Wednesday, 31 December 2014

झूठ को सच

झूठ को सच लिखना आसान हो गया ।
कुकर्म को कर्म लिखना आसान हो गया ।
तम को प्रकाश का भय ना रहा शायद ,
सांझ को सुबो लिखना आसान हो गया ।।
"जय कुमार"30/12/14

गीतों की माला

गीतों की माला ले आया मैं ।
प्रेम का प्याला ले आया मैं ।
भेद भाव को छोड़ छाड़कर ,
मधुशाला हाला ले आया मैं ।
जनतंत्र के पवित्र पंथ पर ।
भारत माँ के श्री चरणों में ।
भाषा , रंग , जाति भुलाकर ,
एकता की माला ले आया मैं ।।
जीवन आग जला ना पाई ।
खुदकी हस्ती भुला न पाई ।
सब संघर्षो से निकलकर के ,
दीपक जोत जला लाया मैं ।।
मुझको मुझसे मिलना था ।
पर पीड़ा को समझना था ।
मन की प्यास बुजाकर के ,
जल ज्वाला बुजा आया मैं ।।
गहरी परतों को खोजा था ।
गरतों में खुद को खोजा था ।
मैं मैं में बसने के लिए बस ,
ठाट बाट को भुला आया मैं ।।
गीतों की माला ले आया मैं ।
प्रेम का प्याला ले आया मैं ।।
भेद भाव को छोड़ छाड़कर ,
मधुशाला हाला ले आया मैं ।
"जय कुमार"30/12/14

चंद रुपयोँ

चंद रुपयों में बिकते ईमान को नमन !!
ईमान की कुर्सी पर बेईमान को नमन !
शतरंज की विसात पर बैठे है परिवार ,
नेता पुत्र नेता इस ,,,वरदान को नमन !!

"जय कुमार"29/12/14

खड़े चाहे

खड़े चाहे पहाड़ हो ।
रास्ते भी भिहाड़ हो ।
फिर राह न बदल तू ,
सिंह सी दहाड़ हो । ।
"जय कुमार"29/12/14

जल जाये

जल जाये वो बस्ती नहीं ।
मिट जाये वो हस्ती नहीं ।
चाहे तूफान हो जवानी पे ,
डूब जाये वो कस्ती नहीं ।।
"जय कुमार"29/12/14

हर खुशी

हर खुशी को जिंदगी से बिछड़ते देखा ।
सुबह को आज शाम से मिलते देखा ।
आग जलाती रही लकड़ियों को रोज ,
रुख बदला बर्फ से दूध को जलते देखा । ।
"जय कुमार"29/12/14

मुद्दतों बाद

मुद्दतों बाद मुलाकात करने आये वो ।
वेवक्त खुद खुरापात करने आये वो ।
उन अदभरे जख्मों की तड़प देखी तो ,
जिंदगी की वकालात करने आये वो ।।
"जय कुमार"29/12/14

पिटे को

पिटे को पीटते है सब ।
मिटे को मिटाते है सब ।
खड़ा हो जा अपने बल ,
गिरे को गिराते है सब ।।
लुटे को लूटता देखा है ।
छूटे को छोड़ते देखा है ।
बाजुओं मे रखना दम  ,
टूटे को तोड़ते  देखा है ।।
उँगते का नमन करते है ।
डूबते का दमन करते है ।
जिस राह होता हो स्वार्थ ,
उस रास्ते गमन करते है ।।
"जय कुमार"22/12/14

मुश्किल से

मुश्किल से मेरे अब हालात संभले है ।
शिद्दत से चाहा जिसे वेहया निकले है ।
जिल्लत से जिंदगी का अहसास भूले ,
वेरहम जिंदगी ने अपने रंग बदले है ।।
"जय कुमार"22/12/14

क्या बखान

क्या बखान करें अरमानों का 
हर तरफ मंजर है बीरानों का ।
अमन चैन सिमट रहा कोने में ,
राज बड़ रहा अब शैतानों का ।।
नाँच देख रहे रोज हैवानों का ।
क्या सुनाये रुठती मुस्कानों का ।
खून के प्यासे अब इलाज क्या ?
भटकते मजहबी परवानों का ।।
"जय कुमार"19/12/14

उन्माद है ।

यह कैंसा उन्माद है ।
शैताँ दिल आजाद है ।
मासूमों के कत्ल का ,
यह कैँसा जिहाद है ।।
"जय कुमार"17/12/14

मासूमों का

मासूमों का कत्ल कालक पोत रहे हो क्यों ।
मजहब का नाम ले दफन इंसानी जज्वात ,
ज्वालामुखी जला गला गौंठ रहे हो क्यों ।
एहसास एक दिल का होता इंसानों का ,
लकीर पार इस पार दिल तोड़ रहे हो क्यों ।
मेरा दर्द तेरा दर्द दर्द का ना कोई मजहब ,
लकीरों से धरा बाँटकर दर्द बाँट रहे हो क्यों ।
खून के प्यासे हो जो भूखे हो चीखों के ,
इन दरिंद्रगो से हमदर्दी जोड़ रहे हो क्यों ।
एक पटल पर खड़े हो जाये हम दोनों ,
नस्लो को अब इस राह मोड़ रहे हो क्यो ।

"जय कुमार"17/12/14
सड़क किनारे पड़ा वो काँपता रहा ।
आता जाता हर शख्स झाँकता रहा ।
सुबह - सुबह शोरगुल काफी हुआ ,
रात भर उसपे मौसम नाँचता रहा ।।
"जय कुमार"
फिजा का बदला रंग सा क्योँ है ?
इंसानो का दिल तंग सा क्यों है ?
क्या कोई वेवक्त सो गया राह में ?
शहर का हर चेहरा दंग सा क्योँ है ?
"जय कुमार"

खलिश

खलिश दिल की दवाये हुए है ।
जख्म से खुशियाँ चुराये हुए है ।
फूलों के अर्क नसीब ना मुझको ,
खुशबु पसीने से नहाये हुए है ।।


मिट्टी की महक बदन में समाई ।
मेहनत अपनी चमन में दिखाई ।
जिल्लत से नफरत हुई मुझको ,
हस्ती को हमने अगन में दबाई ।।
"जय कुमार"13/12/14

Monday, 15 December 2014

अदब

इतने अदब से पेश आया जमाना !
बैचेनी का सबब , जख्म पूँछ गया !!

"जय कुमार"
नींद पिता की बेमानी हो गई ।
फर्ज की कठिन कहानी हो गई ।
लोभ के जाल समाज की नजरें ,
बिटिया उसकी सयानी हो गई ।।
"जय कुमार"
एक पथिक हू मैं जीवन का ।
बैठा अंगारों में ठन्डे मन का ।
राह खोजता अपनी मैं खुद ,
शूरवीर हूँ मैं अपने रण का ।।
एक पथिक हूँ मैं जीवन का . .
संघर्ष की दीवारों में रहता ।
सुख दुख हँसकर मैं सहता ।
एक घर मेरा कहते संसार ,
अभिमान नही मुझे धन का ।।
एक पथिक हूँ मैं जीवन का . .
काल की गति समझा करता ।
करता जो बो यहीं पे भरता ।
छुपाना कुछ न आता मुझको ,
अपने मन मंदिर पावन का ।।
एक पथिक हूँ में जीवन का . . .
"जय कुमार"24/11/14
मौन की भाषा मगरुर हो नहीं सकती ।
दृढ़ विश्वास हो तो हार हो नहीं सकती ।
जीतने के लिए हराना जरुरी नहीं यारो ,
हराकर किसी की जीत हो नहीं सकती । ।
"जय कुमार"

यह तू

यह तू कैंसा गुरुर करता है ।
बुझने वाले नूर पे मरता है ।
परख पारखी ना रही तेरी ,
पत्थर को कोहिनूर कहता है ।
मंजिल तेरी एक भ्रम ही है ,
सोच किस राह पे चलता है ।
राज दफन किये है दिल में,
खुली किताब क्यों बनता है ।।
"जय कुमार"21/11/14

काये भैया काये

काये भैया काये रो रये ।
मीठी बातें सुनके ,
जमाने सो रये . . . . . !
काये भैया काये रो रये ।।
देखो करजुग को हाल ।
बेईमान तो मालामाल ।
उजारे को अँधेरो डरात ।
जिंदा भूखो , मुर्दा खात ।
अँधियारी रातों में अब ,
भुनसारे हो रये . . . . . !
ऐसे रो रये . . . !
काये भैया काये रो रये ।
मीठी बातें सुनके ,
जमाने सो रये . . . !
"जय कुमार"22/11/14

नदियों की तरह

नदियों की तरह तुझे बढ़ना होगा ।
फूलों की तरह तुझे खिलना होगा ।
फूल नसीब हो चाहे काँटे राह में ,
अपने पैरो पर तुझे चलना होगा ।
दौर खिलाफ होता या मन हमारा ,
इन इल्जामोँ को तो बदलना होगा ।
जाल बिछाया खुदने खुदको जो ,
तंग रास्तों से अब निकलना होगा ।
तारे स्थिति बदलते अपनी रोज ,
साथ वक्त के तुझे बदलना होगा ।
समय की आँधी में उड़ गये ख्वाव ,
बिसरे ख्वावों को भी मचलना होगा ।
"जय कुमार"26/11/14