मेरी हर चाह मे तुझको बिठाया जाये ||
दिल ने कहा यादों को फिरसे सजाया जाये ||
मुरझाये जख्मों को हरा कराया जाये ||
सुबह दोपहर क्या किया आज बताया जाये ||
मत हो उदास हयात को समझाया जाये ||
चौराहों पर गीता कुरान सुनाया जाये ||
कौन कहता वक्त हर जख्म भर देता
मेरे दिल के जख्म हरे के हरे रहे
सूख जाता होगा समुंदर तेज धूप में
मेरी आंखों में अश्क भरे के भरे रहे
कागज और स्याही धमाल करते रहे
धरातल पर सारे वादे धरे के धरे रहे
जिंदा करते रहे वादे ख्वाहिशों को
वफाओं के आलम मरे के मरे रहे
अमन चैन की बातें बज्म में बैठकर
घर के अंदर मासूम डरे के डरे रहे
"जय कुमार "
खुशी इक से नहीं मिली , गम हजारों का झेला है
साथ देता रहा सबका , सफर मेरा ही अकेला है
टूटे वादों कि कहानी , कही न जाती अब मुझसे
मुहब्बत रोज रोती है , जज्वातों का झमेला है
सूख जाते है आंसू भी, तपन जब प्यार की तपती
याद उसकी सताती है , धूप चांदनी सी लगती
मीठी आवाजे अब भी , हवा कानों तक लाती है
हाथ मिलकर चले गये , वक्त ने खेल खेला है
लहरों की इक ख्वाहिश, बस साहिल से मिलना है
कलियों की इक ख्वाहिश , फूलों सा खिलना है
लहरे दम तोड देती , फूल खिलकर टूटते है
तमाशा रोज होता है , यह जमाने का मेला है
"जय कुमार "
एक प्रयास _/\_ . .
गीत गजलों की भाषा हूँ ।
दर्द मजलूम का गाता हूँ ।
आँसू सूख गये आंखों से ,
उनका मैं मर्ज सुनाता हूँ ।
बिछोना है धरती जिनकी ,
उनके मैं बीच पाता हूँ ।
गीत शहनाई के न आते ,
मजबूरी मन की सुनाता हूँ ।
घोर निराशा के अंधेरों में ,
एक आशा दीप जलाता हूँ ।
जिन्हे जमाने ने धुतकारा ,
मैं उनको गले लगाता हूँ ।
वतन पर जो जान लुटायें ,
मैं उनको शीश झुकाता हूँ ।
कदम मिलाकर ही चलने में ,
मैं जय विश्वास जताता हूँ।
"जय कुमार"
कदम पीछे हटाना अब नहीं
चल चुका हूं बहाना अब नहीं
मंजिल इंतजार करती हो जब
दूरी से घबराना अब नहीं
नर्म राह कि चाहत से निकल
आलस्य को बुलाना अब नहीं
सपने नहीं हकीकत है यही
काम से दिल चुराना अब नहीं
कल क्या हुआ कल क्या होगा
इस आज को भुलाना अब नहीं
वक्त ने खेल खेला रुलाने का
किसी और को रुलाना अब नहीं
हाथ नहीं जब दिल मिलते थे
वह गुजरा जमाना अब नहीं
जिस्म कि चाहत रही प्रेम कहां
इनसे दिल लगाना अब नहीं
गुजरा जय आग के दरिया से
मुहब्बत का फंसाना अब नहीं
"जय कुमार "२१/०९/१७
हमारे क्रांतिकारी, हमारे नये भारत के जनक, हमारी धरोहर , विश्व के गौरव, जिनकी आत्म शक्ति का लोहा दुनिया ने माना व अनुशरण किया, जिनने अपना जीवन देशवासियों के भविष्य के लिए खपा दिया, उनके अनगिनत नाम है मुख्य नाम मंगल पांडे , झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, राष्ट पिता महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, लाला लजपत राय, लोकमान्य तिलक , चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, बी आर अंबेडकर, लाल बहादुर शास्त्री, जवाहर लाल नेहरू इत्यादि !!
हमारे देश को एक नई दशा व दिशा देने में इन व इन जैसे हजारों महापुरूषों ने अपना योगदान दिया हम इनके योगदान की बदौलत हम आज नई पहचान बनाने में कामयाब रहे है !!
हमारी आजादी के ७० साल हो चले है शुरूवात से हमने अपने महापुरूषों के योगदान को समझा सम्मान दिया !
लेकिन समय के साथ धीरे धीरे महापुरूषों को बांटने का काम होता रहा हमने अपने अपने आदर्श पुरूष बना लिए बांट लिए, यहां तक भी कोई बात नहीं, बंटे हुए इन लोंगो ने महापुरूषों की निंदा शुरू कर दी, कोई किसी को श्रेष्ठ मानने लगा, कोई किसी को, आम लोगो के बीच बदनाम किया गया, राजनैतिक पायदे के लिए यह सब चलता रहा ! कुछ महापुरूषों के निर्णयों पर आये दिन सवाल किये जाते रहे है , आज खुले आम सोशल मीडिया पर हमारे नायको को बिना तथ्य के बदनाम किया जाता है हर दिन आपको जहर उगलने बाली बाते मिलेगी !!खुलेआम अपशब्दों का प्रयोग किया जाता है जो पीड़ादायक है !!!!
इन नायको के रास्ते अलग रहे होगे, लेकिन नियत सबकी एक ही थी मंजिल सबकी एक ही थी , उस वक्त के हालातों के अनुसार उन्होंन उचित निर्णय लिए हमें यह समझना होगा !!
हमारे ही महापुरूषों का हम ही अपमान करें जिन्हे संसार प्रेरणा का स्त्रोत मानता है यह कहां तक उचित है ??
"जय कुमार"
बहारों के दीवाने ढूंढते हो
बहकते अब परवाने ढूंढते हो
मुहब्बत तो खूब करते हो हमसे
मचलने के बहाने ढूंढते हो
"जय कुमार "
असली सूरत छुपाते रहे ।
बनावटी रुप दिखाते रहे ।
घर रोशन करने के लिए ,
सबके घौंसले जलाते रहे ।
किसी को देखा उजाले में ,
जले दीप क्यों बुझाते रहे ।
खिलखिलाते पंछियों को ,
रंज व गम से मिलाते रहे ।
गहरी नींद सो गया कल मैं ,
सफर के साथी बुलाते रहे ।
जय बैचेनी में मिला क्या ,
रोज ही अश्क बहाते रहे ।
"जय कुमार"
एक प्रयास _/\_ . . . . .
यह तेरा आसियाना है जो
फूलों से घिरा ठिकाना है जो
खूबसूरत जमाने के सपने
फँसा इसमें दीवाना है जो
मिलकियत तेरी बस पानी है
एक दिन तो इसे बह जानी है
शोहरत में डूबा है तू इतना
यह पल दो पल की कहानी है
जाति धर्म के फंदो में फँसा
रंग रुप के इन कुंदो में फँसा
इस तन की विसात क्या है
चार दिन के चिन्हो में फँसा
रजनी भोर की निशानी है
भोर रजनी की कहानी है
दोपहर के सूर्य की रोशनी
साँझ आने पर पुरानी है
"जय कुमार"01-08-14
चल निकल भी जा मानव अँधेरों से ,
उजाले को तेरा ही इंतजार है |
नाकामी की जंजीरों को तोड़ अब ,
कामयाबी को तुझसे ही प्यार है |
अपने बनाए जाल में फँसा रहा ,
दुनिया के छोर दूर तलक फैले हैं ,
नाव को मोड़ धारा के विपरीत ,
तेरी मंजिल सितारों के पार है |
निगाहों के धोखे से निकल के अब ,
अपने आप की भी आवाज सुन ले |
जमाने को जो कहना है कहने दे ,
अपने आपके एहसासों को चुन ले |
कथनी करनी एक नहीं होती हो ,
कुछ पहचानने की जरूरत लगती ,
तेरे अंदर शक्ति का समुंदर है ,
अपनी भूली क्षमताओं को गुन ले |
भ्रम कोई न पाल अपने जहन मैं ,
मानव हो तुमे अमर पद पाना है |
साँसे चलती ये तन जीवित रहता ,
तब तलक यही तेरा ठिकाना है |
किसी मकसद से यहाँ आया है तू ,
उसको ही दिलेरी से निभा लेना ,
मिला जो एक सफर पूरा करके ,
फिर एक नये सफर पर जाना है ||
"जय कुमार"
चल चला चल चाल बदल ले
उठ जाग अब हाल बदल ले
मंजिल तेरी रास्ता है तेरा
चल पंक्षी अब डाल बदल ले
कल की कल पर रहने भी दे
दुनिया को कुछ कहने भी दे
इस पल की खुशी में जीले
बंदे अपना आज बदल ले
जीवन जीना सीख न पाये
हरदम खुशियां भीख में पाये
विन स्वर बाजे खूब बजाये
चल प्यारे अब ताल बदल ले
मेरा तेरा करते करते
बडी तिजोरी भरते भरते
कब काल के मुंह में पुँहचे
अब तू अपना काल बदल ले
बैठ नाव मैं छेद किये क्यों
ऊँच नीच के भेद किये क्यों
खुद फंसने को बुनते रहे जो
वह अपना अब जाल बदल ले
"जय कुमार"१७/०७/१७
काम धाम सब छोड़ छाड़के
मोबायल पे बतयाऊं लगे
लरका उजारे जाऊं लगे
............
ये खोरन से ओ खोरन तक
भरी बजरिया के छोरन तक
घूमे ठलुआ बनके राजा
फटफटिया खो घुमाऊं लगे
लरका उजारे जाऊं लगे
.............
लाज शरम अब कछु ने आवे
ईलू ईलू खुलके गाबें
राजश्री के पाऊच दवाके
दद्दा सें बतयांऊ लगे
लरका उजारे जाऊं लगे
...............
काऊ की तो सुनने नइंया
कोनऊ बात गुनने नइंया
कही एक जे मानत नइंया
अपनी अपनी चलाऊं लगे
लरका उजारे जाऊं लगे
.................
जींस टी सर्ट फोग लगाके
बूटन पे पालस करबाके
सल्लु मियां की अदा दिखाके
छोरि पे जाल बिछाऊं लगे
लरका उजारे जाऊं लगे
....................
काम धाम सब छोड छाड़के
मोबायल पे बतयाऊं लगे
लरका उजारे जाऊं लगे
"जय कुमार "२६/०६/१७
काम धाम सब छोड़ छाड़के
मोबायल पे बतयाऊं लगे
लरका उजारे जाऊं लगे
............
ये खोरन से ओ खोरन तक
भरी बजरिया के छोरन तक
घूमे ठलुआ बनके राजा
फटफटिया खो घुमाऊं लगे
लरका उजारे जाऊं लगे
.............
लाज शरम अब कछु ने आवे
ईलू ईलू खुलके गाबें
राजश्री के पाऊच दवाके
दद्दा सें बतयांऊ लगे
लरका उजारे जाऊं लगे
...............
काऊ की तो सुनने नइंया
कोनऊ बात गुनने नइंया
कही एक जे मानत नइंया
अपनी अपनी चलाऊं लगे
लरका उजारे जाऊं लगे
.................
जींस टी सर्ट फोग लगाके
बूटन पे पालस करबाके
सल्लु मियां की अदा दिखाके
छोरि पे जाल बिछाऊं लगे
लरका उजारे जाऊं लगे
....................
काम धाम सब छोड छाड़के
मोबायल पे बतयाऊं लगे
लरका उजारे जाऊं लगे
"जय कुमार "२६/०६/१७
मुहब्बत से ही खुदा ने अपना नाम कर रखा है
जिस्म की चाहत ने इश्क को बदनाम कर रखा है
"जय कुमार "
कोनऊ लाज शरम ने आबे
लरका भरे बाजार बुलयाबे
नियम कायदा सबरे तोड़ रये
मोडिन के संग नैना लडाबे
कोनऊ लाज शरम ने आबे
.............
घर के सबई काम धाम छोड़े
बैठ चौंतरा पे करत गपोड़े
नौनी आदत एकई ने सीखे
ठलुओं के संग चिलम दबाबे
कोनऊ लाज शरम ने आबे
................
कोने चला दव जो मोबायल
ये रोग से गांव भर के घायल
कानों में लगा लई इक डोरी
जाने कोन बैरी सें बतयाबे
कोनऊ लाज शरम ने आबे
.................
खैतन की तो वे गैल भूल गय
गैया बछिया वे बैल भूल गय
जींस लगाके जे पटपटिया पे
गांव भर कि खोरन में उबराबे
कोनऊ लाज शरम ने आबे
...................
बहुअन खो जे कैंसे सजा रय
हल्के हल्के कपड़ा जे पैरा रय
मरई पर जाय ये फैंसन पे
घरभर की जे इज्जत लुटवाबे
कोनऊ लाज शरम ने आबे
लरका भरे बाजार बुलयाबे
"जय कुमार "
में किसान का बेटा हूं
मैने अपने बापू को
खेतों से लडते देखा है
मैं किसान का बेटा हूं
मैने अपने खेतों को
फसलो से भरते देखा है
मै किसान का बेटा हूं
मैने अपने खेतो को
सोना उगलते देखा है
मै किसान का बेटा हूं
मैने अपनी बगिया को
फूलों से खिलते देखा है
मैं किसान का बेटा हूं
मैने अपने खेतों को
गिरवी रखते देखा है
मैं किसान का बेटा हूं
मैंने अपने बापू को
घुटघुट के मरते देखा है
मैं किसान का बेटा हूं
मैने अपने बापू का
सम्मान उजड़ते देखा है
मै किसान का बेटा हूं
मैने अपनी फसलो को
मिट्टी में मिलते देखा है
मै किसान का बेटा हूं
मैने अपने परिवार को
भूखे बिलखते देखा है
मै किसान का बेटा हूं
मैने अपनी बहनों को
आग में जलते देखा है
मै किसान का बेटा हूं
मैने अपने भाईयों को
दर्द निगलते देखा है
में किसान का बेटा हूं
मैने अपनी फसलों को
सूत मै बिकते देखा है
मैं किसान का बेटा हूं
मैने अपने खेतों मैं
जीवन जलते देखा है
मैं किसान का बेटा हूं
मैने अपनी महतारी का
सिंदूर मिटते देखा है
मै किसान का बेटा हूं
मैने अपने बापू को
पेड़ से लटके देखा है
मै किसान का बेटा हूं
मैने अपने बापू को
रस्सी से लटके देखा है
"जय कुमार " १७/०६/१७
मै किसान का बेटा हूं
किसी राह में मेरा भी इक घर हो !
साथ हो तेरा खूबसूरत सफर हो !!
मुकम्मल हो कैंसे दुनिया हमारी ,
परिन्द्रो को जब सैय्याद का डर हो !
जालिमों ने लूटा हो दाना पेट का ,
सिर पर हो आसमां कैंसे बसर हो !
जर्रे जर्रे में रब का नूर दिखता है ,
इंसां गर तेरी पाक नजर हो !
खुदगर्जी की आग में झुलझता रहा ,
इस जहां में भी इक प्रेम नगर हो !
भरोसा किस पे करें खुदगर्ज जहां ,
राज छुपाये रखो राजदाँ अगर हो !
चल सके सुकूं से ईमान कि राह जय ,
जमाने में बता गर कोई डगर हो !!
"जय कुमार"
रोज नये नये सवाल होते रहे |
यूँ ही हर दिन बवाल होते रहे ||
दौलत के अमीर शहरों के इंसां ,
जज्वात ए दिल कंगाल होते रहे |
करते रहे दुआ हम खैरियत कि ,
हमारे जज्वात हलाल होते रहे |
दुश्मन तो तरस खा छोड़ते गये ,
अपने बन दोस्त दलाल होत रहे |
नेक प्रयास करते थे सुलझने का ,
शक के अजीब जंजाल होते रहे |
"जय कुमार"