मुल्क हो अगर गर्दिश में ,
चैन से सोना अच्छा नहीं ।
राहे हो जमीर के खिलाफ ,
मंजिल पाना अच्छा नहीं ।
कथनी करनी में हो अंतर ,
ऐसा इंसान सच्चा नहीं ।
जहाँ मजहब पे हो झगड़े ,
वह समाज अच्छा नहीं ।
जो दिल को ना दे सुकून ,
वह काम भी अच्छा नहीँ ।
जिस स्नेह में हो स्वार्थ ,
वह प्रेम भी सच्चा नहीं ।
जिसने देखे हो सुख दुख ,
वह आदमी कच्चा नहीं ।
भरोसा ना करो उसपर ,
जो जवान का पक्का नहीं ।
कैसे करोगे जिंदगी फतह ,
जब इरादा पक्का नहीँ ।
दिल तोड़कर किसी का ,
मलहम लगाना अच्छा नहीं।
भर चुके जिंदगी घावों को ,
फिर कुरेदना अच्छा नहीं ।
जो मुसीबत में साथ ना दे ,
वह दोस्त सच्चा नहीं ।
बेटा कंधो तक पुहुच गया ,
फिर तो वह बच्चा नहीं ।
उसके साथ ना चलो कभी ,
जो दिल का सच्चा नहीं ।
अपने ही अहं में जकड़कर ,
दूसरों जलना अच्छा नहीं ।
ना दे सके प्रेम किसी को ,
वह आदमी सच्चा नहीं ।
"जय कुमार" 22/04/14