सजके चला
शहर की गलि में
जाने के बाद
नहाया आज
सुगंदित जल में
प्यास न बाकी
चला हवा में
सर पर बैठाया
साँस न बाँकी
आग से मिला
प्रकृति के आगोश
बिखर गया
आरम्भ यही
छलाबा रहा सदा
अंत था यही
शहर की गलि में
जाने के बाद
नहाया आज
सुगंदित जल में
प्यास न बाकी
चला हवा में
सर पर बैठाया
साँस न बाँकी
आग से मिला
प्रकृति के आगोश
बिखर गया
आरम्भ यही
छलाबा रहा सदा
अंत था यही
"जय कुमार "1/11/14

