Tuesday, 27 September 2016

उन परिंद्रो को दर्द ए गम की फिक्र कहां  ,
इश्क ए दरिया में जिंदगी बसर करते है ।

उन  दरख्तों को  हवायें नही डरा  पाती,
सीने  में  जिनके बबंड़र सफर करते है ।

रोज मिलते है  जमाने  की राहों में लोग ,
भूलते नही जो दिल  पर असर करते है ।

पुष्प खिलते है बागों में हर दिन ही नये ,
महकते वो  जो काँटों में बसर  करते है ।

एक रोज पत्थर भी पिगल जाता मगर ,
हम अपने  जज्वातों में  कसर  करते है ।

बेपनाह मुहब्बत के जज्वात वयां नहीं ,
चाह में उसकी जय रूह नजर करते है ।

"जय कुमार"

Saturday, 24 September 2016

कछु  तबाही  तुमने  देखी
कछु  तबाही  हमने  देखी
फिर भी चैन  परत  नईंया
नौने   काम  करत  नईंया

सैंतालीस  के  जख्मों  खों
जले  मुर्दो  की  भस्मों खों
उन्हे  उखाड़ दर्द बड़ा रव
ऐसेअडुआ खूब अड़ा रव

पाछे की तें  काय पड़त हे
आंगे   काय  बड़त  नईंया

नौने   काम   करत  नईंया
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कुण्डलवन की घाटी मोरी
महादेव   की   माटी  मोरी
उलटी गंगा काय बहा रव
लहु से हमरे खूब नहा रव

पाक  नाव  कैने  रख  दव
नाव पे खरो उतरत नईंया

नौने   काम  करत  नईंया

......................................

गीदड़ की है जात  तुमारी
हमसे भिड़हो मात तुमारी
सोय शेर खां तें  जगा  रव
आफत बैठे काय बुला रव

रगड़त  हम  तोखां ऐंसे हैं
भगतन गैल मिलत नईंया

नौने  काम   करत   नईंया
......................................

कछु  तबाही  तुमने   देखी
कछु  तबाही  हमने   देखी
फिर भी चैन  परत  नईंया
नौने  काम   करत   नईंया

"जय कुमार "२४/०९/१६


नागों को  दूध  पिलाया  सिन्धु  का
सम्मान रखा  हमने  इक  बिन्दु का
तोड़ दे संधि भारत का सिरमौर  है
सच्चा  बेटा तू जो  हिन्द  हिन्दू  का

तीन सौ सत्तर का करदे नाश अब
दो  सौ  बहत्तर   हैं  तेरे  पास  अब
हिम  वादी  में  न रहे कोई  अड़चन
घाटी में  सारा  देश  करे  वास अब

वक्त  मील  के  पत्थर  बनने  का  है
भारत की अब धड़कन सुनने का है
तुझको   धागों   के   जोड़  तोड़कर 
इतिहास  फौलाद   से  बुनने  का  है

"जय कुमार "

Thursday, 22 September 2016

करनी कथनी इक हुई , सुन शरीफ के बोल |
खुद  ही सबको कह रहे  , देखो   मेरी   पोल ||

"जय कुमार "

पूरा    होगा   अपना   सपना  ,  पूरे   होगे  अब  अरमान |
घर  घुसकर  दहसतगर्दो  के , तोड़ेंगे   दुश्मन  का  मान ||

नालायक  पर  करो  चड़ाई  , दिल्ली  से  आया  फरमान |
मिला सुअवसर कुछ करने का , बाँध लेव साजो सामान ||

भारत  माँ के चरण  पखारें , अपना जन्म सफल हो जाय |
खून    के   बदले   खून   लेंगे , दुश्मन   को  छोड़ेगे  नाय ||

सिर पर कफन बाँधकर निकले , भारत माँ के वीर सपूत |
चले  हिमालय  की  चोटी पे , दिख  रहे   यमराज  के दूत ||

भारत  के   कोने   कोने  से , अपना  जलवा  रहे  दिखाय |
आका  के  नापाक  इरादे  , अब  तो मिट्टी में मिल जाय ||

"जय कुमार "

Monday, 19 September 2016

मर मिटते  वतन के लिए
चल बसते चमन के लिए
मसलने  का  समय  सही
बात  न  हो अमन के लए

सियासत में बस निंदा  है
हर   भारतीय  शर्मिंदा  है
लाश  बेटो  की   देखकर
मर गया पिता जो जिंदा है

कल आज कुछ दिखता नहीं
हर  दिन  झूठ  बिकता  नहीं
रेत   पर     रकीले    खींचते
पत्थर पर क्यों लिखता नहीं

"जय कुमार "









Friday, 16 September 2016

चौपई छंद

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🌹शिल्प विधान :- चौपई छन्द🌹

(1) चार चरण का सम मात्रिक छंद

(2) प्रत्येक चरण में 15 मात्रा

(3) चारों चरणों में समतुकांत

(4) प्रत्येक चरण का अन्त गुरु लघु से

(5) चौपाई की लय पर लिखा जा सकता है अंत में गुरु लघु रखकर।

(6) आल्हा के सम चरण से भी चौपई छन्द बनता है।

उदाहरण चौपई छन्द 👇

(1) हाथीजी की लम्बी नाक, सिंहराज की बैठी धाक।
भालू ने पिटवाया ढाक, ताक धिना-धिन धिन-धिन ताक ॥

(2) बन्दर खाता काला जाम, खट्टा लगता कच्चा आम।
लिये सुमिरनी आठो याम, तोता जपता सीता - राम ॥

(3) पड़ी अचानक नदी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस पार, तबतक चेतक था उसपार॥

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आँखों

आँखों की  शरमाई  देखी
होंठो  की   नरमाई   देखी

लुटने  वाले  लुटते  रहते
वांहों  की   गरमाई   देखी

गोरे बदन की  गोरी मिले
कारों  की  भरमाई   देखी

भंवर कुमुदनी पे मचलता
फूलों  की  कुमलाई  देखी

जंगल सी शहरों  की राहें
कली  कली मुरझाई देखी

"जय कुमार"

Thursday, 15 September 2016

जबसे हमारा और आपका परिचय हुआ , तबसे लेकर आज तक मुझसे व मेरे आचरण के द्वारा आपका या आपके परिवार का अपमान हुआ हो , दिल दुखाया हो , निंदा की हो , बुराई की हो , ईष्या की हो , कर्कस वचनो से पीड़ित किया हो इत्यादि .....

किसी  भी प्रकार का अनुचित व्यवाहार या अनुचित आचरण किया हो ...उपरोक्त नादानियाँ जाने अनजाने में हुई हो  , उनके लिए आपसे और आपके परिवार से सह्रदय क्षमा प्रार्थी हूँ !!

उत्तम क्षमा

सादर नमन काव्यमित्र परिवार
चौपई छंद में मेरा पहला प्रयास
आप सबकी समालोचना के लिए
सादर प्रणाम के साथ

घर में लगती हो जब आग
कैंसे     गाने     बैठे    फाग
सोने  बाला  तू  अब  जाग
सरहद  पर   बैठा  है  नाग

"जय कुमार "

दोहा

चेहरा इस जीवन का , करता रहा  बखान |
अपनी ही छाया मुझे ,  कर जाती परेशान ||

"जय कुमार"

Monday, 5 September 2016

सादर नमन काव्यमित्रों !
आल्हा काव्य पर प्रथम प्रयास ,, सादर प्रणाम के साथ

भारत के गुजराज प्रांत में , पोरबंदर शहर का नाम |
जिसमें जनमा एक महात्मा , मोहनदास था  जिसका नाम ||
बापू करमचंद जी जिनके , पुतली बाई जिनकी मात |
कलम में बल नहीं है फिर भी  , महापुरुष की गाथा गात ||

"जय कुमार "

Thursday, 1 September 2016

धरती की कहानी आसमान  सुनाने  लगता  है |
जीत लेता खुदको  खार पुष्प खिलाने लगता है |
समुंदर  को दे चुनौती खड़ा  रहता  हूँ राहों  पर |
लहरें हार जाती  हैं  साहिल   बुलाने  लगता  है ||

"जय कुमार"