Tuesday, 29 May 2018

नफरत के शहर में यारो प्यार लिये बैठे हैं
वेहयाई की चौखट पर इजहार लिये बैठे हैं

"जय कुमार "

Monday, 28 May 2018

आंखे  नम न  कर
कोई  गम   न  कर
हार   जायेगा  तम
हिम्मत कम न कर

"जय कुमार "

Thursday, 24 May 2018

मुझे   वक्त  के  हाथों में सौंपता  रहा ।
जहर मिली मुहब्बत वो परोसता रहा ।
साथ  चलने को  खड़ा  मैं  होता  रहा , 
मेरे  जज्बे को खंजर वो  खौंपता रहा ।।

"जय कुमार"

Sunday, 20 May 2018

मौन जब बोलता है
राज तब खोलता है
दिल का तराजू यह
बराबर  तौलता   है

"जय कुमार"

Tuesday, 15 May 2018

जिंदगी  को सरल कर लिया मैंने
पाषाण को तरल कर  लिया मैंने
समस्याएं खूब उत्पात मचाती है
कष्ठो  को  बिरल  कर लिया मैंने

"जय कुमार "

Monday, 14 May 2018

नर्रा  नर्रा  मैं  हार   गओ
मोरी  बात  सुनत  नईंया
मनकी बात कहत नईंया

जबसें आओ हे खैतन सें
कठवा बैला लय जौतन सें
ऊंगो  ऊंगो  जो  बैठो  हे
पैले  जैसौं  लगत  नईंया
मनकी बात कहत नईंया

हफ्ता भर में ब्याव मोडी को
सूत चुकाने हे करोढी को
खैतों से कछु नई निकरो
पानी टेम पे गिरत नईंया
मनकी बात कहत नईंया

खून पसीना एकई करके
दिनई रात  देखई  करके
कछु फसल जो हाथे आई
मंडी में भाव मिलत नईंया
मनकी बात कहत नईंया

भीड़ लगी काये खोरन में
बैठे  रोबे  सब  दोरन  में
ओके घरे आफत आ गई
बेवजे कोऊ  मरत नईंया
मनकी बात कहत नईंया

अर्थी उठ रई फिर किसान की
दुनिया  समझे  अनजान की
जो  हालत  में  हम  रेत  हे
ओ  में   कोऊ  रहत  नईंया
मनकी बात  कहत  नईंया

का अनहोनी जा होन लगी
रती मईया अब रोन लगी
जैंसौ दर्द किसान सहत हे
बैंसौ दर्द कोऊ सहत नईंया
मनकी बात कहत नईंया

नर्रा  नर्रा    मैं  हार   गओ
मोरी    बात  सुनत  नईंया
मनकी  बात  कहत  नईंया

"जय कुमार "25/05/18

Friday, 11 May 2018

गांव  लिखता हूँ शहर  नहीं  जानता
भोर लिखता हूँ  दुपहर नहीं जानता

आग  दिखती  है  पानी  लिए  रहता
कलम पकड़ी है खंजर  नहीं जानता

प्रेम  में   धोखा  आता  नहीं   हमको
रिश्ते निभाता हूँ  जहर  नहीं जानता

चला सख्त राहों पर मंजिल न मिली
राह का राहगीर  सफर  नहीं जानता

मुहब्बत  रोती   रही  आज  चुपचाप
बेदर्द  उसकी  तु  नजर नहीं  जानता

तोड़  दिया दिल  को सीसे  की तरह
आग  लगाता  है असर  नहीं जानता

मतला   मिसरा    मक्ता  आता  नहीं
गजल कैसे  लिखूँ बहर नहीं जानता

"जय कुमार"12/05/18

Thursday, 3 May 2018

रोज हमे पत्थर दिल कह - कह  कर नहीं थकते
फना हो जाते हैं पत्थर भी किसी को zxका घर बनकर

जय कुमार

Tuesday, 1 May 2018

सरकार

हर  बार धोखे  मिले नाम उसका सरकार  लिखता हूँ
दगे  की  कहानी   छुपाता  नहीं बार  बार  लिखता हूँ

मुहब्बत  देखने  दिखाने  हाथ  से   हाथ  मिलाने  की
जनाब  अंदर  के मनसूबों  की मैं  दरकार  लिखता हूँ

ईमान  की  कसम  खाए बैठे  हैं  मखमली कुर्सी  पर
मुल्क की  बज्‍म  ए  इंसाफ  को बाजार   लिखता  हूँ

मुहब्बत  रात  के आगोश  में  उजाले  में  छोड़  जाते
बहरूपी  इनके  इश्क  के बिगड़े  किरदार लिखता हूँ

जमीन छीन  ना ले  कोई  दिल  की  मैं चौकस  रहता
हर  रोज दिल में उसका नाम  लाखों  बार  लिखता हूँ

उजाड़  गया  हर  मौसम  को  जय  देखते  ही  देखते
बड़ा बेवकूफ़  हूँ   मुहब्बत को  सदाबहार  लिखता  हूँ

"जय कुमार "01.05.2018