Friday, 25 April 2014

जज्वात की नहीँ

हालात की मुफलिसी है ,
जज्वात की नहीँ ।
तन की कमजोरी है ,
ये मन की नहीं ।
जीत तेरी है स्यवं पर हो
नियंत्रण अगर ,
दिखावे की कमी है ,
भावों की नहीं ।

"जय कुमार" 25/04/14

क्यों तु अपने वादों

क्यों तु अपने वादों से मुकर गया ।
मैं टूटे आईने की तरह बिखर गया ।
हिज्र में जीना मजबूरी बन गई मेरी ,
मुझे छोड़ तु ना जाने किधर गया ।

"जय कुमार" 25/04/14

समय के साथ

समय के साथ बदलते रहिए ।
हर दिन पुष्प से खिलते रहिए ।
बदलाव ही जीवन का सत्य है ,
अपने आप ही बदलते रहिए ।

दिलोँ को सदा ही पढ़ते रहिए ।
कर्म सदा अपना करते रहिए ।
बिना चले मंजिल ना मिलती ,
कठोर राहो पर चलते रहिए ।

"जय कुमार" 25/04/14

जहाँ तक नजरे

जहाँ तक नजरे जाती ,
बस इंसा नजर आता है ।
जहाँ तक जमीं फैली ,
बस इंसा नजर आता है ।
चारो तरफ इंसा अपनी ,
बस विरासत चलाता है ।
धरती के आखरी तक ,
बस इंसा नजर आता है ।
इस इंसा की कहानी भी ,
बस इंसा ही सुनाता है ।
सदियों की विरासत को ,
बस इंसा ही चलाता है ।
पूर्वजो के अनुभवों से ये ,
नये मार्गो पर चलता है ।
चलना इसका कर्म एक ,
बस चलता ही जाता है ।

"जय कुभार" 25/04/14

जिंदगी राह देखते

जिंदगी राह देखते रहे हम जिसकी ,
वह बोलने आया राम राम सत्य है ।

"जय कुमार"

हमें आँखो से समुंदर

हमें आँखो से समुंदर बहाने पड़े क्योँ ?
हमें दिल के हौंसले लुटाने पड़े क्यों ?
अपना समझना गुनाह तो हो गया मुझसे ,
तुम्हे बनावटी फूल खिलाने पड़े क्यों ?

"जय कुमार" 25/04/14

कुदरत का कमाल

कुदरत का कमाल देखिए ।
दिन रात सुबह शाम देखिए ।
हर नियम अटल होता यहाँ ,
बर्षा ठंड गर्मी के रंग देखिए ।

चाँद सूर्य की रोशनी देखिए ।
तारो का टिमटिमाना देखिए ।
हर पिण्ड चलता अपनी गति से ,
नक्षत्रों का आना जाना देखिए ।

चिड़ियों का घोंसला देखिए ।
चीटियों का होंसला देखिए ।
हरेक राह सुनिश्चित यहाँ ,
धरा नभ का फासला देखिए ।

पर्वत पवन आग जल देखिए ।
नदी समुद्र का जल देखिए ।
सबको मौका दिया गया यहाँ ,
बाढ़ आँधियो का बल देखिए ।

बर्फ से ढ़के पर्वतों को देखिए ।
वनों से घिरे जंगलों को देखिए ।
सौंदर्य बिकरा पड़ा चारो ओर ,
ढ़के बाग फूल फलों से देखिए ।

फसलों से खेत नाचते देखिए ।
भौंरो को राग गुनगुनाते देखिए ।
आनंद ही आनंद भरा पड़ा ,
कभी फूलों को खिलते देखिए ।

"जय कुमार" 25/04/14

कृत्रिम नम्रता

कृत्रिम नम्रता में पड़कर हम,
सच्चे सहारे भी भूल गये ।
बड़ा मुश्किल है पहचाहना
लोगों की नियत मेरे मित्रो ,
नये जमाने की शुरुआत हुई,
रीति रिवाजो को भी भूल गये ।

"जय कुमार" 25/04/14

Thursday, 24 April 2014

जन्म से ना थे अंधे

जन्म से ना थे अंधे , अंधकार में रह कुछ दिखता ही नहीं ।
कुदरत ने बनाया इंसान ,समाज में रह इंसां रहता ही नहीं ।
बदल गये मायने यहाँ पर पवित्रता और शुध्दता के अब ,
खुदगर्जी हावी हुई ऐसी , विवेक तो अब पनपता ही नहीं ।

"जय कुमार" 24/04/14

चलकर , बड़कर

चलकर , बड़कर मेरा हाल तो जाना होता ।
दिल में पल रहे ख्वावों को पहचाना होता ।
सदियों से सिर्फ तुझे ही चाहते रहे है हम ,
बस मुहब्बत के जज्बातों को तो माना होता ।

"जय कुमार" 24/04/14

बात ना बने

बात ना बने तो कोई बात नहीं ।
राग ना बजे तो कोई बात नहीं ।
आत्मा के विश्वास को जगा लेना ,
मौज ना मिले तो कोई बात नहीं ।

"जय कुमार" 24/04/14





बेबजह यूँ ना बड़बड़ाया करो ।
दिल यूँ सबका ना दुखाया करो ।
कुछ अपने अंदर भी झाँको यार ,
दर्द यूँ देकर ना मुस्कराया करो ।

"जय कुमार" 23/04/14





अक्सर झूठ

अक्सर झूठ , इमारत उँची बना लेता है ।
अक्सर अँधेरा , रास्तोँ को छुपा देता है ।
नींव कमजोर हो तो टिकता नहीं कोई ,
किरण एक भोर की , तम को मिटा देता है ।

"जय कुमार" 24/04/14

फासले मेरे उसके

फासले मेरे उसके दरम्यान इतने बड़े ।
गलतफहमियों के राक्षस इतने खड़े ।
राहे मुहब्बत की खबर लो मेरे यार ,
शक के दलदल में क्यों हो इतने गड़े ।

राहे मुहब्बत की बातों को समझना होगा ।
गुरुर से भरे घड़ो को अब फोड़ना होगा ।
मगरुर होकर अहसास ना पाया किसी ने ,
पत्थरो के कठोर पर्वतों को पिघलना होगा ।

"जय कुमार" 24/04/14

मैं अज्ञानी

मैं अज्ञानी मेरे भगवन ,
हम तुम्हे मनाने आये है ।
मैं असहाय मेरे भगवन ,
हम सहारा पाने आये है ।
मेरे पास ना हीरे मोतीं
ना ही धन दौलत मेरी है ,
भक्ति श्रध्दा के भाव मेरे ,
हम तुम्हे चढ़ाने आये है ।

"जय कुमार" 24/04/13

मन हो आशंकित

मन हो आशंकित कदम बढ़ाओगे कैंसे ।
तन हो कमजोर मेहनत करोगे कैंसे ।
दृढ़ सरल सत्य पर अटल रहो यारो ,
धन हो मगरुर तो अमीर रहोगे कैंसे ।

"जय कुमार" 24/04/14

प्रकृति ने सबको

प्रकृति ने सबको ही सब दिया ।
हमसे उसने कुछ भी ना लिया ।
सब जीवन बराबर है उसको ,
प्रकृति ने जीने हक सबको दिया ।

"जय कुमार" 23/04/14

हसरतें लबों पर आने

हसरतें लबों पर आने से पहले ही रुट गईं ।
कस्तियाँ साहिल पर आने से पहले डूब गईं ।
कहर बरपाया घोंसलो पर ऐसे आँधियों ने ,
चूजों की चहक सुनने से पहले डोर टूट गईं ।

"जय कुमार" 23/04/14

इंसां ना होता

इंसां ना होता तो कोई शहर ना होता ।
इंसां ना होता तो कोई असर ना होता ।
इंसां की सल्तनत है चारों ओर यारो ,
इंसां ना होता तो कोई कहर ना होता ।

जय कुमार 23/04/14

दीवाना बन घूमता

दीवाना बन घूमता हूँ तेरे शहर में ।
सहम जाता हूँ मैं अब तेरे कहर में ।
मुहब्बत की कोई गुनाह ना किया ,
टूटता जा रहा हूँ अब हर पहर में ।

"जय कुमार" 23/04/14

तेरे शहर के

तेरे शहर के परिंद्रे भी ,
पहचान गये मुझे ।
तेरे शहर के रास्ते भी ,
पहचान गये मुझे ।
बस तू ही ना जाने क्यों
अनजान बनता है ,
तेरे शहर के अनजां भी ,
पहचान गये मुझे ।

"जय कुमार" 23/04/14

कुछ वयान तुम

कुछ वयान तुम करो कुछ हम करें ।
मिलकर इस जहां में बसर हम करें ।

जहर पिये जामें जिंदगी के हमने ।
बिखरकर क्या पाया अब तलक हमने ।
अब राहें एक करले हम दोनों यार ,
कुछ बरम तुम करो कुछ हम करें ।

महफिलें सजी रही जमाने में हम तन्हा ।
मिलते रहे मौसम एक दूजे से हम तन्हा ।
हम दोनों मुहब्बत का घर बनायेँ ,
कुछ करम तुम करो कुछ हम करें ।

"जय कुमार " 23/04/14

आयेगा खुशहाल जमाना

कल की बात जो मेरे साथ था ।
मेरे दर्दे गम का उसे अहसास था ।
सामने आकर भी अनजान बनता ।
एक दिन जो मेरा हमराज था ।

जय कुमार 23/04/14




आयेगा खुशहाल जमाना सुनता आया हूँ ।
आयेगा इंसान का जमाना सुनता आया हूँ ।
सदियों से बस सुना और सुनाया है हमने ,
टूटेंगें मजहबी मतभेद बस सुनता आया हूँ ।

जय कुमार 23/04/14


मुझे नम आँखो

मुझे नम आँखो से रुखसत ना करो ।
मुझे गम , दर्द में रुखसत ना करो ।
खुशी से जाने दो मुझे मेरे यारो ,
प्यार में उलझाकर रुखसत ना करो ।

जय कुमार 23/04/14

बेटे रहते

बेटे रहते महलों में ,
माँ वृध्दाश्रम में रोती है ।
हर दिन वह अपना आँचल ,
अपने आँसुओं से धोती है ।
कहाँ गये तुम कृष्ण कन्हैया ,
रोती आज तुम्हारी मैया ।
जरा वृन्द्रावन आके देखो ,
देवकी दशोदा कैंसी रोती है
बेटे रहते महलों मेँ ,
माँ वृध्दाश्रम में रोती है ।

"जय कुमार"

मुल्क हो

मुल्क हो अगर गर्दिश में ,
चैन से सोना अच्छा नहीं ।
राहे हो जमीर के खिलाफ ,
मंजिल पाना अच्छा नहीं ।

कथनी करनी में हो अंतर ,
ऐसा इंसान सच्चा नहीं ।
जहाँ मजहब पे हो झगड़े ,
वह समाज अच्छा नहीं ।

जो दिल को ना दे सुकून ,
वह काम भी अच्छा नहीँ ।
जिस स्नेह में हो स्वार्थ ,
वह प्रेम भी सच्चा नहीं ।

जिसने देखे हो सुख दुख ,
वह आदमी कच्चा नहीं ।
भरोसा ना करो उसपर ,
जो जवान का पक्का नहीं ।

कैसे करोगे जिंदगी फतह ,
जब इरादा पक्का नहीँ ।
दिल तोड़कर किसी का ,
मलहम लगाना अच्छा नहीं।

भर चुके जिंदगी घावों को ,
फिर कुरेदना अच्छा नहीं ।
जो मुसीबत में साथ ना दे ,
वह दोस्त सच्चा नहीं ।

बेटा कंधो तक पुहुच गया ,
फिर तो वह बच्चा नहीं ।
उसके साथ ना चलो कभी ,
जो दिल का सच्चा नहीं ।

अपने ही अहं में जकड़कर ,
दूसरों जलना अच्छा नहीं ।
ना दे सके प्रेम किसी को ,
वह आदमी सच्चा नहीं ।


"जय कुमार" 22/04/14

अतीत से लें सीख

अतीत से लें सीख , वर्तमान को सँवार लें ।
वर्तमान में ऐसा करें भविष्य को सँवार ले ।
सिर्फ वर्तमान ही हमारा होता मेरे मित्रो ,
अनुभवों से लें सीख , जीवन को सँवार लें ।

"जय कुमार" 21/04/14

Monday, 21 April 2014

चार शहर वाले

चार शहर वाले होगें चार घर वाले होगें ।
मंजिल पर पुँहुचाने चार ले जाने वाले होगें ।
शमशान तेरा ठिकाना होगा एक दिन यार ,
बस चार खाने वाले होंगे चार रोने वाले होगें ।

जय कुमार 22/04/14

कर गुजरते खास

कर गुजरते खास , जो तुम करीब होते ।
बना लेते इतिहास , जो तुम करीब होते ।
बस तेरी यादें जिनके सहारे जिंदा हैं ,
पा लेते हम मुकाम , जो तुम करीब होते ।

"जय कुमार" 21/04/14

इंसान ने इंसान

इंसान ने इंसान से बल लिया ।
इंसान ने इंसान से कल लिया ।
फिर फितरत देखो इंसान की ,
इंसान ने इंसान को छल लिया ।

जय कुमार 21/04/14

जिस दिन से यार

जिस दिन से यार तुम रुठ गये ,
मैंने हँसना छोड़ दिया ।
जिस दिन से दिल मेरा टूट गया ,
मैंने जीना छोड़ दिया ।

बहारे आतीं मौसम बदलता है ।
ख्वावो का टूटा अरमां पलता है ।
जिस दिन से मेरा रब रुठ गया ,
मैंने दर पर जाना छोड़ दिया ।

होती रही हँसाई मेरी चारो ओर ।
अंधेरा घनेरा ना दिखी मुझे भोर ।
जिस दिन से शहर की भीड़ मेँ गुम हुआ ,
मैंने घर से निकलना छोड़ दिया ।

हसरतों का दर्द जाता कभी नहीं ।
उनका नाम लबों पर आता कभी नहीं ।
जिस दिन से जाम से यारी हुई ,
मैंने महफिल में जाना छोड़ दिया ।

नम आँखों की किसी ने ना सुनी ।
झुकी पलकों की भी एक ना सुनी ।
जिस दिन से खाये नजरों के धोके ,
आँखों ने रोना छोड़ दिया ।

"जय कुमार" 21/04/14

यूँ ना चलो बन ठन के

यूँ ना चलो बन ठन के , जमाना खराब है ।
बहक जायेंगे मँजनु , ये हुस्ने शबाब है ।

शहर नये दौर का रंगीनिया चड़ी है खूब ,
हुस्न से जाम का मिलन , होता खराब है ।

तेरी नजरों की कटारों से कयामत आयी है ,
लुट गये जान से जमाने , ये हुस्ने शबाब है ।

खैर बस उन्ही की जो नजरें झुका ले तुझसे ,
तेरे साथ की चाहत , होता अंजाम खराब है ।

मयखाने गया मैं कोई भेद नजर ना आया ,
'जय' सबका मजहब सिर्फ , जामे शराब है ।

"जय कुमार" 21/04/14

दूसरों को काँटे बिछाये ,

दूसरों को काँटे बिछाये ,
फूलों की आशा कैंसी ।
दूसरों को कड़वा कहते ,
तुमें मृदुल भाषा कैंसी ।
करते हो व्यवहार वही
लौटकर आता है यारो ,
दूसरों को जहर दिया ,
अमृत की आशा कैंसी ।

जड़ें खोदते रहे हो सदा ,
फलों की आशा कैंसी ।
आग उगलते रहे हो सदा ,
नीर की आशा कैंसी ।
जो किया वही मिलता
बबूल पर काँटे खिलते ,
दूसरों से जलते रहे सदा ,
प्रेम की आशा कैंसी । ।

दूसरों के दुख पर हँसे ,
सहानुभूति की आशा कैंसी ।
राह में पत्थर बिछाये ,
अब पुष्पों की आशा कैंसी ।
उम्मीद वही करो जो
हमने किया किसी के साथ ,
भूखे को भोजन ना दिया ,
अब रहम की आशा कैंसी ।

"जय कुमार" 20/04/14

खुद अपने आपको

खुद अपने आपको देखलें तो क्या कहने ।
स्यवं से शुरुआत करलें तो क्या कहने ।
कोई रहनुमा के भरोसे ना रहो यारो ,
खुद ही गर्दिशो से लड़लें तो क्या कहने ।

पैरो से पार करें समुंदर तो क्या कहने ।
हाथों से खोद दें पर्वत तो क्या कहने ।
अपनी मेहनत पर भरोसा रखो मित्रो ,
आँखों से देखे नेकी वदी तो क्या कहने ।

अपने अज्ञान से भिड़लें तो क्या कहने ।
अपने प्रकाश से मिललें तो क्या कहने ।
हमारे में ही समाया है संसार सारा ,
असली रुप से मिल लें तो क्या कहना ।

जय कुमार 20/04/14

नजरिया बदल गया

नजरिया बदल गया जाने ,
क्या क्या देखते हो तुम ।
क्या कुछ बचा नही अब
स्वार्थ की तराजु के लिए ,
मुहब्बत में भी क्या अब ,
नफा नुकसान देखते हो तुम ।

जय कुमार 20/04/14

तेरा वो आँख चुराना

तेरा वो आँख चुराना , तेरा वो मुस्कराना ।
तेरा वो रुठना , तेरा वो मुझको मनाना ।
याद रहा बस अब एक ही चेहरा मुझको ,
तेरा वो झगड़के , फिर वो गले लग जाना ।

जय कुमार 20/04/14

मयखाने में गया

मयखाने में गया कोई भेद ना दिखा ,
जय सबका मजहब जामे शराब था ।

जय कुमार 20/04/14

वक्त वक्त की बात

वक्त वक्त की बात है बेवक्त ना किया करो ।
पीने पिलाने की बात है सरेआम ना किया करो ।
मयखाने में आ ही गये हो जब मेरे दोस्तो ,
जाम जाम की बात है परहेज ना किया करो ।

जय कुमार 19/04/14

ये जमाने

ये जमाने तेरी रवायत समझ ना पाया ।
चलने वालों के पैरों में फफोले दिये है ,
बैठने वालों ने ही क्यों आराम पाया ।
प्यार फूल मुरझाये नफरत के काँटे उगे ,
जख्मों के साये में मुहब्बत को पाया ।

जय कुमार 19/04/14

चंद रुपयों में

चंद रुपयों में ईमान बिकता देखा ।
हवस में रिश्तों को लुटता देखा ।
किस डगर पर चले हो सभ्य इंसां,
अंधी दौड़ में इंसा को घिसता देखा ।

जय कुमार 19/04/14

मौसम जब सुहाना

मौसम जब सुहाना आता है ।
मेरा मन भी मचल जाता है ।
दीदार ना हुआ अरसे से यार ,
तेरा चेहरा ही मुझे भाता है ।



जय कुमार 19/04/14

मेला लगा संसार में

मेला लगा संसार में , पंछी का बसेरा कब तक ।
आना जाना लगा जमाने में , तेरा डेरा कब तक ।
चंद साँसे माँगकर लाये थे इस जहान में हम ,
चलने की तैयारी में , साँसों का घेरा कब तक ।

जय कुमार 19/04/14

अब आम के आम

अब आम के आम गुठलियों के दाम चाहिए ।
बिना काम के अब लोगों को नाम चाहिए ।
ईमान की बात ही बेमानी है अब दोस्तो ,
मेहनत किसी की किसी को ईनाम चाहिए ।

"जय कुमार" 19/04/14

हम कुछ नहीं

हम कुछ नहीं कहते , वो सब जान जाते है ।
वो कुछ नहीं सुनते , हम सब सुना जाते है ।
ह्रदय के अहसास आँखों में बसते मेरे यारो ,
हम कुछ नही दिखाते , वो सब देख जाते है ।

"जय कुमार" 19/04/14

Friday, 18 April 2014

जब मैं चला जाऊँगा

जब मैं चला जाऊँगा तुम जिक्र ना करना ।
तुम चले जाओ तो कोई फिक्र ना करना ।
आना जाना यहाँ तो लगा जमाने से यारो ,
सब चले जायेंगे फिर भी फिक्र ना करना ।

जय कुमार 18/04/14

नसीहत और नियत

नसीहत और नियत के अंतर को भरना चाहिए ।
अपने आपके गुणों और दुर्गुणो से उभरना चाहिए ।
पाक नापाक में अंतर छोटा असर बड़ा होता है ,
अपने ही तन मन की भाषा को समझना चाहिए ।

जय कुमार 18/04/14

महिल मिट्रटी

महिल मिट्रटी का सही , रहने वालों में प्यार हो ।
प्यार का इजहार ना सही , पर यार का इंतजार हो ।
हीरे और काँच में अंतर अधिक कहाँ होता यारो ,
इंसा मुफलिसी में सही , मगर दिल जमीरदार हो ।

"जय कुमार" 18/04/14

किसी का ऐतवार

किसी का ऐतवार हम भी कर लेते शायद ।
किसी से मुहब्बत हम भी कर लेते शायद ।
हालात जमाने के देख रोक लिया हमने खुदको ,
वरना किसी से जख्म हम भी पा लेते शायद ।

"जय कुमार" 18/04/14

लोग चेहरे

लोग चेहरे पर चेहरा लगाने लगे ।
लोग आँखो से काजल चुराने लगे ।
भरोसा किस पर करें अब यारो ,
कागज के फूल बाग महकाने लगे ।

जय कुमार 18/04/14

कोमल मन

कोमल मन की बात कही ,
उनका मन मानत कहाँ है ।
दिल के महलों में बैठी हो ,
यह सच वो जानत कहाँ है ।
सबका मन मलिन हुआ का
यही बिठाया होगा ह्रदय में,
दिल की बातो को लबो से ,
तब तो वो काहत कहाँ है ।

"जय कुमार" 18/04/14

सियासती जमीं

सियासती जमीं पर बीज फूल वोये थे ,
जय वो भी बबूल बनकर ही निकले ।

जय कुमार 18/04/14

दिलों को

दिलों को ठोकर देकर वो ,
पत्थर के रब पूजने चले ।
मन मूरत को तोड़कर वो ,
रब की सूरत देखने चले ।

"जय कुमार" 18/04/14

आसमां को देख

आसमां को देख धरती के हाल जाने हैं तुमने ।
चेहरों को देख दिलों के हाल जाने हैं तुमने ।
कुछ वयां करने की जरुरत नहीं मेरे यारों ,
दिल के रब छोड़ पत्थर के रब माने है तुमने ।

"जय कुमार" 18/04/14

मेरा अक्स

मेरा अक्स ही अब डरा जाता है मुझको
गहरे घावों पर नमकीन पानी की बूँदें
नजरों का तीखापन सहमा जाता है मुझको
मेरे कोमल मन को पढ़ना ना जानते तुम
पँखुड़ियों को मरोड़ना डरा जाता है मुझको
साँसे भारी हो गईं खौफनाक दर्द के साये में
मेरी उम्मीदों के जुगनु रुला जाते है मुझको
आसमान पर बिजलियाँ धरती पर कहर
भरम टूटा हुआ अब सहमा जाता है मुझको
किसी वक्त चहककर चारो ओर चलती रही
टूटे रिश्तों के धागे अब हरा जाते है मुझको
कस्ती की पतवार रही थी सदियों में
कस्ती के छेद अब डुबो ले जाते है मुझको
परिंदो की भाँति स्वतंत्र रहने का ख्याल
शिकारियों के जाल फँसा ले जाते है मुझको
मौसमी फूल की तरह खिलना था जिसे
आग के दरिया अब बहा ले जाते है मुझको
ख्लाल बदल गये जिंदगी के शायद मेरे
भावनाओं के समुंदर डुबा ले जाते है मुझको

"जय कुमार" 18/04/14

मेला लगा जिंदगी

मेला लगा जिंदगी का सुख दुख दोनो मिले ।
फूलों के बाग में कोमलता काँटे दोनो मिले ।
जीवन नर्म और कठोर का मेल मेरे दोस्तो ,
सिकंदर को भी यहाँ हार जीत दोनों मिले ।

"जय कुमार" 13/04/14

सत्य अहिँसा

सत्य अहिँसा के ज्योति प्रकाश से ,
जग को प्रकाशवान किया ।
व्रत संयम ब्रम्यचर्य की शक्ति से ,
संसार को ऊर्जावान किया ।
उन वर्धमान जिनेंद्र वीर अतिवीर ,
महावीर के श्री चरणो में ,
जय सादर शीश झुकाता रोज ,
जिनने मोक्ष मार्ग पर गमन किया ।

"जय कुमार" 13/04/14

एक दिन का साथ

एक दिन का साथ सदियोँ याद रहा मुझको ।
मगर वादा तो सदियों साथ निभाने का था ।
मौत के बाद भी आँखो की चमक कम ना थी ,
शायद उसका वादा तो एक दिन आने का था ।

"जय कुमार" 12/04/14

जब ह्रदय

जब ह्रदय की धमनियाँ ही साथ ना दे तो क्या करेँ ।
जब रक्त के कण जहर बन जायेँ तो फिर क्या करें ।
झूठे वहम् में जीते और जी रहे जीना है हमे दोस्तो ,
जब नब्ज ही देह का साथ छोड़ दे तो फिर क्या करेँ ।

"जय कुमार" 12/04/14

Friday, 11 April 2014

बात है प्रभात्

बात है प्रभात् की ये अंधेरी रात है ।
सौगात है सत्य की ये असत्य बतात है ।
कर्म है धर्म का ये अधर्म होत जात है ।
जंग है जीत की ये हार होत जात है ।
काम है परमात का ये दानव बतात है ।
राम है आत्मा का ये रावण दिखात है ।

जय कुमार 11/04/14

वाह रे वाह नेता

वाह रे वाह नेता लीला बड़ी तेरी निराली है ।
गुड़ से परहेज तेरा गुलगुलों से तेरी यारी है ।
हाथ जोड़कर के खड़े आज जनता के सामने ,
रोड़ पर चल संसद कुर्सी की तेरी तैयारी है ।।

जय कुमार 11/04/14

मन मोहन मन

मन मोहन मन में बसी मूरत तुमारी है ।
बाँसुरी बजे बागन बस बात तुमारी है ।
मोरे मोहन माखन वारे रास रचावन वारे ,
भाव भक्ति भक्त मैं दौलत ना हमारी है ।

जय कुमार 11/04/14

हसरते दिल

हसरते दिल जब मचल जायें ,
दिल खूब रोता है ।
दिल की बातें लबों पर आयें ,
तमाशा खूब होता है ।
कस्तियाँ भँवर में फँस जायेँ ,
नाविक खूब रोता है ।
फसाना दिल गम जो सुनायेँ ,
दीवाना खूब रोता है
मुफलिसी में जो मुस्कराये ,
इंसां खूब होता है ।
रोते चेहरे को जो हँसायें ,
प्यार खूब होता है ।
इंसान को इंसान जो बनाये ,
मजहब खूब होता है ।
खुशियाँ उनकी देख गम भुलायें ,
आशिक खूब होता है ।

जय कुमार 11/04/14

ना हिँदु बनाया

ना हिँदु बनाया था उसने ,
ना मुसलमान बनाया था ।
इस अनुपम सृष्टि पर ,
बेसकीमती इंसान बनाया था ।
उसको भी बाँट दिया इंसां ने
खुदगर्जी में जकड़कर ,
क्या बन गया यह इंसान ,
उसने इसे क्या बनाया था ।

"जय कुमार" 11/04/14

मेरी आँखे

मेरी आँखे बरसती रही ,
वो अपना राग सुनाते रहे ।
मेरी जिंदगी तड़पती रही ,
वो आग यूँ ही लगाते रहे ।
मौका कहाँ मिला मुझको
अपनी बात रखने का यारो ,
मेरी हर पल हार होती रही,
वो जीते जश्न मनाते रहे ।

"जय कुमार" 11/04/14

दर्द जुदाई

दर्द जुदाई का अब सहा नहीँ जाता ।
तेरे बिन अब प्रिय रहा नहीं जाता ।
एक लम्हा सदियों सा गुजरता है ,
इंतजार और अब सहा नहीं जाता ।

"जय कुमार" 11/04/14

राजे मुहब्बत

राजे मुहब्बत वयां करने जो चला ,
जय सिर्फ अश्कों का दरिया निकला ।

"जय कुमार" 10/04/14

कलिका कोमल कामिनी

कलिका कोमल कामिनी कर ले श्रृँगार ।
कँगण कर्णफूल से कर कानन ले सँवार ।
ठुमक चलन से तेरी घायल हुआ संसार ,
मन मोहनी मन बसी नयनोँ की ले कटार ।।

जय कुमार 10/04/14

कल कौन आया

कल कौन आया कहाँ से आया ।
कल कौन लाया किसको लाया ।
पहेली जिंदगी की है मेरे यारों ,
कल कौन पाया किसने पाया ।।

"जय कुमार" 10/04/14

वो सुनते रहे

वो सुनते रहे , हम बड़बड़ाते रहे ।
राह में लोग , मजाक उड़ाते रहे ।
कुछ खुमार ही अलग था वो यारो ,
वो हँसते रहे , हम घायल होते रहे ।।

जय कुमार 19/04/14

Wednesday, 9 April 2014

मतदान शुरू हुआ

मतदान शुरू हुआ , अब  सब वोट दीजिये।
विवेक पर उतरे सही , उसी को चुन लीजिये।
लोकतंत्र का महापर्व , बड़ के भाग लीजिये।
देश के हित हेतु अपना , एक वोट दीजिये।
उज्जवल भविष्य के लिए,योगदान दीजिये।
प्रजातन्त्र कि रक्षा की , अब सपथ लीजिये।

"जय कुमार " ०९ /०४ /१४

 

मगरूर जमाना

मगरूर जमाना मुझे हरा गया। 
विश्वास के मोती भी चुरा गया।
मेंने  गंगा कि तरह रहना चाहा ,
लेकिन उसमे भी मल भरा गया।

जय कुमार


कभी बुरे वक्त

कभी बुरे वक्त के हाल पर रोये है।
कभी जिंदगी के बदहाल पर रोये है।
मेरी राहों ने मुझे कब रोका था यारो ,
हम तो अपनी ही चाल  पर रोये है।

जय कुमार

Tuesday, 8 April 2014

जय कुमार

कौन कहता कि मेरी नैया पार नही होती ,
कभी ह्रदय से राम नाम तो लिया होता ।

जय कुमार
 

अब राम तुमारे देश में

मर्यादायें सब बिखर रहीं ,
अब राम तुमारे देश में।
मेघ कुम्भकरण रावण बैठे ,
आज राम के भेष में।

मंदिरो में सिमित हो गए।
शास्त्रो में सिमित रह गए।
नाम राम का लेते रहते सब ,
आज स्वार्थ उपदेश में।

करके काले काम उपासक।
लेते हर दम नाम उपासक।
काली करतूतो पर अपनी ,
राम चुनरिया तेरे देश में।

सबरी रोती सीता भी रोती।
गीता रोती उर्मिला भी रोती।
कोई बचावन वाला नहीं है ,
अब राम तुमारे देश में।

माँ कि ममता प्रेम पिता का।
धूमिल प्रेम  बहिन भाई का।  
कौसल्या पर कहर डा रहे ,
अब राम तुमारे देश में।
 
नीति राजनीति ख़त्म हो रही।
स्वार्थ नीति कि शुरुवात हो रही।
सत्य असत्य का बोध नहीं ,
अब राम तुमारे देश में।

मानव दानवता कि ओर चला।
पूरब  पश्चिम कि ओर  चला।
सच्चाई अच्छाई आँसू बहाती ,
अब राम तुमारे देश में।

"जय कुमार" ०८ /०४ /१४

Monday, 7 April 2014

मौन की भाषा

मौन की भाषा कभी , मगरुर हो नहीं सकती ।
दृढ़ संकल्प हो तो कभी, हार हो नहीं सकती ।
जीतने के लिए हराना , जरुरी नहीं दोस्तो ,
हराकर सच्ची कभी , जीत हो नहीं सकती ।

"जय कुमार" 08/04/14

ये खुदगर्ज जमाना

ये खुदगर्ज जमाना क्या याद करेगा मुझको ।
ये मगरुर जमाना क्या याद रखेगा मुझको ।
मैं तो बस बंजारा हूँ इस जमाने में यारो ,
ये गलियाँ ये शहर क्या याद रखेगा मुझको ।

"जय कुमार" 08/04/14

उनको याद

उनको याद कर हम सदा रोये है ।
वो हमें भूलकर रात भर सोये है ।
जानते हैं उनने हमें भुला दिया ,
जाने फिर भी क्यों यादो में खोये है ।

"जय कुमार" 08/04/14

जब हसरतें जो

जब हसरतें जो मचलती हैं ,
तुम याद आते हो ।
जब चूड़ी जो खनकती हैं ,
तुम याद आते हो ।
जब मौसम जो बदलता हैं ,
तुम याद आते हौ ।
जब सर्दहवायेँ चलती हैं ,
तुम याद आते हो ।
जब साँवन जो बरषता हैं ,
तुम याद आते हो ।
जब बसंत जो खिलता हैं ,
तुम याद आते हो ।
कोयल गीत जो सुनाती हैं ,
तुम याद आते हो ।
जब मनमीत जो मिलता हैं ,
तुम याद आते हो ।
जब गुलाब जो खिलता हैं ,
तुम याद आते हो ।
जब रातें करवटे बदलती हैं ,
तुम याद आते हो ।
जब हसरतें जो मचलती हैं ,
तुम याद आते हो ।
जब चूड़ी जो खनकती हैं ,
तुम याद आते हो ।
तुम याद आते हो ।
तुम याद आते हो ।

"जय कुमार" 07/04/14

दर्द में धँस ना जाना

दर्द में धँस ना जाना ।
खुशी में उड़ ना जाना ।
मिले जो राही राह में ,
उसी में रम ना जाना ।

काल से डर ना जाना ।
मौत से मर ना जाना ।
यहाँ लगा आना जाना ,
जहाँ में खो ना जाना ।

आज से भाग ना जाना ।
कल से इतरा ना जाना ।
प्रयास कर चलने का ,
भविष्य में खो ना जाना ।

भावों में बह ना जाना ।
भीड़ों मेँ रह ना जाना ।
हिम्मत को अजमा लेना ,
फरेब में फँस ना जाना ।

फूलों मे बस ना जाना ।
काँटों में कट ना जाना ।
राहे अनजानी हैं यहाँ ,
भ्रम मेँ चकरा ना जाना ।

"जय कुमार" 05/04/14

वो सब वादे

प्यार वफा के वो सब वादे ,
बिकते आज बाजारों में ।
रोज नये इस्तिहार निकलते ,
मेरे शहर के अखवारों में ।
खोकर पाता जो दिल मेरा ,
यकीन करता बहारों में ।
स्वार्थ बनता जब मिलन है ,
फिरता फिर आवारों में ।
कल तक साथ रहा जो मेरे ,
मिलता आज नजारों में ।
दीवाना में होकर जो भटका,
नाम दे दिया बेगारों में ।
प्यार वफा के वो सब वादे ,
बिकते आज बाजारों में ।
रोज नये इस्तिहार निकलते ,
मेरे शहर के अखवारों में ।।

"जय कुमार" 05/04/14

राई का पहाड़

राई का पहाड़ बनते देखा ।
विद्धानों को उवलते देखा ।
ईमान को हाथ जोड़ते देखा ।
वेईमान को ऐंड़ते देखा ।

हंस को दाना चुनते देखा ।
अमीर को तंगहाल होते देखा ।
अरमानों को मचलते देखा ।
ख्वावो को कुचलते देखा ।

आँसुओं में प्यार पलते देखा ।
किसी की कमी खलते देखा ।
आज में भी कल आते देखा ।
कल में भी आज जाते देखा ।

मजबूरी में इंसां बिकते देखा ।
गरीब को नीँद सोते देखा ।
धनी चिँता में जागते देखा ।
यहाँ जहर बीज बोते देखा ।

मुहब्बत को सदा रोते देखा
खून के रिश्तों को टूटते देखा ।
यहाँ भरोसा को लुटते देखा ।
लालच को हाथ मलते देखा ।

मौत के बाद मौत होते देखा ।
बुढ़ापे में बचपन खेलते देखा ।
जवानी मेँ मगरुर होते देखा ।
अहं की आग में डूबते देखा ।

नमन उगते को होते देखा ।
शेर को शियार होते देखा ।
प्यार को धुत्तकारते देखा ।
दिल मंदिर स्वीकारते देखा ।

तारो को रोज निहारते देखा ।
सूरज को भी डूबते देखा ।
आयु की साँझ आते देखा ।
सिकंदर को भी जाते देखा ।

यीशु को दोबारा आते देखा ।
गूँगे को गीत गाते देखा ।
पँगु को पहाड़ चढ़ते देखा ।
अंधे को सौंदर्य निहारते देखा ।

शूरवीर को रण छोड़ते देखा ।
महावीर को देह त्यागते देखा ।

"जय कुमार" 05/04/14

सियासत की चालें

सियासत की चालें तो अभी जोरों पर है ।
कीचड़ उछालने का खेल अभी जोरों पर है ।
गड़े मुर्दा जिंदा होकर दहाड़ने लगे दोस्तो ,
मौका परस्ती का मेल अभी जोरों पर है ।

"जय कुमार" 04/04/14

चल चला चल

चल चला चल , अपनी राहें स्वयं खोज ।
चल चला चल , ना बन किसी पर बोझ ।
कल की छोड़ कल पर आज से प्यार कर ,
चल चला चल , अपने आपको खुद खोज ।

"जय कुमार" 04/04/14

चले थे चाँद

चले थे चाँद की चाँदनी पाने , चाँद के उसपार ।
चले थे चाँद की चमक चुराने , चाँद के उसपार ।
हसरते दिल पर पाबंदी ना कर सका यहाँ कोई ,
चले थे चाँद की चौखट पर , चाँद के उसपार ।

"जय कुमार" 04/04/14

मुहब्बत तो ना

मुहब्बत तो ना हुई , पर देखा है मंजनुओँ को ।
अहसासे दिल ना हुई , पर पाया है अनुभवों को ।
यह जब सर पर चड़कर बोलती है मेरे दोस्तो ,
तब ये जिंदगी के , बहा ले जाती है घरोंदों को ।

जय कुमार 04/04/14

कल फिर कमाल

कल फिर कमाल हो गया ।
मेरा दिल कहीं खो गया ।

ख्वाबो में बसा था हमारे ,
उसका ही दीदार हो गया ।

कहीँ पर रब का घर भी है
हमें अब यकीन हो गया ।

शिद्दत से चाहा हमने जिसे ,
मुझसे अब वो रुबरु हो गया ।

मगरुर के घर में यारो कल ,
पैदा मुहब्बते नूर हो गया ।

देखकर मुफलिसी उसकी ,
अमीर का दिल मोम हो गया ।

दीवाना बन घूँमा बाजारों में ,
जालिम को भी प्यार हो गया ।

उसके हुस्न का जादु तो देखो ,
पानी भी शराब हो गया ।

जब चले राहों मेँ ठुमकके वो ,
लोगों का दिल बेकार हो गया ।

जय कुछ तो नया लिख अब ,
जमाना अब जानकार हो गया ।

"जय कुमार" 04/04/14

Friday, 4 April 2014

हम से कै रये नेता

हम से  कै रये नेता , वोट हमई कों दइओ।
और कछु नई हमरो , निसं याद कर लिओ।
हम तो कछु नईयाँ  बस सेवक हे तुमइरे ,
कछु होय प्राब्लम तो ,  हमई हो बतइओ ।।

जल्दी से हमने सोई , कछु उनसे से कै दई ।
लाचारी लोगन कि हमने , सबरी बता दई।
बड़े नोने से बोले भैया  , डिंगो डिंगो होके ,
उनने पाँच बरषन की , हमें आशा थमा दई।

"जय कुमार " ४/४/१४

मजहब की बात कर यूँ

मजहब की बात कर यूँ , वोट ना मँगाया करो ।
अपनी खोट छुपाकर यूँ , ना बढ़ बढ़ाया करो ।
कुछ निर्णय हमें भी ले लेने दो सियासी बंदुओ ,
अपने आपको यूँ , पाक साफ ना बताया करो । ।

जय कुमार 04/04/2014

आदमी

आदमी को आदमी जानता कहाँ है ।
आदमी को आदमी पहचानता कहाँ है ।
मुझे इंसां बनाया किस काम का हूँ ,
आदमी को आदमी मानता कहाँ है ।.

"जय कुमार" 04/04/2014

बिक गया ईमान

बिक गया ईमान , कागज की चमक देख ।
बहक गया मन , चूड़ियों की खनक देख ।
हिस्से हो गये माँ के अपने बेटों के बीच मेँ ,
बँट गये भाई , अब दौलत की दमक देख ।

"जय कुमार" 04/04/2014

तार जुड़ते जो

तार जुड़ते जो दिलों के तो , कोई नयी बात बनती ।
बिलखते बच्चे जो हँसते तो , कोई नयी बात बनती ।
जमाना चला जा रहा जिन अंधकारमय रास्तोँ पर ,
राहें जो बदलती तो फिर , कोई नयी बात बनती । ।

"जय कुमार" 04/04/2014

कमल की तरह

कमल की तरह खिला चेहरा , आज मुरझाया क्यों है ।
तु मेरे करीब रहकर भी मुझसे , अब पराया क्यों है ।
टूटता कभी भी नहीं , यह जज्बात का रिश्ता ,
अपने दिल में बिठाकर मुझे , आज भुलाया क्यों है ।

"जय कुमार" 04/04/14

हंगामा भाई हंगामा

हंगामा भाई हंगामा , चौदह का है हंगामा ।
नमो जपो हाथ हटो , संसद का है हंगामा ।
हाथी बैठ चिंगाड़ रहा अब साईकिल पर ,
लालटेन का तेल खत्म , झाड़ु का है हंगामा ।

जय कुमार 03/04/2014

मन तन्हा

मन तन्हा तन तन्हा , जीवन का हर पल तन्हा ।
कल तन्हा कल तन्हा , आज का हर पल तन्हा ।
इस तन्हाई के आलम ने जीना हमको सिखाया है ,
तुम तन्हा वो भी तन्हा , जय तेरा हर पल तन्हा ।।

"जय कुमार " 03/04/2014

कब से ठिकाना खोज रहा

कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैं अपने आप का ।
कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैँ अपने आज का ।
कल गया कल फिर आया मैंने कुछ भी ना पाया,
कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैं अपने राज का ।

कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैं अपने जाल का ।
कब से ठिकाना खोज रहा हूँ, मैं अपने पाल का ।
आज आया कल जाऊँगा यहाँ से कुछ ना पाऊँगा,
कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैँ अपने काल का ।

कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैं अपने नाम का ।
कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैं अपने काम का ।
क्यों आया कैंसे आया , उत्तर आज तक ना पाया ,
कब से ठिकाना खोज रहा हूँ , मैं अपने राम का ।

"जय कुमार" 03/04/2014

राजनीति के घोड़े

राजनीति के घोड़े दोड़े , अब चारों ओर ।
टापो की आवाजोँ से , मचा रहे अब शोर ।
वादों के भोंपू चिल्ला चिल्लाकर कहते वोट ,
सियासत की होली में , कीचड़ पर अब जोर ।।

"जय कुमार" 02/04/14

शेर

मेरे घर की दीवारों को दरकते देख जय ,
जमाने ने रास्ता बनाने का मन बना लिया ।

जय कुमार 02/04/2014    

Tuesday, 1 April 2014

यह क्या हो रहा

यह क्या हो रहा है , यह क्यों हो रहा है
जुड़कर तुं मुझसे , क्यों जुदा हो रहा है

खुशबु बनकर आया , तुं मेरी जिंदगी में ,
चाहत बढ़ाकर क्यों यूँ , नासूर हो रहा है।

मुझे जुनूने वफ़ा की , राहो में चलाकर ,
महफिलों में जाकर यूँ , बेआबरू हो रहा है।

मुझे जलजलों का खौफ , रहा कहाँ अब  ,
मेरा यार ही जब यूँ  , क़यामत हो रहा है।
 
धरा पर आया , तूं इंसान की औलाद है ,
अब क्यों  इतना ,यूँ  मगरूर हो रहा है।

"जय  कुमार"