Monday, 10 February 2014

जब जाम थे पास

जब जाम थे पास , पीने नहीं दिया मुझे ।
जिन्दगी थी मुझमें , जीने नहीं दिया मुझे ।।

करते रहे एकतरफा , भरोसा हम भी नादान
टूटने पर मुझको तूने , रोने नहीं दिया मुझे ।

किसकी गफलत थी वो , किसका था गुनाह 
आज तक अंधेरों में , जानने नहीँ दिया मुझे ।

आँखे खुली हुई मेरी , बस तेरे ही खातिर 
तेरी चाह ने अब तक , मरने नहीं दिया मुझे ।

जनाजा बनाया गया हूँ , दफनाने की खातिर
इस जमाने ने चैन से , सोने नहीं दिया मुझे ।

रुह यहीँ घूम रही , दीवानी बन चारो ओर
तेरी चाहत ने रब से , मिलने नहीँ दिया मुझे ।

"जय कुमार" ०८ /०२ /२०१४ 

हर दोस्त

हर दोस्त दोस्ती के काबिल नहीं होता ।
हर इंसान दिल मेँ दाखिल नहीं होता ।
किसी को दिल मेँ रखने की सजा है ये ,
मंजिल मिले ऐसा हर साहिल नहीं होता ।।

"जय कुमार" ०७ /०२ /२०१४ 

मेरी तन्हाई को ना जानने

मेरी तन्हाई को ना जानने वाले टूट जायेँगा ,
हिज्र की आग मेँ तू भी जब जल रहा होगा । 

तेरी आँखों मेँ भी पानी का समुंदर होगा ,
जब दिल में किसी का प्रेम पल रहा होगा ।

अजनबी को जानने की ना कर कौशिश तु ,
बिछड़ेगा दिल आँधियोँ से दहल रहा होगा ।

जब अपना मजहब बताने आये होगे तुम ,
मेरा मन तो इंसानियत मेँ उछल रहा होगा ।

मुझपर भूलने का योँ इल्जाम ना लगाओ ,
हम निभायेगेँ जब जमाना बदल रहा होगा ।

भरोसा रखो अपने दिल में आऊँगा जरुर ,
जब तेरे दिल मेँ अरमान मचल रहा होगा ।

"जय कुमार" ०४ /०२ /२०१४ 

शेर

कौन कहता है कि दोस्त दगा नहीँ देते ।
मेरी पींठ के निशां कुछ और बयां करते है . . .

"जय कुमार" 3/02/2014          

Sunday, 2 February 2014

ये कैँसा शहर

ये कैँसा शहर , हर तरफ कहर ही कहर . . .
रोशनी से भरी राहे , अंधेंरे मेँ जीते घर . . .

अँधे फैंशन की चकाचौंद में जीता इंसान ।
इस भागदौड़ में अपने आप से है अंजान ।
मुखोटा झूठ का पहनकर , दिल मेँ है डर . . .

जहरीली हवाओं में यहाँ दम घुटता है ।
आदमी का जीवन हर दिन पिटता है ।
अब खोजलो फिर , अपने गाँव की डगर . . ....

अंधी दौड़ आगें होने को आतुर हर कोई ।
मुख पर मुशकान झूठी लिए हर कोई ।
पड़ोसी को जानते नहीं , ये कैँसी नजर . . .

लूट पाट , मौत का ताँडव होता हर दिन ।
किसी मासूम की लुटती अस्मत हर दिन ।
इंसानियत को भुलाके , दरिंदे घूमते निडर . . .

इमारतों का कद उँचा आदमी का छोटा ।
दौलत की चाहत में हर कोई यहाँ रोता ।
एक इंसान का यहाँ , कैंसे हो अब बसर . . .

"जय कुमार"
30/01/2014

रेत से फिसलते रिस्ते

ये कैँसे बदलते रिस्ते
रेत से फिसलते रिस्ते
संवरते बिगड़ते रिस्ते
कभी यहाँ खिलते रिस्ते
कभी मुरझाते रिस्ते
प्रेम में मचलते रिस्ते
अहं मेँ अकड़ते रिस्ते
अपनो से सहमते रिस्ते
धोका पर रोते रिस्ते
जहर बीज बोते रिस्ते ...
हवस शिकार होते रिस्ते
अब भरोसा खोते रिस्ते
अंधी दौड़ बिखरते रिस्ते
जीत पर उछलते रिस्ते
हार पर अब जमते रिस्ते
जीवन राग गाते रिस्ते
मन की बात बताते रिस्ते
अपनो को बुलाते रिस्ते
दुनिया से मिलाते रिस्ते

"जय कुमार"
28/01/2014