दरिन्द्रगी मुर्दा भी
परेशान हो गया ।
रहम की भीख माँगता रहा
हाथ फैलाए  , 
क्या राम रहीम गंगा का चमन
वीरान हो गया ।।

कदमों के निशानों को परछाई 
हटाने लगी है ।
अक्स को अंधेरे की साज़िश 
मिटाने लगी है ।
मौक़ा परस्ती मौके में बैठा
सियार वो अब ,
वजूद को मिटाने मीठा विष
पिलाने लगी है । । 

गैरत के पत्थरो से घायल
मकान हो गया । 
इंसान क्या इंसानियत से
अनजान हो गया ।
उठकर चलता चलकर रुकता 
कुछ ना कहता ,
लगता वो बूढ़ा शहर अब
बेजान हो गया ।।

"जय कुमार"25/07/14