उनसे मिलकर उन्हें हम खोते रहे
मासूम चेहरा झुकी हुई नजरें
बंजर ज़मीं पर मुहब्बतें बोते रहे
दिल में बसे दिल की एक न सुनी
प्यार की चाहत में रोज रोते रहे
मुकम्मल मुकद्दर यहां होता नहीं
आफताब दरिया को सुखोते रहे
शरीफ़ों की बस्ती में हम जो गये
शराफ़त से नाता हम खोते रहे
इस ज़माने का जय तू मुसाफिर है
सांस ने साथ छोड़ा वहीं सोते रहे
"जय कुमार" (स्वरचित)१३/०५/२०२४