उन परिंद्रो को दर्द ए गम की फिक्र कहां ,
इश्क ए दरिया में जिंदगी बसर करते है ।
उन दरख्तों को हवायें नही डरा पाती,
सीने में जिनके बबंड़र सफर करते है ।
रोज मिलते है जमाने की राहों में लोग ,
भूलते नही जो दिल पर असर करते है ।
पुष्प खिलते है बागों में हर दिन ही नये ,
महकते वो जो काँटों में बसर करते है ।
एक रोज पत्थर भी पिगल जाता मगर ,
हम अपने जज्वातों में कसर करते है ।
बेपनाह मुहब्बत के जज्वात वयां नहीं ,
चाह में उसकी जय रूह नजर करते है ।
"जय कुमार"