Tuesday, 26 May 2020

जिन पैरों

जिन  पैरों  को  धोकर  आये, उन   पैरों   में   छाले  हैं
भूख प्यास से विलख रहे वो, नियति के खेल निराले हैं
क्या  आशा  वह करें  आपसे, क्यों न वह बंदूक उठायें 
भ्रष्टतंत्र   की   भेंट  चढ़े  जो, छीने  जिनके  निवाले  हैं 

"जय कुमार"27/05/20

Saturday, 16 May 2020

दावे दफ्तरों से निकलते रहे
हकीकत सड़क पर दिखती रही।
मोहलत मांगती रही जिंदगी
मासूमियत मेरी बिकती रही।

ये शहर लौटकर आना


ये शहर  लौटकर  आना  मुश्किल होगा
इन जख्मों को समझाना मुश्किल होगा

भार  कंधों पर उठा  खफा  दी  जिंदगी 
बेगानापन  यह  भुलाना  मुश्किल होगा 

सोचा न था कोठियां  भरी  थी  जिनकी 
उनको  निवाले  खिलाना मुश्किल होगा

गगन  चुम्मी  इमारतें   हमने  बनाई  थी
पता  न  था सर छुपाना  मुश्किल  होगा

यतीम होकर बच्चे  सड़क पर बिलखते
मां  के  बिन दूध पिलाना मुश्किल होगा 

बड़े    बड़े    वादे  किये  सियासत   तूने
आइना देख  मुंह दिखाना मुश्किल होगा 

बेबसी   बेइंतहां   सड़को  पर  भटकती
जय ये  मंजर  भूल जाना मुश्किल होगा

"जय कुमार" 17/05/20






Thursday, 14 May 2020

खाली पेट का असर लगता है
मेहनत   का ये  घर  लगता है

हमने  नींव  रखी   शहरों  की
इसी  काम का कर  लगता है

छोड़  के आये अपने  आंगन 
उनका  नगर  जहर  लगता है

पावों   से   क्या  पूंछें  हालत
सूर्य  देव का  कहर  लगता है

चल  रहे  हम मौत के साये में 
मौत  से बत्तर सफर लगता है

लंबे  रस्ते  मजबूर  है  जीवन 
सांस  डोर  से  डर  लगता  है

आग  पेट की हर दिन जलती
इसमें आग का बशर लगता है

निकल पड़े जय जिन राहो पर
यह तो अंतिम सफर लगता है 

"जय कुमार"15/05/20










Friday, 8 May 2020

भूंखे  हमारा   यह  लंबा  सफर   गया 
आवाज  का उन तक  नहीं असर गया
जिस  आग को  बुझाने चले थे परदेश
दर्द उसका आज जमीं पर बिखर गया

"जय कुमार"