Monday, 13 May 2024

हादसे कुछ इस तरह से होते रहे

हादसे  कुछ  इस तरह से होते रहे 
उनसे  मिलकर  उन्हें हम खोते रहे

मासूम   चेहरा  झुकी   हुई  नजरें 
बंजर ज़मीं  पर  मुहब्बतें बोते रहे

दिल में बसे  दिल की एक न सुनी 
प्यार  की  चाहत  में रोज रोते रहे 

मुकम्मल  मुकद्दर यहां  होता नहीं 
आफताब  दरिया को  सुखोते  रहे 

शरीफ़ों  की बस्ती  में हम जो गये
शराफ़त   से  नाता  हम खोते  रहे 

इस ज़माने का जय तू मुसाफिर है 
सांस ने  साथ छोड़ा  वहीं सोते रहे 

"जय कुमार" (स्वरचित)१३/०५/२०२४
















Sunday, 12 May 2024


मेरे   महबूब  तुझे   एक  दिन आना होगा 
आवाज़  देकर फिर  मुझको बुलाना होगा 

सोया  हुआ  हूं  मैं उठता  नहीं  किसी  से 
हाथ  में  हाथ  देकर  मुझे   उठाना  होगा  

चल चुका हूं आगे वक्त ने भी  साथ छोड़ा 
आंखों  से भीगे  दामन को  सुखाना होगा

मेरी  रूह ने  छुआ  जब  रूह को तुम्हारी 
रंजिशो  को  अपनी  तुम्हे   भुलाना  होगा 

तेरी खो  चुकी  हैं  जय  आंखों की रोशनी 
कब्र  पर  आकर  एक  दीप जलाना  होगा 

"जय कुमार "(स्वरचित) १२/०५/२०२४









 






 





Friday, 3 May 2024

मुसीबत  में  इतना   मचलते क्यों हो
नफरतों  में  रोज  उबलते   क्यों   हो
 
थोड़ी   सी  इज़्ज़त   थोड़ी   शोहरतें 
तुम अपनी  चाल को बदलते क्यों हो

रश्म रिवाज  रिवायतें इस ज़माने की
अपने आप को फिर कुचलते क्यों हो 

मगरूरियत मैं मशरुफ मुहब्बत कहां 
दिल में बसे दिल से निकलते क्यों हो

रक़ीब जब मुहब्बत का मज़हब हुआ 
आग के दरिया से जय गुजरते क्यों हो

"जय कुमार " ०३/०५/२४