आदमी जमीर से आज गुमनाम दिखता है
नादान क्यों पाती तू बेनाम लिखता है
कोठियां, कारे, ऐशो आराम है तेरा
कार्यालयों में कोढियों के दाम बिकता है
"जय कुमार"
मेरे केवल कुछ कहने से, कैंसे तुम यूं रूठ गये हो
अहसासों की छोड़ी बगिया, फूलों जैंसे टूट गये हो
कुछ कड़वी बातों से मेरी, आपका शायद है मन मैला
मेरे मन मंदिर में तेरा, प्रेम प्रकाश केवल है फैला
जैसे बाती मिले तेल से, वैसे दिल से दिल मिल जाता
प्रीतम तुम जब रहो साथ में, जीवन का हर पल खिल जाता
ह्रदय से ह्रदय जब मिलता, प्रेम पथ पर पथिक है चलता
ह्रदय का दामन अब छोड़ा , शीशे जैसे फूट गये हो
कुछ कहनी कुछ ना कहनी थी, कहने से जब मैं चूक गया
ह्रदय की प्रिय एक ना पड़ी , प्रेम का फूल तब सूख गया
कल तक तेरा मेरा ना था, चलते थे हम साथ साथ में
सारा घर खुशबु से महकता, रहते थे जब हाथ हाथ में
नजर मिलाने से क्यों डरते, क्या काला जो दिल में रखते
वेहयाई की भनक न लगी, चोरों जैंसे लूट गये हो
मेरे केवल कुछ कहने से, कैंसे तुम यूं रूठ गये हो
अहसासों की छोड़ी बगिया, फूलों जैंसे टूट गये हो
"जय कुमार"14/10/2018
Mere Bhav
Tuesday, 27 September 2016
उन परिंद्रो को दर्द ए गम की फिक्र कहां
इश्क ए दरिया में जिंदगी बसर करते है
उन दरख्तों को हवायें कहां डरा पाती
सीने में जिनके बबंड़र सफर करते है
रोज मिलते है जमाने की राहों में लोग
भूलते नही जो दिल पर असर करते है
पुष्प खिलते है बागों में हर दिन ही नये
महकते वो जो काँटों में बसर करते है
इक रोज पत्थर भी पिगल जाता मगर
हम अपने जज्वातों में कसर करते है
बेपनाह मुहब्बत के जज्वात वयां नहीं
चाह में उसकी जय रूह नजर करते है
"जय कुमार"
पढ़ले हर कोई किताब की तरह
छुपाये न कुछ भी नकाब की तरह
उलझन न रख अपने दामन में यार
देखले हर कोई लिबास की तरह
कभी न कभी वह सामने आ जाता
जनाब उस बिगड़े हिसाब की तरह
इश्क वक्त के साथ करे गहरा असर
पुरानी बंद उस शराब की तरह
लाख जिंदगी जिये ऐशो आराम
सुकूं नहीं उसके आदाब की तरह
जिंदगी मीठे जहर का नाम दोस्त
महफिले-यार के शबाब की तरह
हिज्र की आग को बयां करु कैंसे
जला है तू जय आफताब की तरह
"जय कुमार "16/09/18
यह मेरी मौलिक रचना है
पढ़ले हर कोई किताब की तरह
छुपाये न कुछ भी नकाब की तरह
उलझन न रख अपने दामन में यार
देखले हर कोई लिबास की तरह
कभी न कभी वह सामने आ जाता
जनाब उस बिगड़े हिसाब की तरह
इश्क वक्त के साथ करे गहरा असर
पुरानी बंद उस शराब की तरह
जिंदगी मीठे जहर का नाम दोस्त
महफिले-यार उस शबाब की तरह
"जय कुमार "16/09/18
दिल बिकता रहा रोज बाजार में
सिर्फ घाटा है दिल के व्यापार में
कम लोग ही मुनाफे में पाते हैं
खबर पहली है आज अखबार में
" जय कुमार "11/09/18
आस आसमान से टूटती रही
जिंदगी जन्म से लूटती रही
गिरा उठा चलने को हर दफा
भरोसे की गगरी फूटती रही
"जय कुमार "11/09/18