Saturday, 29 April 2017

रोज  नये  नये  सवाल  होते  रहे |
यूँ ही हर दिन  बवाल  होते   रहे ||

दौलत के अमीर  शहरों  के इंसां ,
जज्वात ए दिल कंगाल  होते रहे |

करते  रहे दुआ हम  खैरियत कि ,
हमारे  जज्वात  हलाल  होते रहे |

दुश्मन  तो  तरस खा छोड़ते गये ,
अपने बन दोस्त दलाल होत रहे |

नेक प्रयास करते थे सुलझने का ,
शक  के अजीब जंजाल होते रहे |

"जय कुमार"

Thursday, 27 April 2017

भीष्म   लेटे  हुए  मजबूरी  की  शय्या है
अर्जुन को राह  दिखाता इक  कन्हैया है
राष्ट धर्म कर्म पथ पर चलते रहे उनके
रिस्ते  नातों  संबंधो की  डूबती  नैया है

"जय कुमार "

चिंगारियों ने शोर बहुत मचाया कल
इक  आफताब  के डूब  जाने के बाद

"जय कुमार "

मुसीबत  सामने  होती  मैं  मुस्कुरा  देता  हूं
हथियार के बिना ही दुश्मन को हरा देता हूं

"जय कुमार "

आज मुसीबत भी सर्मिंदा  हो गई
मुझे हर  वक्त  मुस्कुराता देखकर

जय कुमार

Tuesday, 25 April 2017

दुनिया के बाजार में कहीं गुम न हो  जाना
यहां पोशाक के साथ  कफन भी बिकते है

जय कुमार

बाजार में गये  दूल्हे  की  पोशाक  खरीदने
उसी दुकां पर हमने कफन भी बिकते देखा

"जय कुमार "

खुदा ने जब  जब अजमाया  है तुझे |
नई  मुसीबतों  से  मिलाया  है  तुझे |
पूंछा क्यो ऐसा करते  , जबाब मिला ,
मुश्किलो  से  लड़ने  बनाया  है तुझे ||

"जय कुमार "

Monday, 24 April 2017

दीवारे  बन  भी  गई   कोई   बात   नहीं
खिड़की बना रखो इक दुआ सलाम को

"जय कुमार "

अपने  वादों से  मुकरता  है कोई|
टूटे आईने सा  बिखरता है कोई |
उजाले के लिए  ही रोज  आग से ,
कहां चिरागों सा गुजरता है कोई ||

"जय कुमार"

Sunday, 23 April 2017

अन्यदाता  नंगा   होता  जिस  देश  में
कौन सुखी रह सकता उस परिवेश में

Saturday, 22 April 2017

बोझ बहुत है कागज पर उतर सकता नहीं
रन्ज  बहुत है आंखों से बिखर सकता नहीं

जय कुमार

Friday, 21 April 2017

बात छेड़कर  जात धरम की  , रोज बखेड़ा करते है
भाई  चारा  तहजीबों   की ,  जड़े   उखेड़ा   करते है
जाने वो क्या देश धरम को , पोषक है जो नफरत के
जिंदा   करके  वो   मुर्दो   को , घाव  उदेड़ा   करते है

"जय कुमार"

गांधीवादी सोच को गाली देना आम हो गया !
सूर्य बादल में छिपा चिंगारी का नाम हो गया !!

"जय कुमार "

Thursday, 20 April 2017

गांधीवादी  सोच  को ,  गाली  देना  आम !
सूरज को काला बता , चिन्गारी का नाम !!

"जय कुमार "

गांधीवादी  सोच  को ,  गाली  देना  आम !
गांधी को समझे नहीं , करते जो बदनाम !!

जय कुमार

Wednesday, 19 April 2017

मंत्रों से नींद खुले या अजान से
दोनों  ही मिलाते  है भगवान से

"जय कुमार "

Tuesday, 18 April 2017

जिंदा  गर हो  भरोशा , पराया सगा  हो  जाता है
दर्द गर हद से गुजरे , जख्मों पर दवा हो जाता है

"जय कुमार "

सपनों को  बुन लेना
अपनों को चुन लेना
जो भी मिले  राह  में
उनसे  भी गुन  लेना

"जय कुमार "

जिंदगी से कोई  , सवाल मत  करना
हुआ जो उसका , बबाल  मत करना
वक्त  के  हाथ   से  छूट   गया   हाथ
जीवन में  ऐसा ,  मलाल  मत  करना

"जय कुमार"

Sunday, 16 April 2017

जब तक  वीरों को दिल्ली की , जंजीरों ने  जकड़ा है
तब तक कुत्तों की फौजों का , झुंड सामने अकड़ा है
यह तो देश  हमारा ही है  , और  सरहदे  भी  अपनी
इन   वीरों  ने  गद्दारों के ,  घर  में   जाकर  रगड़ा   है

जय कुमार

गुलाबों की खुशबू ले  चलती है वो |
ख्वावो में रोज आकर मिलती है वो |

मुहब्बत के  कसमें  वादे  में  मुझसे ,
तुम   मेरे  मै तुम्हारी  कहती  है वो ||

जय कुमार

Sunday, 9 April 2017

आग भड़क  उठी अंगारे बिखर रहे ।
पानी  नसीब  नहीं प्यासे  अधर रहे ।

लुट रहा  हो  काफिला जज्वातों  का ,
अँधेरी  रात  लुटेरों   पर  नजर  रहे ।

उम्र  बीत   चुकी   राह   देखते    रहे ,
राह  के   राहगीर   बता  किधर  रहे ।

माल  मोतिओं  की टूट  रही  फिरसे ,
रेशमी   धागों  के  कहाँ   बसर   रहे ।

लूट  कि  रूह तक  मुहब्बत में उसने ,
कट  रही  हो  जड़े  कैसे  सबर   रहे ।

जमाने  से  मिलते  रहे   है  हम  रोज ,
अपने  आपसे  मिले  तब  खबर  रहे ।

नये  जमाने  नये  खून  कि  ये दास्ताँ ,
बुजुर्गो  के  कहाँ अब  जय असर रहे ।।

"जय कुमार"

सबको बस दो गुलाबी , हजार  की चाहत है
नाम अपना हो जाय , इस्तिहार की चाहत है
रंग   बदलते   ऐसे    बदलती  वेश्या   चादरें
सब  बिकने तैयार है  , बाजार  की  चाहत है

"जय कुमार"

Friday, 7 April 2017

चोट गहरी थी , जख्म दिखा नहीं !
हवलदार  ने  ,  मर्म    लिखा  नहीं !
माल अच्छा था  , पैकिंग कमजोर ,
बाजार में  वह , कभी  बिका  नहीं !!

"जय कुमार"

Thursday, 6 April 2017

जीवन   काँटो   का  वसेरा  होगा ।
अगर  आज भी न  सबेरा   होगा ।  
जीत के स्वयं को प्रकाश से मिल ,
वरना  चारों  तरफ  अँधेरा  होगा ।।

"जय कुमार"

Tuesday, 4 April 2017

ख्वाव  में फिर ,  सुला   गया  कोई
मुझे  मुझ   से ,  मिला   गया  कोई

आखरी साक पर चोट  कि  उसने
अंदर  से फिर  , हिला  गया   कोई

रंग   रूप   की   दौलत   छुडा   दी
दिल को दिल से , मिला गया कोई

तकदीर    का   लिखा   पडू    कैंसे
खुदका  लिखा , पडा   गया    कोई 

जय  रोज    ही   दौड़ता   रहा     है
कैसे  चलूं   ,   सिखा    गया    कोई

"जय कुमार"