Sunday, 30 March 2014

कोई नज्म सुनाकर

कोई नज्म सुनाकर क्या करना ।
फिर दर्द बढ़ाकर क्या करना ।
जो बीत चुका वह बीत चुका ,
अब जख्म दिखाकर क्या करना ।

मन मीत बनाकर क्या करना ।
अब प्रीत बढ़ाकर क्या करना ।
जब देख लिया असली चेहरा ,
प्रेम संगीत सुनाकर क्या करना ।

अब जीत दिखाकर क्या करना ।
अब हार दिखाकर क्या करना ।
समभाव में जीना सीख लिया ,
फिर आग दिखाकर क्या करना ।

"जय कुमार" 30/03/2014

गमगीन ना हो

चलो गगन में गमन करें , गमगीन ना हो ।
चलो चमन में चगन करें , अर्थहीन ना हो ।
जिया हमने बिन उद्श्योँ का यह जीवन ,
चलो चलन में चलन करें , लक्ष्यहीन ना हो ।।

मन मोहताज कहाँ , मोहलतों का यहाँ यारो ।
मन मोहताज कहाँ , सोहरतों का यहाँ यारो ।
यह आजाद परिंद्रा बंदिशे ना रोक पाँई ,
मन मोहताज कहाँ , हसरतों का यहाँ यारो ।।


"जय कुमार" 29/03/2014

Saturday, 29 March 2014

एक ईमान कि कविता

मैंने कुछ नेताओं के बीच
एक ईमान कि कविता सुनाई
कविता कि वाह वाही हुई
उन्होंने मेरी पींठ थपथपाई
देखकर ऐसे लगा कि वह
वाह वाही के वहाने ठुंसे मार रहे है
सहवासी के रूप में गालियां देकर
अपना गुस्सा निकाल रहे है
एक नेता जी ने मुझे
आराम से बाजु में बुलाया
बुलाकर के फिर उन्होंने
मेरेको मीठा  मस्का लगाया
नम्रता से बोले आपका
बहुत नाम सुना है हमने
आप बहुत अच्छी कवितायें लिखते है
आपके नाम का हल्ला चारो ओर है
सख्सियत से आप ईमानदार दिखते है
मै तो आपका कायल हूँ
ईमानदारी के पथ पर  हूँ
बोले रिशवत से तो तौबा तौबा
कोसो दूर रहे घोटाले
जनता का सेवक हूँ प्यारे
जनता चाहे जब हमें बुलाले
मेरा काम है जनता कि सेवा
सेवा करता जाँऊगा
आज नहीं तो कल
पी एम का पद भी पाऊँगा  
नेता जी धीरे धीरे अपनी बात आने लगे
मुझे अपना दुखड़ा सुनाने लगे
बोले आजकल मेरी राजनीति के
सभी ग्रह उलटे चल रहे है
मेरी पार्टी नहीं है सत्ता में
और सी बी आई के छापे पड़ रहे है
पांच घोटालो और तीन चार
अपहरणों के मामलो में फँसा हूँ
ऊपर से सी बी आई के छापे
बड़ी टेन्सन में पड़ा हूँ
जनता में मेरी छवि बिगड़ती जा रही है
चुनाव सर पर है चिंता खाए जा रही है
मैंने कहा आप बात को रेलगाड़ी की तरह
लम्बी मत खींचिए
जुबान कि जंजीर को जल्दी से खींचिए
आप मुझसे क्या कहना चाहते है
साफ साफ तरीके से बोलिए
वक्त बर्बाद करने से अच्छा
आप  अपना मुख खोलिए
नेता जी मुश्कराये और बोले
आप एक  कविता लिखे जो
जनता को मोहित करने वाली हो
मेरी डगमगाती नैया को
पार लगाने वाली हो
जो मेरी तरफ लहर पैंदा कर दे
मेरी छवि को
ईमानदारी छवि में बदल दे
लोगो के दिलों में
मेरे समर्थन का जोश भर दे
कोई सुने तो ऐंसा लगे कि
गीता कि गंगा बह रही है
सुनाने वाला ऐंसा लगे कि
कृष्णा के मुख से वाणी खिर रही है
बोले मेरे दफ्तर में
कविता लिखके दे जाना
मेरे सेकेटरी से
जितने का चाहो चैक ले जाना
बोले जब हम एम पी बन जांयेगे
हम और अप दोनों दबा के खांएगे
मुझे बहुत तेज गुस्सा आया
पर क्या करू नेताजी थे
में कुछ नहीं कह पाया
फिर भी  मैंने कहा 
मेरी कवितांए बिकाऊ नहीं है
बोले में जनता हूँ कि 
तुमरी कवितांए बिकाऊ नहीं है
यदि खरीदना होता तो
इतनी प्रस्तावना ना डालता
ईमानदार हो इसलिए
इतना समय बर्बाद किया
नहीं तो माल निकलता
और कविता को जेब में डालता
इतना कह नेता जी चले गये
नेता जी तो चले गये
और हम खड़े रह गये
फिर मै  सोचने लगा
इस देश में ईमानदार लोग
कुछ तो करते है
भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर पाते तो क्या
भ्रष्टाचारियों का
समय तो बर्बाद करते है
इसी प्रकार हमने भी
नेता जी का समय बर्बाद किया
संतोष था जितने समय मेरे साथ रहा
कम से  कम उसके 
शैतानी दिमाग का प्रयोग न हुआ
अब आप सोचेंगे कि आपने अपना लेख
नेताजी को दिया या नहीं दिया
अरे मित्रों मैंने तो अब नेताओं के बीच
कविता सुनाना ही बंद कर दिया

"जय कुमार " १९ /०८ /२००४




 

Friday, 28 March 2014

चंद लम्हों

चंद लम्हों की चाँदनी थी वो ।
चंद अल्फाजो की चमक थी वो ।

बसंत की खूबसूरती उसमे ,
साँवन की सजी घटाये थी वो ।

गीष्म की गर्मी समाई उसमें ,
शरद की शीतलता थी वो ।

ख्याल किसको रहा रिवाजो का ,
मदमस्त मगरुर जवानी थी वो ।

हाथ में किसी के कुछ ना रहा ,
वक्त की वर्वर कहानी थी वो ।

टूट गई ठोकर खाकर आज जो ,
जह्न की जर्जर निशानी थी वो ।

जश्न मनाते रहे आशमान मेँ ,
जमीँ जीवन की कहानी थी वो ।

"जय कुमार"  27/03/2014

Thursday, 27 March 2014

कभी कभी अपने आप में

कभी कभी अपने आप में भी झांक लिया कर ।
कभी कभी अपने गमों को भी पी लिया कर ।
हँसती दुनिया तेरे रोने पर अगर मेरे यार ,
कभी कभी अपने आप पर भी हँस लिया कर ।

कभी कभी उठकर बैठना भी अच्छा होता ।
कभी कभी चलकर रूकना भी अच्छा होता ।
दोड़ने वाले अधिक फासला तय नहीं करते ,
कभी कभी पैदल मंजिल पाना भी अच्छा होता ।

कभी कभी जुड़कर टूटना भी अच्छा होता ।
कभी कभी टूटकर जुड़ना भी अच्छा होता ।
सबको वेवफा कैँसे कहें अब मेरे मित्रो ,
कभी कभी छोड़ जाने वाला भी अच्छा होता ।

कभी कभी बड़ोँ को ना छोटे देख लिया कर ।
कभी कभी हीरे को ना कोयला देख लिया कर ।
समुंदर के पानी ने कब प्यास बुजाई मित्रों ,
कभी कभी महलों को ना झोपड़ी देख लिया कर ।

"जय कुमार" 27/03/2014

चले थे चमन को

चले थे चमन को कल चहकाने वो दीवाने ।
चले थे चारों ओर चाहत बढ़ाने वो दीवाने ।
मशगूल हो गये हम याद भी ना रहे अब वो ,
चले थे चमन को चार चाँद लगाने वो दीवाने ।

"जय कुमार" 24/03/2014

बेकरार हो गया

दिल को समझाया मगर बेकरार हो गया ।
रफ्तां रफ्तां मुझे तुझसे प्यार हो गया ।

आ भी जाओ अब मेरे आँगन में प्रिय ,
बहुत ज्यादा अब इंतजार हो गया ।

मेरा दोस्त बनकर आया था तु ,
मेरी जिंदगी का अब यार हो गया ।

घूंघट मेँ चांद छुपा था कोई ,
आज उसका मुझे दीदार हो गया ।

लिखता होगा कोई नसीबा जरुर ,
रब पर मुझे ऐतबार हो गया ।

"जय कुमार " 21/03/2014

Wednesday, 19 March 2014

वो बिलों से बाहर

बज गई अब बीन चुनावों की ,
वो बिलों से बाहर फिर आने लगे ।

अपना असली चेहरा जो छुपाये ,
देश राग वो सब अब गाने लगे ।

कीड़ो से बत्तर समझते रहे जो ,
वो रंगीन सपने अब दिखाने लगे । 

सालो जिनको रुलाया था जिनने ,
वो सपेद पोस अब मनाने लगे ।

चार दीवारो मेँ जो बंद थे कभी ,
उनको फिर वो अब जगाने लगे ।

हीरे को मौका कहाँ मिलता अब ,
वो फिर खोटे सिक्के चलाने लगे ।

किया कुछ ना दिखा उनका तब ,
वो वादों से फिर बहलाने लगे ।

लोकतंत्र के भाग्य तो देखो मित्रो ,
संसद में गुंडे नजर अब आने लगे ।

सियासत का खेल भी बड़ा निराला ,
अब दुश्मन भी हाथ मिलाने लगे ।

"जय कुमार" 17/03/14

काजल कान्हा


काजल कान्हा से कहे मोहे अंग ते काहे लगाये ।
राधिका से रसिया ते मिले तब रंग ते लगाये ।
होरी होली तोहरी अंग ते लगाये रंग जो ,
श्याम श्याम रंग से रंगे ते शयाम ना हो जाये ।।

जय कुमार 17/03/14

ये पावन त्योहार हमारे

ये पावन त्योहार हमारे ,
मिल जुलकर रहना सिखाते है ।
ये पावन त्योहार हमारे ,
हमे सतरंगो से जुड़ना सिखाते है ।

पल पल खुशियाँ बाँटे हम ,
चहकादे अपना चमन हम ,
ये आपस में हँसना सिखाते है ।

आगे आये कर्तव्य मार्ग पर ,
आगे आये राष्टीय धर्म पर ,
ये मानव को चलना सिखाते है ।

ह्रदय से ह्रदय मिल जायें ,
फासले दिलों के मिट जायें ,
ये समाज को बढ़ना सिखाते है ।

अहं वहम् से मुक्त रहे हम ,
क्रोध घृणा से मुक्त रहे हम ,
ये सदमार्ग पर चलना सिखाते है ।

"जय कुमार" 16/03/14

Friday, 14 March 2014

कुछ अलग किया जाए ।

अबकी होली यारोअब  , कुछ अलग किया जाए ।
रंगों का उपहार किसी मजलूम को दिया जाए ।

अपनी कोठी के दरवाजे सब खोलकर रख देँ ,
ऐसा दिल अल्लाह अब सभी को दिया जाए ।

किसी मजबूर का , फायदा ना उठा पाये अब कोई ,
आग बड़ चुकी , मेरे मौला अब इंसाफ किया जाए ।

सदियों से झेलते रहे कहर जमाने की रवायत का ,
वक्त बहुत बढ़ चुका अब तो जायजा लिया जाए ।

किसी को सुख महलों , किसी को झोपड़ी नहीँ ,
अब मानव भाग्य लकीरों को ना दिया जाए ।

किसी दुनिया में तो घर तेरा भी होगा मेरे रब
घर उजड़ता उसके दर्द को अब समझ लिया जाए ।

"जय कुमार" 13/03/2014

Thursday, 13 March 2014

एक बच्चा रोटी

मैं यों ही करता रहा आवाज, 
वो दिल से लेते रहे ।
मैँ दिल में लकीरें खींचता रहा , 
वो दिल से मिटाते रहे ।

कल आया सामने वो ,
एक अरसे के बाद मेरे यारो 
मैं वर्षो का दर्द सुनाता रहा , 
वो अपने रंग दिखाते रहे ।

बात सिर्फ वादों की नहीँ
कसूर तो बस इतना हुआ ,
मैं भरोसा करता रहा ,
तुम भरोसा दिलाते रहे

राह में मुसाफिर चलता रहा ,
बेबाक मुस्कराते हुये
लोग दीवाना कहकर ,
सरेयाम मजाक उड़ाते रहे ।

दुनिया का क्या करें वयां
मेरी हालत जब हुई नाजुक ,
दिल में बसने वाले ही मुझे ,
किनारे दिखाते रहे ।

एक बच्चा रोटी के खातिर ,
रोता रहा सड़क किनारे
लोग रंगीन महफिलों में ,
यों ही जाम उछालते रहे ।

"जय कुमार" 13/03/2014

गर्मी में बसकारो

गर्मी में बसकारो लग गयो ,
का करईंयाँ है भगवान ।

ओरे  गिर रये पानी गिर रओ ,
रो रओ भैया आज किसान ।

मसूर सड़ रई चना सड़ रयो ,
गेंहू अब हो गयो बेजान ।

खेतन की हालत जा देखत ,
हमरे निकरे जायें प्राण ।

दद्दा रो रये बऊ सोई रो रई ,
भैया कैसे खैहे अब ज्ञान ।

सोयाबीन सोई नई निकरो ,
खेरमाई काय बैठी अंजान ।

मोढ़ी को ब्याव है करने ,
मँहगाई से अब जाबे जान ।

आशमान से आफत गिर रई ,
धरती हो रई है बेजान ।

कछु रहम भोले
 ने आबे  ,
जहर बरसा रये जानईं जान

किसान की पगड़ी है चरणो में,
रहम करों अब भगवान ।


"जय कुमार" 10/03/2014

तुमसे मिलकर

तुमसे मिलकर मुझको सुकून जो मिलता था ।
दिल की गहराई मेँ कोई फूल जो खिलता था । 

आज भी याद करता , वो तेरी मासूम बातेँ ,
जब कभी तू मेरा बनकर , मुझसे मिलता था । ।

कल ही कि बात जब , मेरा हमराह दोस्तो ,
झगड़गर मुझसे ही , जब वो गले मिलता था । 

आया कोई तूफान , फिर्क किसको थी दोस्तो ,
जब महबूब की आँखों में , नेक प्यार पलता था

किसको खबर थी तब यारो , लाजो -शर्म की ,
मुहब्बत का जज्वात , जब दिल में मचलता था ।

लूट लेता पहले मुझको , हिज्र आग में जलाया ,
दिल की नगरी में ,जब कोई लुटेरा पलता था ।

"जय कुमार" 09/03/2014

कुछ बात बने

राम रहीम का मेल हो तब , कुछ बात बने ।
मिल जुल कर रहे हम तब , कुछ बात बने ।

कब तक यों अपनो से लड़ोगे मेरे देश वासियोँ ,
उँच नीच की दीवारे टूटे तब , कुछ बात बने ।

गले सदियों से मिलते हम जमाने के सामने , 
जब हमारे दिल मिलें , तब कुछ बात बने ।

तेरे आने पर चेहरा मुस्कराये मन चुप रहता ,
मन के तार खिलखिलाये , तब कुछ बात बने ।

टूटी को जोड़े , जुड़ी को करे हम और मजबूत ,
बिखरी पन्खुड़ियाँ से फूल बने , कुछ बात बने ।

हवाओं में नफरत का जहर अब बहुत घुल चुका ,
फिजाओं में नेकी की खुशबू घुले , कुछ बात बने ।

"जय कुमार 07/03/2014

Friday, 7 March 2014

वो चेहरा दागदार

बेपर्दा हो गया आज , वो चेहरा दागदार ।
बेसुरा हो गया आज , वो गीत रागदार ।
खो गया कहीं आज , वो पुराना आलम ,
जब सामने आया आज , वो सितमगार ।

चलता रहा नाटक , नकाब के पीछे ।
चलती रही छुरियां , सीने के पीछे ।
रोता रहा दिल , गरम आँसुओं तले 
पलते रहे सपोले , मेरी नाक नीचे ।

करता रहा भरोसा , अपना बनाकर ।
सोता रहा हमेशा , सपनो में बसाकर ।
पाता रहा सुकून , फरेब की बातो से ,
तड़पता हर पल , उसे रुह में बिठाकर ।

मुकाम मुमकिन नहीं , मेरा दर्द जमाना ।
जीवन जीता नहीं , साँसो का फसाना ।
सबको होता मेरे , होने का यकीन यहाँ ,
होता होता नहीं , बस आँखो का बौराना ।

जय कुमार" 04/03/2014

निशा ने

निशा ने , नितदिन , निशान भोर के तो छोड़े होंगे ।
असत्य ने , आतिकर , सत्य के बीज तो छोड़े होंगे ।
अपने ह्दय में रख , अटल विश्वास मानव अब तू ,
प्रश्न ने , प्रश्नके , प्रकृति में उत्तर तो छोड़े होंगे ।।

"जय कुमार" 02/03/2014

साथ जो तेरा होता

हम भी कर गुजरते खास , साथ जो तेरा होता ।
जिंदगी गुजरती सुकून से , हाथ जो तेरा होता ।।

जमीन पर तारे लाने की , हिम्मत रखते हम ,
कोई दीवाना , हमदर्द , अगर मेरा होता ।। 

मुकम्मल जहां अपना कर लेते हम भी शायद ,
निगाहो का करम , अगर हमपर तेरा होता ।।

"जय कुमार" 02/03/2014

अब तो बस वासनाओं

कदमों की आहट से जो पहचान लिया करते थे ,
वो अब सामने आकर भी अनजान बनते है । ।

बेईमान चादर की छाँव मेँ जिते रहे जो लोग ,
अब वो सब इस जमाने के ईमान बनते है ।

रब की तरह पूजते रहे हम जिनको सदियोँ ,
हमारे आँसुओं को देख वो अब बेजान बनते है ।

ख्वाब में भी कभी खुशी ना मिली हो जिनसे ,
वो ही मेरी जिंदगी के अब अरमान बनते है ।

ख्वाब टूट गया अब , टूट गयी वो कसमेँ ,
जिन वादो से रब के , इम्तिहान बनते है ।

वो जमाना ओर था जब मुहब्बत होती थी ,
अब तो बस वासनाओं के फरमान बनते है ।

"जय कुमार" 28/02/2014

जीवन जब संघर्ष

जीवन जब संघर्ष , कहकर क्योँ रोते हो ।
जीना जब मजबूरी , मजबूर क्योँ होते हो ।
जब तक साँसो की आबाजाही खेल तब तक ,
रंगमंच , फिर झूठा अभिनय क्योँ करते हो । । 

"जय कुमार" 27/02/2014

कर्म , धर्म

कर्म , धर्म , मर्म को समझता चल ।
अर्स , फर्स , उत्कर्ष को देखता चल ।
यह जीवन नाव , सदा मझधार मेँ ,
अपनत्व,सतत्व, प्रभुत्व से मिलता चल ।

"जय कुमार" 25/02/2014

बढ़कर , चलकर

बढ़कर , चलकर , मिलकर हाल तो जाना होता ।
बिछड़कर , आकर , दर्द को तो पहचाना होता । 
जो दिल के करीब रहे सदा , आशा की थी उनसे ,
मंजिलों , ख्वाहिशों , रास्तो को तो माना होता ।। 

"जय कुमार" 24/02/2014

साँस,नब्ज,धड़कन

साँस,नब्ज,धड़कन का खेल है जिँदगी ।
दिन , रात , शाम , का मेल है जिँदगी ।
वो पाकर गरीब , कुछ खोकर अमीर हैं ,
आत्मा , मन , तन का मेल है जिंदगी ।।

कल की बात थी जीवन रवानी पर था ।
हर बात थी छोटी दिल वेईमानी पर था ।
नेकी बदी का किसको था ख्याल तब ,
खून उबल रहा था मन जवानी पर था ।

अब सामने अतीत ने पैर पसारे है आज ।
तेरे अपने ही तुझको अब बिसारे है आज ।
पैर थक चुके है अब आँखो में धुंधलापन ,
अतीत के वो सारे पन्ने अब हमारे है आज ।।

" जय कुमार " 23/02/2014

मेरी उम्मीद से

मेरी उम्मीद से भी तुम कहीं ज्यादा निकले ,
वेवफा समझते थे तुम तो मेरे कातिल निकले ।

धोका मिला उनसे जिनसे आस थी वफा की ,
वो मझधार के तिनके ही मेरे साहिल निकले । ।

कभी खंजर की चोट ने दर्द ना दिया मुझको ,
मेरी मुहब्बत के फफोले ही कातिल निकले ।

गँवार कहकर पुकारा जमाने ने जिनको ,
वो सब शख्स वफाओं के फाजिल निकले ।

"जय कुमार" 21/02/2014

मैं अकेला निडर घूमता हूँ

मैं अकेला निडर घूमता हूँ तेरे शहर में ।
जीने का सहारा ढूँड लेता हूँ तेरे कहर में ।

वक्त की मार है या मेरा कल सामने आया ,
टूटता जा रहा हूँ अब मैं हरेक पहर में ।

दिन बीत गये फिर बो बीत गयीं बो बातेँ ,
अब बस मुहब्बत नजर आती तेरे जहर में ।

कौन कहता है तेरा असर फीका पड़ गया ,
कई दीवाने भटकते है अब भी शहर मेँ ।

कमजोर पड़ गया मेरा दिल फिर एक बार ,
जब तूने मेरे नाम को उछाल दिया बाजार मेँ ।

लौटकर आ ना आ अब यह तेरी मर्जी ,
मेरी तो जिँदगी गुजर जायेगी गजल में ।

"जय कुमार" 20/02/2014