Saturday, 31 December 2016

नवीन वर्ष  की वेला पर हम , यही  कामना  करते है
हो  खुशहाल  हमारा  समाज , यही भावना  भरते है
नव बर्ष में बीज आशा के , अंकुरित होकर जीवन में
महके बाग नये फूलों से , हम  यही  भावना  धरते है

गुजरे बर्ष की विदाई के साथ नव बर्ष का अभिनंदन है
आप सबको हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई !!


Wednesday, 14 December 2016

पेड़ों से पत्ते जो गिरते नहीं
जिंदगानी के दिन फिरते नहीं
पैर धरती पर आते कैंसे
उंचाई से जो गिरते नहीं

"जय कुमार "

Tuesday, 13 December 2016

गांव की यादे भुला ना  पाये
शहर से नैना लडा ना पाये
बहुत बदला  खुदको  हमने
कागजी फूल खिला ना पाये

"जय कुमार "

Monday, 12 December 2016

समुंदर  का  पानी   खारा  न   होता
जमाने  में   दुश्मन  हमारा  न  होता

जीत लेते  हरेक जंग हम  भी अगर
वेहयाई  में   नाम   तुमारा  न   होता

भरोसा न  होता  जो  तुझपर  अगर
आसमां   पर   कोई   तारा  न  होता

पलकों के  नीचे  अश्क छुपते अगर
समुंदर   का  पानी   खारा  न   होता

दिलों की मुहब्बत मरहम बनती गर
हरेक शहर में पागल खाना  न होता

"जय कुमार "

Saturday, 10 December 2016

समुंदर  का  पानी   खारा   क्यों  है
अब  आदमी  बदी से हारा  क्यों है
वक्त  के साथ  बदल  गया  मौसम
कल हमारा था अब तुमारा क्यों है

"जय कुमार "

Wednesday, 23 November 2016

आज सारे देश में एक ही बहस चल रही है कि नोट बंदी सही है या गलत ?

प्रश्न भी बाजिब है , लेकिन किसी नतीजे तक पुहुँचना जल्दबाजी हो सकती है |

किसी भी बदलाव के परिणाम त्वरित नहीं आ सकते , यह एक व्यापक प्रक्रिया होती है |
अभी से सही गलत का निर्णय उचित नहीं ||

हमारे अतीत से एक घटना लेकर अपनी बात रखना चाहता हूँ , सन १९९१ में व्यापक आर्थिक नीतियों में बदलाव व सुधार किये गये वैश्वीकरण, निजिकरण तथा उदारीकरण की नीति अपनाई गई |

तत्कालिक वित्तमंत्री तथा पूर्व गवर्नर रह चुके माननीय मनमोहन सिंह जी ने जब नई आर्थिक नीति की घोषणा की तो विरोधी दलों ने घोर विरोध किया तथा दुष्प्रचार किया गया |

लेकिन धीरे धीरे देश विकास के पथ पर चलने लगा | सन ८० के दशक में देश की विकास दर १.४९ थी वो २००१ आते आते ६.७८ तक पुहुँच गई |

इस विकास दर ने अभूतपूर्व बढत लेते हुए सन २००५ से २००८ तक लगातार तीन बर्ष ९ प्रतिशत विकास दर प्राप्त की |
२०१५ - १६ में यह विकास दर ७.६ है |

अब बात करते है नोट बंदी का फैसला सही है या गलत है इस बात का फैसला भविष्य के गर्व में छुपा है |

कुछ बाते है जो जरूर परेशान कर रहीं है |
आज भी ७० फीसदी से ज्यादा जनसंख्या ग्रामीण है |

क्या सभी ग्रामीण लोगों तक बैंकिंग सुविधा उप्लब्द है ?

क्या सभी ग्रामीण बैंकिग सुविधा का उपयोग करते है ?

क्या पूरा देश एजूकेटेड है ?

क्या सभी एजूकेट परसन इस लायक है कि वह करेंसी लेस व्वहार कर सके ?

क्या सरकार का सर्वे सिर्प उनके कुछ अनुआयी लोगो का सर्वे नही ?

क्या सारा मीडिया सिर्फ शहरो तक सीमित नहीं सिर्फ उनकी ही समस्याओं को दिखा व लिख रहा है ?

क्या गांव के लोगो की परेशानियों का ख्याल रखा गया ?

क्या कुछ असामाजिक लोग गांव के सीधे लोगों के धन का गलत उपयोग नही कर रहे ?
क्या गरीब आदमी की पूंजी का कहीं भी गलत उपयोग नहीं हुआ ?

क्या मध्यम वर्ग व गरीब आदमी ही हर बार की तरह पिस रहा है ?

क्या रोज ८० हजार करोड़ का व्यापार में जो नुकसान हो रहा है जो ४० लाख करोड तक के नुसान पर पुहुँच गया है आगे कितना नुकसान और होगा , उससे कहीं ज्यादा काला धन है ?

अगर सरकार ने काला धन खत्म भी कर दिया तो जब तक आर्थिक नुकसान ज्यादा हो चुका होगा |

क्या डुप्लीकेट करेंसी पर लगाम लग जायेगी ?
क्या आतंकवाद खत्म हो जायेगा ?

क्या देश कागजों व सोशल मीडिया पर बन रहा है ?

क्या हमारा पूरा देश करेंसी लेस व्यापार के लिए तैयार है ?

"जय कुमार "

आप सब अपनी राय जरूर व्यक्त करें !!

Saturday, 12 November 2016

राष्ट  हित में लड़त  रहे  , हम है उसके साथ !
नाहीं  है  हम  कमल  के , नाही  अपना   हाथ !!

"जय कुमार "

तमन्नायें खौफजदा  हो  गई
मुहब्बत की तासीर देखकर

उनको व्यथा सुनाइये , जिनको दिल से प्यार |
पीछे   तेरे   जो   हंसे  ,  वह   काहे  का   यार ||

"जय कुमार "

कड़वी बोली बोल के , आफत  लेते मोल |
मीठे  शब्दों  से भरा , मनके फाटक खोल ||

"जय कुमार "

Thursday, 10 November 2016

मेरी पीड़ा

गांव कि गलियां , भुला न   पाये |
शहर से  नजरे ,  लड़ा  न  पाये ||

सुलह करते है  , रोज रोज हम |
दिन को रात से , मिला  न पाये ||

खुशबू   अपनेपन   की   हममें |
कागजी  फूल , खिला  न  पाये ||

खरे  सोने  से  ,  मिलते   रहते |
खोटे   सिक्के ,  चला  न  पाये ||

निकल   गये   राहों  पर   ऐंसी |
गांव कि गोद में , सुला न  पाये ||

चकाचौंद  की  , गली  में  भूले |
अम्मा कि रोटी, खिला न पाये ||

जबसे छोड़कर , आये कुटिया |
सुकूं को खुदसे , मिला न पाये ||

"जय कुमार "

Saturday, 5 November 2016

गम के चंगुल कल थे ।
दर्द के सैकड़ो बल थे ।
जलकर राख हुए जो ,
खुशी के चार पल थे ।

"जय कुमार"6/11/14

टुकड़ो  पर  जीने से मर  जाना  अच्छा है |
जिल्लत के महलों से घर जाना अच्छा है |
जीना मौत  से  बत्तर  मत  बनाना  यारों ,
मौत से पहले खुदको अजमाना अच्छा है ||

"जय कुमार "

Thursday, 3 November 2016

नेनी  कल  बाजार  में , फिरती  रही  उदास |
बदी अब बनने लगी , सबकी खासम खास ||

"जय कुमार "

Tuesday, 1 November 2016

गधे को कुर्सी मिली , उल्लू को सम्मान |
कौआ गीत सुना रहे , देख रहे यजमान ||

"जय कुमार"

उल्लू  कुर्सी पर  चड़ा ,  सबको  रहा  चिड़ाय |
हमको जब पद  दे  दिया , अब  काहे पछताय ||

"जय कुमार "

काटे  नाहीं   कटत   है , बोये  करमन  बीज |
हमने खुद ही रच लिया , अच्छा बुरा नसीब ||

"जय कुमार "

Sunday, 30 October 2016

अपनी चौखट कर लई , हमने फिर उजयार |
उनके दीपक भी जले , जिनके घर  तिरपार ||

"जय कुमार "

Saturday, 29 October 2016

आज दिवारी के दिना , राम  राम  कर  लेत |
गौर साब की धरा से , जय शुभकामना देत ||

नमन जवानों  को करें , भारत मां  के  लाल |
सीना ताने जब  चले ,  डरता  है फिर काल ||

नमन   जवानों  को  करें ,  लड़े  हमारी  जंग |
रंगों को  सब  छोड़ के , खाकी  जिनके  संग ||

मौसम  में  ठंडी  घुली , बोनी  को  भव   टेम |
किसान खुश होने लगे,  भरे  देख  रय  डेम ||

कोयल  मीठे  बोल से , सबको  रही रिझाय |
मोर   मोरनी  खेत  में , देखत  मन  मुस्काय ||

अपने दुख  सब भूल के , औरन  का दे संग |
सारे  रंगों  में   भला ,  केसरिया    इक   रंग ||

"जय कुमार"

समस्त सम्मानीय मित्रों को दीपावली की सपरिवार हार्दिक शुभकामनायें  व बधाईयां !!

Thursday, 27 October 2016

मित्रों
हमने पिछले १८ साल से पटाके नहीं फोड़े लेकिन हमारी अगली पीढ़ी के जो बच्चे है उनको हम एकाएक प्रतिबंद नहीं लगा सकते फिर भी
यह विडियो हमने अपने बच्चो को दिखाये तो वह बोले चाचा हमे इस बार पटाके नहीं चाहिए हम हमे बहुत खुशी हुई १२ साल का बच्चा समझ सकता है ,,,, लेकिन दुख तब होता है जब वो लोग जिनके बच्चे बड़े बड़े हो गये वह पटाके फोड़ते है ,,, !!

Tuesday, 25 October 2016

जात पात सब छोड़के , गाते एक ही गीत
भारत मां की गोद से , सबको रहती प्रीत

जय कुमार

हिन्दू मुस्लिम  जैन  से , भारत  का  सम्मान |
सबके सब मिलके कहो , प्यारा हिन्दुस्तान ||

जय कुमार

लेकर कछु न आये थे , देकर कछु ना जाय |
करनी  जैसी कर  रहे , वैसे ही  फल  पाय ||

जय कुमार

सारा जग मैदान है , मानव खेलन हार |
कठिन राहों से परे  , जाना हमको पार ||

जय कुमार

दुनिया रंगमंच हुई , अभिनय अपने पास |
सच झूठ के खेल में , करना हमको वास ||

जय कुमार

उम्दा अभिनय कर चले , हो जाये हम पास |
मुंह खोले  काल खड़ा , हो  न  जाये विनास ||

जय कुमार

Monday, 24 October 2016

कबँहू न प्रीत कीजिए , सुनते ना जो बात |
अपने मे जीते सदां ,  करे  भरम का घात ||

"जय कुमार "

सच्ची प्रीत की चाह में , सब जग देखो छान |
राह  राह  भटकत   रहा , मेरा   झूठा   भान ||

"जय कुमार "

जहां स्वार्थ के बीज हो , पनपे कैंसे प्यार |
रिश्ते में व्यापार करे , वह  काहे का यार ||

"जय कुमार "

मान मोह तज कर मिले , मन की शांति अपार |
अपने  मन  से  जो  मिले , दूजा  कब   करतार ||

"जय कुमार "

शांत  स्भाव  में बस रहा  , यह  सारा  संसार |
विचलित जो खुद न रहे , शक्ति उसमें अपार ||

"जय कुमार "

शांत  स्भाव  में बस रहा  , यह  सारा  संसार |
विचलित जो खुद न रहे , शक्ति उसमें अपार ||

"जय कुमार "

जनता  के  दिन  फिर  गये , लाये    मोदी   राज |
कमल कमल ही दिख रहा , सुलटे नईंया काज ||

"जय कुमार "

अहंकार  के   साथ    में ,  कैंसे    बैठे   आप |
अभिमान क्रोध को जने , क्रोध पाप को बाप ||

"जय कुमार "

रंग बिरंगे रंग की , रंगोली रंगदार |
द्वारे द्वारे दिख रई , रंगो  की बहार ||

"जय कुमार"

Sunday, 23 October 2016

कुम्हार का दीपक ही लेना , रखना मान मजदूर का |
मेहनताना  उनको  देना , मिट्टी  के  कोहिनूर   का |
देश धर्म  की  बात चली है , वक्त  जागने  आया   है ,
दीप जला के दुख हर लेना ,  दिवाली पर मजबूर का ||

"जय कुमार"

Wednesday, 19 October 2016

बीते  हुए  लम्हों की  याद  सताती रही |
गांव की वो  गलियां  रोज  बुलाती रही ||

शहर में  वेहयाई  कि  इंतिहां  से  मिले ,
पनघट  की हमको  गोरी रिझाती रही |

बूढे  बरगद  की छाया  से  ठंडक  मिले ,
वो  बापू की लकड़ी याद  दिलाती रही |

ख्वाबों  के शहरों से  हम आकर  मिले ,
मिट्टी के  रिश्तों की  बात  जाती रही |

तंग गलियां संग दिल लोगों कि दुनिया ,
संस्कारों को जय दीमक सी खाती रही ||

"जय कुमार"२०/१०/१६



बेमुरव्वत  तेरी   तस्वीर  ,  जला   न   पाया ।
दिल के बाग में , फूल दूसरा ,खिला न पाया ।
ख्वावों  में  रोज  हम तेरे , अक्स  से  मिलते ,
मुहब्बत को तेरी , आज तक , भुला न पाया ।।

"जय कुमार"

Tuesday, 18 October 2016

शहरों  के  सन्नाटे  से जब , कोई  पीर  निकलती है |
भाव  हिलोरे  तब  लेते है , मेरी  कलम  उबलती  है ||

आह मुफलिसी की कांनों में , जब उत्पात मचाती है ,
जज्बातों  की  गहराई  से , कोई नज्म  निकलती है |

रोशनी में  नहाया जब है  , शहरों  का  कोना  कोना
जहीं उजाला नहीं पुहुँचता ,वहां मुफलिसी पलती है |

कारोबार  के कौशलों से ,विकसित  हुआ समाज है ,
उँची  इमारत  के  साये  में ,  बैठी  भूख  मचलती है |

यारी हुई थी कल भूख की , राह पड़े कुछ टुकड़ो से ,
यार  आज वेवफा  हुआ  है , यारी रोज  न  चलती है ||

"जय कुमार"18|10|16

Thursday, 13 October 2016

लोहा कहे लुहार से , काहे  पीटत  मोय |
मेरे आगे तू  जले , मोय   न   मारे  कोय ||

"जय कुमार"

Wednesday, 12 October 2016

दुरजन अपने  काम से , हो जाता बदनाम |
सज्जन अपने काम से , कर जाता है नाम ||

"जय कुमार"

इस ग्रुप सभी सदस्य हमारे प्रिय मित्र बंदु है आशा करते है हम सब  मित्रवत आचरण के साथ हँसते हुए रहेगे  !! हार्दिक स्वागत है आप सबका !!

राम राम  !
जय जिनेन्द्र !
जय श्री कृष्णा !

Sunday, 9 October 2016

कहीं   मिले  कहीं  फरियाद  से  रहे |
जखम  वो   गहरे   आबाद   से  रहे ||

मिलन की तमन्ना जिंदा रही दिल में
भूले   बिसरे   ख्वाव    याद  से   रहे |

यूँ  तो  सबकुछ  पाया   जिन्दगी  से ,
बिन  उसके  हरपल  बर्बाद  से  रहे ||

"जय कुमार"10/10/15

Friday, 7 October 2016

सुकून की  चाह  करते रहे
गुनाह पे  गुनाह  करते रहे

मुकम्मल  जिंदगी के  लिए
जिंदगी  तबाह   करते  रहे

सीरत  मैली  रही  जिनकी
सूरत  पर  वाह  करते  रहे

आंधियाँ  उड़ा  गई घरौंदा
आह भर निबाह करते रहे

मासूम बच्चे से मिल  लगा
रब  से  गुमराह  करते  रहे

"जय कुमार"08/10/16

Tuesday, 4 October 2016

जिंदगी जिंदादिली से तब ही जीता  हूँ
जाम  जब  तलक मैं  बेहिसाब पीता हूँ
रंज  से  दोस्ती हुई  खुशी से  बैर  मेरा
जख्म फूलों ने दिये  मैं  उनको सींता हूँ

"जय कुमार "

Tuesday, 27 September 2016

उन परिंद्रो को दर्द ए गम की फिक्र कहां  ,
इश्क ए दरिया में जिंदगी बसर करते है ।

उन  दरख्तों को  हवायें नही डरा  पाती,
सीने  में  जिनके बबंड़र सफर करते है ।

रोज मिलते है  जमाने  की राहों में लोग ,
भूलते नही जो दिल  पर असर करते है ।

पुष्प खिलते है बागों में हर दिन ही नये ,
महकते वो  जो काँटों में बसर  करते है ।

एक रोज पत्थर भी पिगल जाता मगर ,
हम अपने  जज्वातों में  कसर  करते है ।

बेपनाह मुहब्बत के जज्वात वयां नहीं ,
चाह में उसकी जय रूह नजर करते है ।

"जय कुमार"

Saturday, 24 September 2016

कछु  तबाही  तुमने  देखी
कछु  तबाही  हमने  देखी
फिर भी चैन  परत  नईंया
नौने   काम  करत  नईंया

सैंतालीस  के  जख्मों  खों
जले  मुर्दो  की  भस्मों खों
उन्हे  उखाड़ दर्द बड़ा रव
ऐसेअडुआ खूब अड़ा रव

पाछे की तें  काय पड़त हे
आंगे   काय  बड़त  नईंया

नौने   काम   करत  नईंया
......................................

कुण्डलवन की घाटी मोरी
महादेव   की   माटी  मोरी
उलटी गंगा काय बहा रव
लहु से हमरे खूब नहा रव

पाक  नाव  कैने  रख  दव
नाव पे खरो उतरत नईंया

नौने   काम  करत  नईंया

......................................

गीदड़ की है जात  तुमारी
हमसे भिड़हो मात तुमारी
सोय शेर खां तें  जगा  रव
आफत बैठे काय बुला रव

रगड़त  हम  तोखां ऐंसे हैं
भगतन गैल मिलत नईंया

नौने  काम   करत   नईंया
......................................

कछु  तबाही  तुमने   देखी
कछु  तबाही  हमने   देखी
फिर भी चैन  परत  नईंया
नौने  काम   करत   नईंया

"जय कुमार "२४/०९/१६


नागों को  दूध  पिलाया  सिन्धु  का
सम्मान रखा  हमने  इक  बिन्दु का
तोड़ दे संधि भारत का सिरमौर  है
सच्चा  बेटा तू जो  हिन्द  हिन्दू  का

तीन सौ सत्तर का करदे नाश अब
दो  सौ  बहत्तर   हैं  तेरे  पास  अब
हिम  वादी  में  न रहे कोई  अड़चन
घाटी में  सारा  देश  करे  वास अब

वक्त  मील  के  पत्थर  बनने  का  है
भारत की अब धड़कन सुनने का है
तुझको   धागों   के   जोड़  तोड़कर 
इतिहास  फौलाद   से  बुनने  का  है

"जय कुमार "

Thursday, 22 September 2016

करनी कथनी इक हुई , सुन शरीफ के बोल |
खुद  ही सबको कह रहे  , देखो   मेरी   पोल ||

"जय कुमार "

पूरा    होगा   अपना   सपना  ,  पूरे   होगे  अब  अरमान |
घर  घुसकर  दहसतगर्दो  के , तोड़ेंगे   दुश्मन  का  मान ||

नालायक  पर  करो  चड़ाई  , दिल्ली  से  आया  फरमान |
मिला सुअवसर कुछ करने का , बाँध लेव साजो सामान ||

भारत  माँ के चरण  पखारें , अपना जन्म सफल हो जाय |
खून    के   बदले   खून   लेंगे , दुश्मन   को  छोड़ेगे  नाय ||

सिर पर कफन बाँधकर निकले , भारत माँ के वीर सपूत |
चले  हिमालय  की  चोटी पे , दिख  रहे   यमराज  के दूत ||

भारत  के   कोने   कोने  से , अपना  जलवा  रहे  दिखाय |
आका  के  नापाक  इरादे  , अब  तो मिट्टी में मिल जाय ||

"जय कुमार "

Monday, 19 September 2016

मर मिटते  वतन के लिए
चल बसते चमन के लिए
मसलने  का  समय  सही
बात  न  हो अमन के लए

सियासत में बस निंदा  है
हर   भारतीय  शर्मिंदा  है
लाश  बेटो  की   देखकर
मर गया पिता जो जिंदा है

कल आज कुछ दिखता नहीं
हर  दिन  झूठ  बिकता  नहीं
रेत   पर     रकीले    खींचते
पत्थर पर क्यों लिखता नहीं

"जय कुमार "









Friday, 16 September 2016

चौपई छंद

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🌹शिल्प विधान :- चौपई छन्द🌹

(1) चार चरण का सम मात्रिक छंद

(2) प्रत्येक चरण में 15 मात्रा

(3) चारों चरणों में समतुकांत

(4) प्रत्येक चरण का अन्त गुरु लघु से

(5) चौपाई की लय पर लिखा जा सकता है अंत में गुरु लघु रखकर।

(6) आल्हा के सम चरण से भी चौपई छन्द बनता है।

उदाहरण चौपई छन्द 👇

(1) हाथीजी की लम्बी नाक, सिंहराज की बैठी धाक।
भालू ने पिटवाया ढाक, ताक धिना-धिन धिन-धिन ताक ॥

(2) बन्दर खाता काला जाम, खट्टा लगता कच्चा आम।
लिये सुमिरनी आठो याम, तोता जपता सीता - राम ॥

(3) पड़ी अचानक नदी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस पार, तबतक चेतक था उसपार॥

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

आँखों

आँखों की  शरमाई  देखी
होंठो  की   नरमाई   देखी

लुटने  वाले  लुटते  रहते
वांहों  की   गरमाई   देखी

गोरे बदन की  गोरी मिले
कारों  की  भरमाई   देखी

भंवर कुमुदनी पे मचलता
फूलों  की  कुमलाई  देखी

जंगल सी शहरों  की राहें
कली  कली मुरझाई देखी

"जय कुमार"

Thursday, 15 September 2016

जबसे हमारा और आपका परिचय हुआ , तबसे लेकर आज तक मुझसे व मेरे आचरण के द्वारा आपका या आपके परिवार का अपमान हुआ हो , दिल दुखाया हो , निंदा की हो , बुराई की हो , ईष्या की हो , कर्कस वचनो से पीड़ित किया हो इत्यादि .....

किसी  भी प्रकार का अनुचित व्यवाहार या अनुचित आचरण किया हो ...उपरोक्त नादानियाँ जाने अनजाने में हुई हो  , उनके लिए आपसे और आपके परिवार से सह्रदय क्षमा प्रार्थी हूँ !!

उत्तम क्षमा

सादर नमन काव्यमित्र परिवार
चौपई छंद में मेरा पहला प्रयास
आप सबकी समालोचना के लिए
सादर प्रणाम के साथ

घर में लगती हो जब आग
कैंसे     गाने     बैठे    फाग
सोने  बाला  तू  अब  जाग
सरहद  पर   बैठा  है  नाग

"जय कुमार "

दोहा

चेहरा इस जीवन का , करता रहा  बखान |
अपनी ही छाया मुझे ,  कर जाती परेशान ||

"जय कुमार"

Monday, 5 September 2016

सादर नमन काव्यमित्रों !
आल्हा काव्य पर प्रथम प्रयास ,, सादर प्रणाम के साथ

भारत के गुजराज प्रांत में , पोरबंदर शहर का नाम |
जिसमें जनमा एक महात्मा , मोहनदास था  जिसका नाम ||
बापू करमचंद जी जिनके , पुतली बाई जिनकी मात |
कलम में बल नहीं है फिर भी  , महापुरुष की गाथा गात ||

"जय कुमार "

Thursday, 1 September 2016

धरती की कहानी आसमान  सुनाने  लगता  है |
जीत लेता खुदको  खार पुष्प खिलाने लगता है |
समुंदर  को दे चुनौती खड़ा  रहता  हूँ राहों  पर |
लहरें हार जाती  हैं  साहिल   बुलाने  लगता  है ||

"जय कुमार"

Wednesday, 31 August 2016

कुर्सी दिल्ली की चुप रहती है , नाग निकलते हैं |
दूध   हमारा  पी  पी  करके  ,  जहर  उगलते  हैं | भारत  माता  के  विरोध  में   ,    नारे   लगते   हैं |
फूलों  के   बागों   में  आकर  ,   शूकर  पलते  हैं ||

"जय कुमार"

Tuesday, 30 August 2016

काव्यमित्र परिवार के समस्त सदस्यों को
सादर नमन !!
"याद" बिषय पर मेरा
रोला छंद  में पहला प्रयास
सादर नमन के साथ !!

पल पल पीछे जात ,  अब आगे  कुछ ना  बचा |
याद   करे   फरियाद  ,  देखो   पीछे   जो  रचा |
निकल चुका हूँ दूर ,  अब याद कुछ भी न रहा |
भूल  गया हर  बात ,  माँ  का  साथ  याद  रहा ||

"जय कुमार "

Friday, 26 August 2016

मुफलिसी के जख्म क्या कम लगे
नमक   लेकर  जो  बरसात  आई

"जय कुमार "

कौन कहता है वक्त हर जख्म भर देता
मेरे  दिल  के जख्म  हरे  के  हरे  रहे है
सूख  जाता  होगा  समुंदर  तेज धूप में
मेरी आंख  के अश्क भरे  के भरे रहे है

"जय कुमार "२६/०८/१६

Monday, 22 August 2016

धरती की कहानी आशमान ,,सुनाने लगता है !
जीत लेता खुदको खार पुष्प खिलाने लगता है !
भंवर को चुनौती दे ,,,,,,, खड़ा रहता हूँ राह पर ,
लहरें हार जाती साहिल ,,,,,,,,, बुलाने लगता है !!

"जय कुमार" 23/08/16

Saturday, 20 August 2016

अरमान हमारा ,,,,,,रूठ गया !
आश का वह भरम टूट गया !!

ह्रदय में ,,,,,,,,,,,,खामोशी छाई !
भावों का दरिया,, सूख गया !!

खड़ा हाथ में ,,,तलवार लिए !
मानवता बंधन,,,,टूट गया !!

वासनाओं कि ,,,,आँधी आई !
रिश्तों का भरम,, ,टूट गया !!

वक्त का कैंसा ,,पड़ाव आया !
इंसान को इंसान ,,लूट गया !!

अनाचार के ,,,,,,मंजर देखके !
साहस का बाँध ,,,,,फूट गया !!

खामोश हुआ ,जीवन स्पंदन !
साँसो से ह्रदय ,,,,,,,,रुठ गया !!

"जय कुमार"

Tuesday, 16 August 2016

जिस्म से रूह जुदा हो जायेगी
रूह में यारी,,, खुदा हो जायेगी

"जय कुमार"

Saturday, 13 August 2016

भारत माँ के श्री चरणो में ,
सादर शीश ,,,झुकाता हूँ !
बलिदानों की अमर कहानी ,
सबको आज,, ,सुनाता हूँ !!

झाँसी की रानी ,,,मरदानी !
तलवारो से लिखे कहानी !
महल छोड़ रण में लड़ती थी !
दुश्मन पर भारी पड़ती थी !!
प्राणो की बलि ,,,_देने वाली !
स्वराज आग जलाने वाली !!
भारत का स्वाभिमान है जो ,
रानी कि गाथा ,,,,,,गाता हूँ !!

वलिदानों की अमर कहानी ,
तुमको आज ,,,,,__सुनाता हूँ !!

भगत सिंह से ,,,,वीर हमारे !
आजादी के थे ,,,,,,,,मतवारे !!
स्वराज्य से यारी ,,करते थे !
दिल से वतन पर ,,,मरते थे !!
चड़ फाँसी विदा हो गये वो !
अमर अमिट नाम कर गये वो !!
शहीद वीर भगत सिंह जी को ,
श्रध्दा सुमन ,,,,,,,,,चढ़ाता हूँ !!

वलिदानों की अमर कहानी ,
तुमको आज ,,,,,,,सुनाता हूँ !!

चलि हवा जब ,,,,दुराचार की ,
अहिंसा का तब मसिहा आया  !
एक देश एक आवाज बनी तब !
सत्याग्रह की बात ,,,चली जब !!
लिख गई  तब एक नई कहानी !
देश ने देखी  थी ,,,,तब जवानी !!
तिरंगे को सम्मान ,,,,,मिल गया ,
स्वराज की बात,,,,,, बताता हूँ ।

वलिदानों की अमर कहानी ,
तुमको आज ,,,,,,,,,सुनाता हूँ ।

कोई उत्तर कोई दक्षिण का !
कोई पूरब कोई पश्चिम का !
कोई तमिल कोई हिंदी का !
कोई भेद ना सारे हिंद का !
सबने अपना लहु बहाया !
भुला दिया गया उनका साया !!
इतिहास भुला रहा जिनको !
मैं उनको शीश,,,, नभाता हूँ !!

वलिदानों की अमर कहानी ,
तुमको आज ,,,,,,सुनाता हूँ !!

लाखों शहीदों कि आजादी !
सम्भाल के रख न कर बर्बादी !!
लोकतंत्र को घुन न लगा अब !
खुदगर्जी से ऊपर उठ अब !!
अपने वतन को देखो भाई !
आपस में ना करो लड़ाई  !!
जो ना माने ,,,,,,हार काल से ,
उन वीरो कि गाथा गाता हूँ !!

वलिदानों की अमर कहानी ,
तुमको आज ,,,,,,सुनाता हूँ !!

भारत माँ के श्री चरणों में ,
सादर शीश,,,,,,, झुकाता हूँ !
वलिदानो की अमर कहानी ,
तुमको आज ,,,,,,सुनाता हूँ !!

"जय कुमार"14/08/14

Thursday, 11 August 2016

दिल्ली के दरबारो की क्यों ,,,,,, अब कोई लिखता नहीं
सत्तर बर्ष से सपने दिखाते ,,,,,,,,सत्य तुमे दिखता नहीं 
वादे और इरादे इनके ,,,,,,,,,,,  लगते नदी के दो साहिल
पैकिंग कितनी सुंदर करलो , सदियों झूठ बिकता नहीं

"जय कुमार "11/08/16

Tuesday, 9 August 2016

काल की डाल पर ,,,,घौंसले बनाने थे !
दरदरे जख्मों पर,,,,,, मरहम लगाने थे !!

रफ्तार तेज रही ,,,,हयात ए सफर की ,
एक वक्त में उम्र के ,,,,,पुष्प खिलाने थे !

आसमां में आफत ,धरती पे कहर था ,
दलदली राहों पर दो,,,,,, पैर जमाने थे !

साहिल के बीच भँवर का साथ मिला ,
सदियों के बिछड़े दिन रात मिलाने थे !

हाथ जल चुके थे,,,,,,,,,, होम लगाने में ,
जिम्मेदारियों के चप्पू ,,,, तो चलाने थे !

जय पराजय का साथ रहा जिंदगी भर ,
हाथों में भाले लिए ,,,,,,, खड़े जमाने थे !!

"जय कुमार"10/08/15

Saturday, 6 August 2016

रात सो गयी दिन,,,,,, जग जायेगा
तम दूर तलक अब ,,,भग जायेगा

खैरियत पूंछ ले ,,,,,,अपनी आपसे
दिल तेरा गमों को ,,,,,तज जायेगा

बुझने लगे भरम का,,, दीपक तब
जीवन पर ताला,, ,,, लग जायेगा

मन के तम को सुला भरोसा जगा
दामन वागों सा,,,,,,,,,, सज जायेगा

सुराक को खामियां न समझ यार
धुन बन बांसुरी सा,,,,बज जायेगा

"जय कुमार "06/08/16