Thursday, 17 September 2015

शब्दों से तीर

शब्दों  से  तीर  चलाता  हूँ ।
शब्दों  से  नीर   बहाता  हूँ ।।

मैं प्यार को  शब्दों में लिखूँ ,
शब्दों  से  गीत  बनाता  हूँ ।

शब्दों में अहसास ह्रदय के ,
शब्दों  से  मीत  रिझाता हूँ ।

शब्द  प्रेम  की  अनूभूति है ,
शब्दों  से  प्रीत  बढ़ाता  हूँ ।

शब्दों  की  माला  गूंथू   मैं ,
सुन्दर सी  रचना लाता हूँ ।

अंतस में जब भाव उमड़ते ,
शब्दों से  खूब  सजाता  हूँ ।

चलते फिरते हरपल ही मैं  ,
शब्दों का जाम पिलाता हूँ ।

भाव किसी के पडकर के मैं ,
शब्दों  में  उन्हे  बताता   हूँ ।

भाव ह्रदय  कागज पे लिखूँ ,
अजय प्रेरणा  बन  जाता हूँ ।।

"जय कुमार"16/09/15

Wednesday, 16 September 2015

हिंसा से धरती

हिंसा से धरती थर्राये , अहिंसक राज्य लाना होगा
मूँक पशुओं की सुन पुकार , वीर तुम्हे आना होगा

कृष्ण तुम्हारी गैया कटती , शिव का नंदी घायल है
गौमाता के आँखों में आँसु , लहू से लथपथ आँचल है
दूध दही की नदिया सूखी , अब कर्त्तव्य निभाना होगा

हिंसा से धरती थर्राये , अहिंसक राज्य लाना होगा
मूँक मूंपशुओं की सुन पुकार , वीर तुम्हे आना होगा

अनाचार और दुराचार से , पीड़ित पर्यावरण हुआ
मानव नीति भूल चला है , मानवता का क्षरण हुआ
देश धर्म के खातिर अब , क्रांति बिगुल बजाना होगा

हिंसा से धरती थर्राये , अहिंसक राज्य लाना होगा
मूँक पशुओं की सुन पुकार , वीर तुम्हे आना होगा

माता की मूक कराह क्यों , तुम्हे सुनाई देती नहीं
देखकर अनाचार जवानी , क्यों अंगड़ाई लेती नहीं
दूध कीमत भुला चुके हो , कर्ज तुम्हे चुकाना होगा

हिंसा से धरती थर्राये , अहिंसक राज्य लाना होगा
मूँक पशुओं की सुन पुकार , वीर तुम्हे आना होगा

हिन्दुस्तान की धरती पर , क़त्लखाने सरेआम है 
मूक पशुओ की यूं हत्या , सर पर हमारे इल्जाम है
खून बहाकर अपना अब , गौमाता को बचाना होगा

हिंसा से धरती थर्राये , अहिंसक राज्य लाना होगा
मूँक पशुओं की सुन पुकार , वीर तुम्हे आना होगा

"जय कुमार "१६/०९ /१५








Sunday, 13 September 2015

लुटी लुटी हर

लुटी लुटी हर बस्ती है ।
जान आप की सस्ती है ।।
कोमलता को कुचल रहे
शहरों में जबरजस्ती है ।
उम्र ए लिहाज भूल रहे
आवारों की ... मस्ती है ।
लज्जा के ..तटबंध टूटते
मिटने वाली .. हस्ती है ।
दीपक की तम से यारी
छेदों वाली .... कस्ती है ।
"जय कुमार"28/08/15

अपने ही गुलशन

अपने ही गुलशन में हम ,
आओ आग लगायें आज !
आरक्षण कि माँग करें हम ,
अपना चमन उजाड़े आज !!

जितना तुम हुड़दंग करोगे !
झोली उतनी , खूब भरोगे !
जातिये शक्ति दिखाकर के ,
फूट का बिगुल बजायें आज !!

आरक्षण कि माँग करें हम ,
अपना चमन उजाड़े आज !!

बँट जाओ तुम चारों ओर !
निकलेगी खुशियों की भोर !
तोड़ फोड़ के आग लगा के ,
भारत का सर झुकायें आज !!

आरक्षण कि माँग करें हम ,
अपना चमन उजाड़े आज !

भारत माँ के आँसु पीकर !
मिट्टी के दर्दो पर जीकर !
राष्ट धर्म के चिथड़े करके ,
अपना काम बनाये आज !!

आरक्षण की माँग करें हम ,
अपना चमन उजाड़े आज !!

कोई उँचा ,,,,,,, कोई नीचा !
कोई पिछड़ा कोई अगड़ा !
भारतीय दिखता न कोई ,
आओ चलन बिगाड़े आज !!

आरक्षण की माँग करें हम ,
अपना चमन उजाड़े आज !!

"जय कुमार"27/08/15

आरक्षण की आग

आरक्षण की आग में जल रहा सारा देश है ।
घोड़ों को जंजीर बँधी गधों में लगती रेस है ।
सियासती पैँतरों से हार रही सारी जनता ,
योग्यता के कत्ल से दूषित हुआ परिवेश है ।।
"जय कुमार"27/08/15

Saturday, 12 September 2015

"आरक्षण"


एक पौधा कुछ विशेष जाति वर्णो के लोगों के लिए लगाया गया । कहा गया कुछ बर्षो में फल लेकर समाप्त कर देंगे । यह पौधा अपनी साखायें बढ़ाता रहा । खाद पानी भरपूर दिया गया जड़े मजबूत होती रहीं जमीन पर पकड़ बनाकर , इसका स्वरुप निरंतर बड़ता चला गया । एक विशाल वृक्ष बन फलने फूलने लगा । फल बहुत मीठे हुए एवं कम योग्यता कम प्रयास से मिलने लगे । यह फल केवल वो पा सकते थे जिनके लिए यह वृक्ष लगाया गया था । इसकी छाँव में रहने वाले वर्ण के कुछ योग्य लोग जिनने भरपूर दोहन कर इस वृक्ष के फलों का उपयोग किया एवं समृध्द होते चले गये । उनके अन्य साथियों को कम ही लाभ हुआ । फिर समृध्द लोग वृक्ष के मीठे फलों को छोड़कर जाने को तैयार नही हुए ।
जिन्हे इसके नीचे नही रखा गया वो इसके मीठे फलों को देख इस वृक्ष की छाँव में आने को आतुर हुए एवं संघर्ष करने लगे ।
वृक्ष के नियम नियंत्रण रखने वाली संस्थायें एवं लोग अपने स्वार्थ बस इसका स्वरुप बढ़ाते रहे । संघर्ष होते रहे स्वरुप बढ़ता गया । अब यह वृक्ष जमीन लीलते हुए अपने स्वरुप को बड़ाता रहता है । समृध्द हो चुके लोग सरलता से मिलने वाले मीठे फलों को छोड़ने को तैयार नहीँ है । कुछ इसकी छाँव पाने के लिए संघर्ष कर रहे है , जिनमें कुछ पिछड़े तो कुछ समृध्द सामिल है । नियंत्रक निजी स्वार्थ बस कुछ निर्णय लेने की स्थिति में कभी नहीँ दिखे ।
जमीन जो सर्वोपरि है उसकी चिंता किसी को नहीं , निजी स्वार्थ के लिए यह वृक्ष आज तक जीवित है । इसके मीठे फल , जमीन को विघटित समाज में जहर घोलने लगे है ।
जमीन को लीलता जा रहा यह वृक्ष , क्या खत्म नहीं होना चाहिए ?
क्या इस वृक्ष के नियम आधार अब भी नहीं बदलने चाहिए ?
क्या आरक्षण आर्थिक आधार पर नहीं होना चाहिए ?

"जय कुमार"

हाथ छूट

हाथ छूट जाते है ।
साथ टूट जाते है ।
वक्त के साथ हरेक ,
घाव सूख जाते है ।।
"जय कुमार"26/08/15

"काया"


उम्र ए हयात निकलती रही ।
समय रेत जाल बुनती रही ।
सँवारता रहा .. रोज उसको ,
वो अपना रुप बदलती रही ।।

"जय कुमार"25/08/15

कुदरत में सब

कुदरत में सब बस रहे , लाखों जिनके नाम ।
कण कण में जीवित भये , करत उसे प्रणाम ।।
"जय कुमार"25/08/15

अधलिखे गीत

अधलिखे गीत गुनगुनाना चाहते हैं !
खोटे सिक्के हम ,,,चलाना चाहते हैं !!

खूंखार चेहरा ,,,,,,,,,,,आइने में देखते !
मुखौटा जगत को दिखाना चाहते हैं !!

कमजोर को दबाकर मजबूत बनते !
डर को अपने हम,, छुपाना चाहते हैं !!

भीड़ में बैठे बनकर ,,,समाज सेवक !
विज्ञापन अपना ,,,,,कराना चाहते है !!

जंगली कानून,,,,,, शहरों में आ गया !
मजलूम को सब ,,,,,,दबाना चाहते है !!

इसकी टोपी उसके सर रखकर यारो !
होशियारी अपनी ,,,,बताना चाहते है !!

"जय कुमार"

रूखा रुखा मौसम

रूखा रुखा मौसम उजड़ा उजड़ा चमन हुआ ।
महफूज रखने वाला परदा क्यों कफन हुआ ?
बचपन लूट लिया रखवाले ..... उस माली ने ,
खिला खिला चेहरा वीरानों में ... दफन हुआ ।।
"जय कुमार"21/ 08/15

काल की डाल

काल की ,डाल बैठा
मैं मैं ,,,,,,,मिमयात है

स्वारथ की बन्शी से
सबई खो,,,रिझात है 

प्रेम के ,,,,,,,,,अँगना में
छुरियाँ ,,,,,,,,चलात है

प्यार के ,,,परिन्दों पर
बन्दिशें ,,,,,,,लगात है

माया के ,,,,,,,जालों में
साजिश,,,,,,, रचात है 

वासनाओं,,,,,,,, में पड़
जीवन ,,,,,,,,,,नचात है 

मिटने वाले,,, तन को
खूबई ,,,,,,,,,,सजात है 
 
एक कटोरा ,,,,मिट्टी
तन की ,,,,,औकात है

"जय कुमार "१९/०८/१५

बात बनाकर

बात बनाकर ।
चाल चलाकर ।
चले गये ..तुम ,
नजर चुराकर ।।
ख्वाव दिखाकर ।
राज ... बताकर ।
भुला गये ..सब ?
हौँठ .. सिलाकर ।।
साथ मिलाकर ।
खुशी सजाकर ।
लूट लिया क्यों ?
प्यार दिखाकर ।।
नीर .. बहाकर ।
बीज . उगाकर ।
काट दिया क्यों ?
फूल . खिलाकर ।।
"जय कुमार"18/08/15

कहानी हौंसलों

कहानी हौंसलों की फिर आज सुनाने आया हूँ ।
लहरों के विपरीत कस्ती मैं बहाने आया हूँ ।
कफन बाँध के चला खुशबू ए मिट्टी के खातिर .
वाजू ए कातिल का दमखम अजमाने आया हूँ ।।
"जय कुमार"16/08/15

वतन के खातिर

वतन के खातिर साथ जियेंगे हम ।
वतन के खातिर साथ मरेंगे हम ।
शिकवे हो लाख ... दरम्याँ हमारे ,
वतन के खातिर साथ चलेंगे हम ।।
"जय कुमार"15/08/15

चाल चलन की

चाल चलन की चासनी , चाचा रहे चटाय ।
चंचल चपल चोर मना , चारों ओर नचाय ।।
"जय कुमार"12/08/15

पीर पराई देख

पीर पराई देख जो , मन ना हुआ उदास ।
ह्रदय नहीं पत्थर वो , पीर नहीं आभास ।।
देश धरम पर ना चले , जीवित भी वो लाश ।
लहू नीर सा बह रहा , जन जीवन वो नाश ।।
करम पथ को छोड़ चले , माँग रहे अधिकार ।
जी रहे उस मानस के , जीवन को धिक्कार ।।
राष्ट धरम सर्वोपरी ,,,,,,, भाषा धरम न जात ।
एक ध्वज के नीचे खड़े , एक गीत वो गात ।।
"जय कुमार"12/08/15

मन की बात कहते

मन की बात कहते ही , मनमानी कर जात ।
भोले आम लोगों को ,,,, बातन से बहलात ।।
छोटे छोटे नाम के , बड़े बड़े प्रचार ।
सीधे सीधे काम के , बड़े बड़े औजार ।।
अच्छे दिन की चाह में , दिखती ना थी खोट ।
सपथ ली काले धन की ,,,, दे आये हम वोट ।।
फुल पावर में आ गये , पाँच साल ना आँच ।
फौलाद जरूरी नहीं , रक्षा करे अब काँच ।।
भैंस तुमारी हो गई ,,,,, लाठी दी पकड़ाय ।
जहाँ तुम ले जाओ जी , देश वहीं पर जाय ।।
"जय कुमार"11/08/15

काल की डाल पर

काल की डाल पर घौंसले बनाने थे ।
दरदरे जख्मों पर मरहम लगाने थे ।
रफ्तार तेज रही हयात ए सफर की ,
एक वक्त में उम्र के पुष्प खिलाने थे ।
आसमाँ में आफत धरती पे कहर था ,
दलदली राहों पर दो पैर जमाने थे ।
साहिल के बीच भँवर का साथ मिला ,
सदियों के बिछड़े दिन रात मिलाने थे ।
हाथ जल चुके थे होम लगाने में ,
जिम्मेदारियों के चप्पू चलाने थे ।
जय पराजय का साथ रहा जिंदगी भर ,
हाथों में भाले लिए खड़े जमाने थे ।।
"जय कुमार"10/08/15

बीच राह पर

बीच राह पर दंगल होने लगे है ।
शहर के लोग आपा खोने लगे है ।
कोई लुट जाता कोई पिट जाता ,
कानून के रखवाले सोने लगे है ।
झुलझता दामन नये फूलों के संग ,
क्या अंगारों की फसलें बोने लगे है ।
शहर बह जायेगा जालिम तेरा भी ,
मासूम लोग आँख भिगोने लगे है ।
लुटा घरौंदा मुफलिसी में आज फिर ,
जय बिखरे फूलों को पिरोने लगे है ।।
"जय कुमार"9/08/15

मक्कारी का

मक्कारी का खाके माल ।
फूल गये है उनके गाल ।
आसमान पे पैर रखे वो ,
नोट देखके लालम लाल ।।
भूल गये सारे सुर ताल ।
बदल रही है उनकी चाल ।
फँसते सीधे - साधे लोग ,
बिछा रखे साजिश के जाल ।।
"जय कुमार"8/8/15

असली सूरत

असली सूरत छुपाते रहे ।
बनावटी रुप दिखाते रहे ।
घर रोशन करने के लिए ,
सबके घौंसले जलाते रहे ।
किसी को देखा उजाले में ,
जले दीप क्यों बुझाते रहे ।
खिलखिलाते पंछियों को ,
रंज व गम से मिलाते रहे ।
गहरी नींद सो गया कल मैं ,
सफर के साथी बुलाते रहे ।
जय बैचेनी में मिला क्या ,
रोज ही अश्क बहाते रहे ।।
"जय कुमार"06/08/15

काँटो में पुष्प

काँटो में पुष्प से खिलने वाले ।
समय की धारा बदलने वाले ।
वो भारतरत्न अब्दुल कलाम ,
सच्चे कर्म योग पे चलने वाले ।।
भारत माँ के सच्चे सपूत को _/\_ विनम्र श्रद्धांजलि !!

वो इंसान

वो इंसान ,,,,,, बेमिमाल थे ।
भारत माँ के सच्चे लाल थे ।
अंतिम साँस तक कर्म पथ चले ,
भारतरत्न अब्दुल कलाम थे ।।
भारत माँ के सच्चे सपूत को _/\_ अश्रुपूर्ण हार्दिक विनम्र श्रद्धांजलि !!

नयी खोजो

नयी खोजो डगर आज रे ।
नई तो बच हे ने लाज रे ।।
जमीन के भये बटवारे ।
गाँव सुकड़े शहर पसारे ।
गाँव से हो रयो पलायन ,
गाँव के गिर रये साज रे ।।

नयी खोजो डगर आज रे . .
आदमन की भीड़ भारी ।
जनता से कुदरत हारी ।
भियाने का हुईये जानो ,
नियोजन की करो बात रे ।।
नयी खोजो डगर आज रे . .
बेटन खो खूब पढ़ा दयो ।
बिटिया को मरवा दयो ।
बिन बेटी सब सूना सूना ,
बिटिया पर हो नाज रे ।।
नयी खोजो डगर आज रे . .
पेड़ काटे बन गये बीहड़ ।
शेर बचे न बचे न गीदड़ ।
कहर काहे बरपा रओ अब ,
प्रकृति पे गिरा ने गाज रे ।।
नयी खोजो डगर आज रे . .
"जय कुमार"27/07/15

भुनसारे सें सकारे से

भुनसारे सें सकारे से ,
काहे उड़ा दई चादरिया ,
मोहे बतादे साँवरिया ।।
आज कछु नौनो नइ लग रओ ।
जियरा मोरो मोसे झगड़ रओ ।
कौन घरी ऐंसी आ गई अब ,
अब काहे छुपावे बाबरिया ।।

मोहे बतादे साँवरिया . .
सोलह श्रृँगार करत तें मोरे ।
जैंसी सजी थी मैं व्याव तोरे ।
लाल चुनरिया फिर उड़ा दई ,
अब काहे सजाबे बाबरिया ।।
मोहे बतादे साँवरिया . .
चार कहार लगे थे डोली में ।
सबई जने भी रोये डोली में ।
गाँव काहे अब बिदाई में आओ ,
अब मोहे सुनादे साँवरिया ।।
मोहे बतादे साँवरिया . .
जब अग्नि संग लये फेरे सात ।
लकड़ियाँ काहे जोर रये आज ।
मोरो संग बस रओ आज लो ,
संग काहे छुड़ावे साँवरिया ।।
मोहे बतादे बाबरिया . .
भुनसारे सें सकारे सें
काहे उड़ा दई चादरिया
मोहे बतादे साँवरिया ।।
"जय कुमार"27/07/15

आँखों में आज

आँखों में आज नमी क्यों है ।
चाहत में आज कमी क्यों है ।
उलझे उलझे लफ्ज हमारे ,
ये गलतफहमी बड़ी क्यों है ।
रिश्तों में गर्माहट बड़ रही ,
लफ्जों की नदी जमी क्यों है ।
एक रूह दो जिश्म हमारे है ,
शक की दीवार खड़ी क्यों है ।
सूखा सूखा प्यार का वाग ,
जख्म कि दुनिया हरी क्यों है ।।
"जय कुमार"26/07/15

सरेआम कत्ल

सरेआम कत्ल हुआ बेकसूर बाजार में ।
ताजा खबर आई ये आज के अखवार में ।
काँटों के शहर दामन रोशनी से भरे है ,
इंसानियत रो पड़ी इंसान के प्यार में ।।
"जय कुमार"26/07/15

मेरी रंगत

मेरी रंगत नहीं . . . नगीने में ।
क्या रखा खैरात की पीने में ।
मेरी मेहनत ... मुझे प्यारी है ,
मैं खुश हूँ खुशबु ए पसीने में ।।
"जय कुमार"25/07/15

पत्थर लेके

पत्थर   लेके  खड़े  हुए ।
जिद पे अपनी अड़े हुए ।
रोब  दिखाते पत्थर  से
शीशे  के  घर  बड़े  हुए ।

"जय कुमार"24/07/15

मेरी उम्मीद

मेरी उम्मीद से ज्यादा ,, निकलते गये ।
दर्द , चोट जख्म बन  नासूर बनते गये ।
मिटाता रहा खुदको गम मिटाने के लिए ,
नासाज हम हुए गम और सम्बलते गये ।।
"जय कुमार"24/07/15

सूरज तेज

सूरज तेज
बिखरे चहुँओर
रोशन दिशा
पुष्प खुशबु
बिखरे चहुँओर
कण महके

चाँद चाँदनी
बिखरे चहुँओर
कण चमके
साँवन नीर
मोती बन बरसे
नदी श्रँगार
ओढ़ चुनर
प्राकृत हरियाली
धरा बहके
ठंडी बयार
साथ सुहानी शाम
मन बहके
इंद्र धनुष
खूबसूरत छटा
खग चहके
वन में मोर
प्राकृतिक छटा में
करता नृत्य
"जय कुमार"24/07/15

क्या सगे

क्या सगे , क्या सौतेले है ।
सबने अपने खेल खेले है ।
साथ रहा कोई छोड़ गया ,
इस दुनिया के ये मेले है ।।
"जय कुमार"24/07/15

जब जब

जब जब मुँह पर ताले होंगे ।
ईमान के मुँह ,,,, काले होंगे ।।
"जय कुमार"24/07/15

ताल तलैयाँ

ताल तलैयाँ भर रहे ,,,,,,,, मेघ करें बौछार ।
बन मोती जल बरस के , शीतल करे बयार ।।
हरि चुनरिया ओड़ के , धरा रही मुस्काय ।
रूप बदल पर्वत रहे , नव जीवन को पाय ।।
बीज पड़े खिलने लगे ,,,,,,,, आशा नई जगाय ।
छोड़ चले आलस्य को , नव जीवन खिल जाय ।।
"जय कुमार"23/07/15

हँसने का

हँसने का एक सबब ,
रोने के हजार हुए ।
बनाने का एक जरिया ,
मिटाने के हजार हुए ।
एक को पकड़ले बाँकी
छोड़कर जीवन जी ,
बढ़ने का एक रास्ता ,
लौटने के हजार हुए ।।

"जय कुमार"23/07/15

भारत माँ का

भारत माँ का ,, मान तिरंगा
देशवाशियों कि शान तिरंगा
देश भक्तो में …… जोश भरे
मतवालों की ,,, जान तिरंगा

जोश का ,,,,, सन्देश तिरंगा
भारत का ,, परिवेश तिरंगा
हँसकर मौत से ,, गले मिले
शहीदों का ,,,,,,, भेष तिरंगा
"जय कुमार "22/07/15