वेरंग कर दिया तूने ,
मेरी जिँदगी को ,
शर्मसार कर दिया तूने ,
मेरी बंदगी को . . . .
भरोसा शब्द से ही डरने लगे ,
अपना अक्श ही डरा जाता है ,
परछाई देख ही सहम जाते हैँ ,
काँटो से भर दिया तूने ,
मेरी जिंदगी को . . . .
तुम व्यापार धर्म का करते हो ,
ईश्वर का सेवक बनकर के ,
आस्था ने ईश्वर बना डाला तुमे ,
जिसको मैँने पूजा ह्रदय से ,
उसने ही डस लिया , मेरी बंदगी को . . . .
अब भरोसा उठ गया है ,
इन डँकोशली बातोँ से ,
मैँ प्रेरणा बन जाऊँगी ,
इस जमाने की हर बेटी की ,
तुमसा कोई अब पाखंडी ,
अब लूट ना पायेगा ,
मेरी अस्मत को . . . .
"जय" 11/09/2013
क्योँ चिल्लाते रहते हो ,
भोँपू की तरह ,
कभी अपने आप मेँ भी ,
झाँक लिया कर ,
एक वार फिर ,
शून्य मेँ जाकर ,
कभी उससे मिल ,
जिसके लिये तू बना है ,
वहाँ से फिर यात्रा शुरु कर ,
अनन्त की ,
अनन्त की . . .
"जय" 12/09/2013
फाँसी नहीँ सरेआम सजा , अब मिलनी चाहिए ।
सदियोँ से जमीँ हुई बर्फ , अब पिगलनी चाहिए ।।
"जय" 13/09/13
जिंदगी छोटी है ,
हर बात बड़ी ।
हर मोड़ पर ,
एक बात खड़ी ।
चलना ही इंसा का काम है ,
यहाँ चलता है ,
वह हर घड़ी । ।
"जय". . 13/09/2013
हिन्दी भारत के जीवंत प्राण हैँ ,
हर भारतीय की अमिट पहचान है . . . .
भारत का ह्रदय हिन्दी की गोद मैँ वसता ,
इसमेँ सब भाषाओँ का रुप पनपता ,
भारत माँ का चंदन बनकर ,
यह तो भारत की शान है . . . .
वह निश्प्राण हो चुके हैँ ,
मुद्रा मेँ जो बिक चुके है ,
मातृ भाषा को छोड़कर ,
जिन्हे विदेशी भाषाओँ पर अभिमान है . . . .
लेँ प्रतिज्ञा इस अवसर पर ,
अब भारत का हर नागरिक ,
हिन्दी को अपना हक दिलवायेगेँ ,
इस भाषा की प्रतिष्ठा को बढ़ायेगेँ ,
यही हिन्दी का सच्चा सम्मान है . . . .
"जय"
14/09/2013
जिँदगी क्या है ,
यहाँ कोई कहाँ समजा है . . .
जिसने जिँदगी को समजा ,
वह इस पर हँसा है . . . .
कभी सामने गिरती बूँद को देखो ,
क्या हस्र होता है उसका ,
क्योँ गफलत जीता है ,
यहाँ तू जँजीरो मेँ फँसा है . . . .
जीता रहा तू हर वक्त अहम् मेँ ,
वक्त की चाल ना समझा तू ,
जब बक्त खत्म होता रहा ,
तब तू खुद पर रोया है . . . .
उस बक्त हिसाब किया तूने ,
जब साँसे खत्म हो चली ,
जिँदगी से क्या पाया ,
और क्या खोया है . . . .
इतिहास गवाह है ,
खोलकर देख ले ,
मगरुर ना हो जीवन मेँ ,
यहाँ सदा कौन रहा है . . . .
"जय" 15/09/13
चेहरा ही जीवन का , बखान कर जाता है ।
मुझे अपना अक्स ही , परेशान कर जाता है । ।
"जय 15/09/13
यह राजस्थान की भूमि ,
पालन करती वीरोँ का ।
यहाँ पनपती है संस्कृति ,
जो सृजन करती हीरोँ का . . . . . .
पग पग पर महल कोठरी ,
जन जन मेँ वसी वीरता ,
इतिहास अधूरा हो जायेगा ,
इस भूमि के वीरोँ के बिन ,
मरुभूमि नित वंदन करती वीरोँ का . . . .
पृथ्वीराज से योध्दाओँ ने ,
इस धरा को खून से सीँचा था ,
राणा साँगा की वो तलवारेँ ,
अमर अमिट जीवन करती ,
लोहा लिया था जिनने ,
अन्याय की जंजीरोँ का . . . . . . .
उस राजपूतानी पन्ना को ,
इतिहास भुला ना पायेगा ,
जब जब वलिदान की बात आयेगी ,
पन्ना माँ का नाम दुहरायेगा ,
जिसने ममता का गला घोँट ,
सामना किया था ,
वक्त की लकीरोँ का . . . . . . .
महाराणा प्रताप की भुजाओँ ने ,
जब अपनी हिम्मत दिखलाई थी ,
अकबर भी कांप उठा था ,
राज भक्त की भक्ति देख ,
मुगल सेना भी शरमाई थी ,
झुकना जिसने उचित ना समझा ,
वन वन घूमे , भेष रखा फकीरोँ का . . . . .
यह राजस्थान की धरती ,
वीरोँ की जहाँ फसल उपजती ,
अभिनंदन करती वीरोँ का . . . .
अभिनंदन करती वीरोँ का . . .
अभिनंदन करती वीरोँ का . . .
जय" यह छोटा सा प्रयास हमारे राजस्थान को समर्पित है . . 16/09/2013
जोगी तेरे जोग ने , यह कैँसा लगाया रोग ।
राजनीति तो सीख गये , सीखन आये थे योग ।।
योग कहाँ रहा , अब राजनीति मेँ छाय ।
योग सीखन जो गया , राजनीतिज्ञ बनकर आय ।।
"जय" 17/09/13