Thursday, 28 November 2013

मेरे जज्बात

उनको सजाना था अपना घर बेशक सजाते ,
मेरा असियाना जलाने की जरुरत क्या थी ।

उनको बहलाना था दिल बेशक बहलाते ,
मेरे जज्बातोँ से खेलने की जरुरत क्या थी ।

हर बार मुझे अपने तीरोँ से घायल किया ,
मार चुके हो तड़पाने की जरुरत क्या थी ।

जब तोड़ ही दिये तूने सारे दिल के रिस्ते ,
फिर जनाजे पर आने की जरुरत क्या थी ।

सिर्फ मौत ही तो मुझसे मिलती रही रोज ,
खुली आंखे बंद करने की जरुरत क्या थी ।

"जय कुमार" 27/11/2013

बेटी बना गुनाह किया रब तूने

कलिया करती अब पुकार ,
हमेँ भी खिलने दिया होता ।
पुष्प बनकर हम भी महकते
हमेँ एक मौका तो दिया होता ।
मिठास से भरे इन फलोँ को
हम भी तो सृजित कर सकते ,
हमेँ अपने जीवन को जीने का
जो वागवां ने हक दिया होता ।

बेटी बना गुनाह किया रब तूने
धरा पर आने का हक दिया होता ।
माँ तड़प उठी हूँ तेरे निर्णय से
मेरा भी मत तो लिया होता ।
मैँ उस कबरिस्तान से सहमू
या जिसमेँ मैँ पलती हूँ उससे ,
साँस लेने से पहले रोक दी गईँ
हमेँ साँस लेने का हक दिया होता ।

"जय कुमार" 27/11/2013

मेरी तन्हाई

कोई समझे ना समझे मेरी
तन्हाई को कोई बात नहीँ ।
कोई समझे ना समझे तेरी
जुदाई को कोई बात नहीँ ।
तूने ही ना समझा मुझको
यह दर्द देता है रहरहकर ,
अब कोई समझे ना समझे
मेरे गम को कोई बात नहीँ।।

आज भी तेरा वो शर्माना
तकलीफ देता है दोस्त ।
तेरा वो अपनापन जताना
तकलीफ देता है दोस्त ।
जब बिछड़े थे हम वो तेरी
आँसुओ से भारी आँखे ,
दूर तलक मुड़कर देखना
तकलीफ देता है दोस्त ।।

कुछ ना कर आज तू बस
मुझे असली चेहरा दिखा दे।
अपने अंदर के वेवफाई के
उस शहजादे से मिला दे ।
योँ तो जिंदगी निकाल लेगेँ
तेरी यादोँ के सहारे हम ,
तसल्ली कर लेगेँ हम भी
बस अपने मुंह से बता दे । ।

"जय कुमार" 26/11/2013

Monday, 25 November 2013

एक बेरोजगार

दर्द कौन समझता है एक बेरोजगार का ।
रोज बाजार सजता है बस भ्रष्टाचार का ।
घोड़ों  को दोड़ने का मौका कहाँ मिलता ,
लोगो को इंतजार है गधों के व्यवहार का।। 

"जय कुमार"

यह जलजला है कैँसा कहाँ जाऊँ

यह जलजला है  कैंसा कहाँ जाऊँ।
तेरे पहलु में लिपटकर छुप जाऊँ।

दर्द ए मुहब्बत की ,,, दास्ताँ है ये ,

महबूब को ढ़ूडकर ,,,,, कैंसे लाऊँ।

उसको पाने की ,, आरजू  हरदम ,
दिल के छालो को में कैसे छुपाऊँ।

बेगार हो गया अब ,,,,,, मेरा शहर ,
एक झलक तेरी झलक कैंसे पाऊँ ।

आसमां पर बिजली जमीं पर कहर ,

दोनों जहां लुटते,,,, अब कहाँ जाऊँ ।

फिर बबंडर उठा है ,,,,, मेरे दिल मेँ ,
जय लगता सारी ,,,, हदें लाँग जाऊँ।

"जय कुमार"25/11/13

अनजान बनते है

कदमो की आहट से जो पहचान लिया करते थे ।

मेरी साँसो की खूशबु को जो जान लिया करते थे ।

अब वो सामने आकर भी अनजान बनते है ,

जो कभी मेरे पास आने का बहाना लिया करते थे ।।

"जय कुमार" 24/11/2013

बात बनती

मेरी ना सही दिल की सुनते तो कोई बात बनती ।
अपनी नहीँ ओरो की बुनते तो कोई सौगात बनती ।
रो रोकर तो जमाना योँ ही चला जा रहा है दोस्तो ,
हँसकर विदा लेते तो फिर कोई नई बात बनती । ।

"जय कुमार" 24/11/2013

अब वोट माँगने आ गये

आज फिर बिजली गिराने वाले ,
अब वोट माँगने आ गये . . .
बिन मौसम के बरसात कर रहे ,
अब मोती चुराने आ गये . . .

सपने विकास के दिखा रहे है वो ,
सफेद पोशाक गुनाह छुपा रहे है वो ,
दिन मेँ ही तारोँ को गिना रहे है वो ,
अब वादे गिनाने आ गये . . .

कुछ दिन का मेला फिर वही झमेला ,
परखना इनने अब कौनसा खेल खेला ,
अबकी बार तुम ना गलती करना ,
ये फिर चोट मारने आ गये . . .

हमारे वोट से होता जीवंत लोकतंत्र ,
कायम रखना है हमेँ सुचारु प्रजातंत्र ,
अपने विवेक का करना है उपयोग ,
ये झूठा राग सुनाने आ गये . . . .

"जय कुमार" 23/11/2013

हम तो नेता है

हम तो नेता है हमारा भरोसा कैँसा . .
आते है सालोँ मेँ हमारा बसेरा कैँसा . . .

रहते कहाँ है हम ईमान के सहारे ,
करते है गोरख धंधे ईमान के सारे ,
बैँचा हो खुदको उसका ईमान कैँसा . .

बंदगी करते है कुर्सी की हर पल,
जुगत लगाते पैसा बने हर पल ,
वोट का नाता है तुमसे रिस्ता कैँसा . . .

एक दिन विधान सभा हम जायेँगे ,
मौका मिला तो मिनिस्टर पद पायेँगे,
मेरा तो सब हो गया फिर डर कैँसा . . .

कुछ खायेँगे कुछ अपनो को खिलायेँगे ,
साथ राम का तो सी एम भी बन जायेँगे ,
खेलता हूँ भावनाओँ से मेरा मजहब कैँसा . . .

"जय कुमार" 23/11/2013

इक रोग

ईमान की लाश लेकर ,
इंसाफ का व्यापार होने लगा . .
सरस्वती के मंदिर मेँ ,
अज्ञान का व्यवहार होने लगा . .

इक रोग है जो हमारी ,
नशोँ मेँ दौड़ रहा है आज
इक राग जो हर बाजे पर ,
बेवजह बज रहा है आज
मेरी मुहब्बत के जनाजे पर ,
वासनाओँ का मेल होने लगा . . .

हर बाजार यहाँ सजा ,
लायक खरीददार चाहिए
हर दुआ कबूल हो जाती ,
माकूल माहौल चाहिए
जिसको ना मिला मौका ,
वह ईमानदार होने लगा . . .

"जय कुमार 22/11/2013

Friday, 22 November 2013

सहारा मिला होता

तेरा ना सही उसका भी ना सही ,
किसी का तो सहारा मिला होता . .

बंजर जमीँ थी फूल कैँसे खिलते ,
कुछ बूँदोँ का सहारा मिला होता . .

हमपर था हक बेशक तुमारा ,
बिगड़े हालात मेँ हक जताया होता . .

मेरी राह के पत्थर इशारा करते थे ,
मंजिल ने भी तो मुझे जताया होता . .

खबर कहाँ थी हमको नेकी बदी की ,
मेरे बागबां ने तो फर्ज निभाया होता . .

रुश्वा कर दिया मुझको आज तुने ,
काश एक प्यार का गीत गाया होता . .

"जय" २१/११/२०१३

मेरे भाव

ईमान की लाश लेकर ,
इंसाफ का व्यापार होने लगा . .
सरस्वती के मंदिर मेँ ,
अज्ञान का व्यवहार होने लगा . .          

इक रोग है जो हमारी ,
नशोँ मेँ दौड़ रहा है आज
इक राग जो हर बाजे पर ,
बेवजह बज रहा है आज
मेरी मुहब्बत के जनाजे पर ,
वासनाओँ का मेल होने लगा . . .

हर बाजार यहाँ सजा ,
लायक खरीददार चाहिए
हर दुआ कबूल हो जाती ,
माकूल माहौल चाहिए
जिसको ना मिला मौका ,
वह ईमानदार होने लगा . . .

"जय कुमार" २२ /११/२०१३

मेरे भाव

हमारी मुहब्बत को कमजोरी ना समझा करो ।
हमारी मुफलिसी को किस्मत ना समझा करो ।
हम हाथ जोड़कर जीते रहे है यहाँ पर हर पल ,
हमारी नम्रता को चापलूसी ना समझा करो ।।
"जय" १८ /११ /२०१३ 

आदमी

ना जाने यह कैँसा है आदमी . .
आशा ये मीठे फलोँ की करता ,
बीज बबूल के बोता है आदमी . .

दूसरोँ को हर वक्त पीड़ित करता ,
अपनो को अपने से पराया करता ,
फिर आशा सुख की करता है आदमी . .

मात पिता की सेवा की नहीँ कभी ,
जीते जी जिन्हे निवाले को तरसाया ,
फिर सालोँ श्राध्द करता है आदमी . .

खुदकी फितरत को ना पड़ता ,
खुदकी हरकतो से ना भिड़ता ,
जहां की फितरत वयां करता है आदमी . .

राम की कहता रावण की सुनता ,
गंगाजल की बातेँ जाम से मिलता,
क्या क्या यहाँ करता है आदमी . .

स्नेह के आंगन मेँ जहरीले बीज ,
करता पार यहाँ ये प्रेम की दहलीज ,
भरोसे की कलियाँ तोड़ता है आदमी . .

सभी के घावोँ पर नमक छिड़कता रहा ,
किसी की मजबूरी पर ना आई दया ,
फिर अपने दर्द मेँ अकेला रोता है आदमी . . .

"जय" 16/11/2013

Saturday, 16 November 2013

MERE BHAV

मन का परिंद्रा छटपटाया है आज ।
कोई ज्योँ भूला याद आया है आज ।
अपने को अपना बनाना सबको आता है ,
गैरो ने अपनापन जताया है आज ।।
"जय" 11/11/13

Sunday, 10 November 2013

मेरे भाव

पी जो तूने शराब शराबी कहेँगे लोग ।
पड़ेगा नवाज तो नवाजी कहेँगेँ लोग ।
आज आ गया तू शराब पीकर मस्जिद ,
बोल बंदे अब तुझे क्या कहेगेँ लोग ।।
"जय" 10/11/13

Saturday, 9 November 2013

माँ को समर्पित

 ८ /११/१३  को  हमारे बड़े भैया श्री MANOJ DIXIT JI 
जयपुर , परमपूज्य माँ स्व श्रीमती सरस्बती देवी 
की पुण्य स्मृति पर मेरे ह्रदय के भाव जो सजल आँखों 
से माँ  के श्री चरणो  को समर्पित किये।

माँ जब जब याद सताती है तुम्हारी . . 
आँखोँ मेँ आँसु दिल मेँ हसरतेँ होती है हमारी . .
एक बार बेटा सुनने को तड़प जाता मन , 
ज्योँ रुक सा जाता है हमारा जीवन , 
जमाने की रंगीनियाँ क्या काम की है हमारी . . . 

अब तेरा बेटा तेरे बिन अधूरा सा है माँ , 
अब तेरा बेटा तेरे बिन टूटा सा है माँ , 
फिर सहला जाओ यह आस है हमारी . . . 

वो चूल्हे की सोंधी रोटी तेरे हांथो की माँ , 
वो झूठी सी झपट तेरी बातों की माँ , 
एक बार फिर मिल जाये दिल कहता है हमारा . . . 

स्कूल से लौटता था राह देखती थी तुम माँ , 
अपने हाथोँ से निवाला खिलाती थी तुम माँ , 
फिर लौट आयेँ मेरे वो दिन आरजू है हमारी . . .  माँ को समर्पित

कई बार अनजाने मेँ मैँने दुखाया दिल तेरा , 
लेकिन हर बार माफ किया माँ तुमने मुझको , 
फिर माँ दूर फलक पर क्योँ किया है बसेरा . . . 

जब जब स्वप्न मेँ आती हो तुम माँ , 
बहुत ही हर्षित कर जाती हो माँ , 
एक बार फिर आ जाओँ यह हसरत है हमारी . . . 

बेशक आप स्वर्ग मेँ हो मेरी माँ , 
पर मेरा स्वर्ग तो तुमारे चरणोँ मेँ है माँ , 
अब तुमारे चरणोँ की रज ही सहारा है हमारा . . 

 "जय" सादर शत् शत् नमन माँ आपको !

बचपन

वो बचपन की गुड़िया दिला दे कोई . . .
वो बचपन की गलियाँ लौटा दे कोई . . .

गाँव मेँ बो दूर तलक भाग कर जाना ,
यारोँ के संग वो अमरुद बेरोँ को खाना ,
वो मेरी रंगीनियाँ लौटा दे कोई . . .

गाँव का बूड़ा बरगद जिसकी छाँव मेँ ,
खेला करता था मेरा मासूम बचपन ,
वो मेरे दादी की कहानी लौटा दे कोई . . .

टीलोँ पर चड़कर वहाँ से खिसकना ,
पेड़ोँ की डालोँ पर वो कूंदकर चढ़ना ,
वो मेरे बचपन के घरोँदे लौटा दे कोई . . .

वो गाय के संग दूर तलक जाना ,
खेतोँ मेँ मटर को चुन चुन खाना ,
वो मेरे मस्ती के दिन लौटा दे कोई . . .

वो कपड़े की गेँद वो गिल्ली डंडा ,
बावड़ी के पानी मेँ कूंदकर उछलना ,
वो मेरे खूबसूरत पल लौटा दे कोई . . .

वो माँ की मीठी फटकार बापु का प्यार ,
दादी की लाठी पर दादू का हँसना ,
वो मेरे दादा दादी लौटा दे कोई . . .

बहिन को चिढ़ाना भैया को छकाना , 
दोस्तोँ के संग स्कूल से घर पर आना ,
वो मेरे अनमोल पल लौटा दे कोई . . .

"जय" 8/11/13

सरकारी बाबु

एक दिन की बात
दो बाबुओँ की मुलाकात
आपस मेँ हाय हेलो हुई
फिर विभागो की गोपनीय बात हुई
नफा नुकसान की बराबर जाँच हुई
अपने अपने दुखड़े सुनाने लगे
एक दूसरे को बनाने लगे
बातोँ बातोँ मेँ बात खुल गई
उनको एक दूसरे की बात मिल गई
रास्ते से हम जा रहे थे
दुखड़ा किसी को सुना रहे थे
बाबुओँ को देख गुस्सा आया
हमने कहा तुमने फिर हमेँ बनाया
हम कार्यालय मेँ बैठे रहे
तुम दोनोँ यहाँ गपोड़े देते रहे
जरा समय पर गौर कीजिए
थोड़ी सी तो शर्म कीजिए
बो बोले क्योँ पागलोँ की तरह चिल्लाते हो
क्योँ रोड पर शोर मचाते हो
अभी एक ही तो बजा है
तुम चलो हम कार्यालय आते है
हमने कहा साहब हम सुबह से आये है
अपना दुखड़ा सबको सुनाये है
आपकी राह देखते रहे कार्यालय मेँ ,
आप अभी तक नहीँ पधारेँ है
बाते बढ़ती गईँ
समय घटता गया
दो बजे फिर लंच हो गया
और हमारा सपना फिर कहीँ खो गया . . .

 "जय" 8/11/2013

Tuesday, 5 November 2013

माँ

माँ वात्सल्य की मूरत है ।
माँ इस जग की सूरत है ।।

माँ भक्ति ईश्वर भक्ति है ।
माँ इस जग की शक्ति है ।।

माँ जग की सृजन कर्ता है ।
माँ जग की पालन कर्ता है ।।

माँ राम , मोहन के साथ है ।
माँ रहीम मसीह के साथ है।।

माँ महीवीर मेँ बसती है ।      

माँ गौतम मेँ भी रहती है ।।

माँ मेरा परिचय दाती है ।
माँ मेरी भाग्य विधाती है ।।

माँ को जीवन अर्पित है ।
माँ से इंसान चर्चित है ।।

माँ चरणोँ मेँ स्वर्ग बसता है।
माँ आँचल मेँ जीवन हँसता है ।।

"जय" शुभ रात्रि मित्रो !  15/10/13


माँ

माँ से ही महानता है ।
माँ से ही समानता है ।।

माँ से ही मृदुलता है ।
माँ से ही सरलता है ।।

माँ से ही जीवटता है ।
मा से ही अमिटता है ।।

माँ से ही मस्जिद है ।
माँ से ही मंदिर है ।।

माँ से ही हमारा जहाँ ।
माँ से ही चमके जहाँ ।।

माँ से ही मुरली आई ।
माँ से ही मिर्दँग सुनाई ।।

माँ से ही राग बनेँ है ।
माँ से ही साज बनेँ है ।।

माँ से ही मुशकान है ।
माँ से ही हर गान है ।।

माँ से ही बनीँ ममता ।
माँ से ही बनीँ समता ।।

माँ से ही आसमान है ।
माँ से ही हर अरमान है ।।

माँ से ही ईश्वर की मूरत ।
माँ से ही जग की सूरत ।।

"जय" 

  17/10/2013

बिटिया

बेटी है बगिया का फूल ।
बेटी है जीवन का मूल ।।

बेटी है अंधेरे मेँ उजाला ।
बेटी है एक प्रेम प्याला ।।

बेटी है मधुवन का राग ।
बेटी है जीवन का जाग ।।

बेटी है रब की इबादत ।
बेटी है जग की इबादत ।।

बेटी है सुवह का सूरज ।
बेटी है ईश्वर की मूरत ।।

बेटी है आँगन की शोभा ।
बेटी है परिवार की आभा ।।

बेटी है दो कुलोँ की आन ।
बेटी है मातपिता का मान ।।

बेटी है हर मुश्किल हल ।
बेटी है समाज का सम्बल।।

"जय"  08/10/13 बिटिया


मेरे भाव

उनके आँसुओँ का सैलाब ,
तेरे शहर को बहा ना दे . . .
उनके दिल का घुमड़ता दर्द ,
तेरी हस्ती को मिटा ना दे . . 
मै सोचता हूँ कभी कभी ,
रब का इंसाफ कहीँ तेरा ,
नामो निशां मिटा ना दे . . .
"जय"    

मेरे भाव

दौलत ना महिल कोठरी , 
मन की श्रध्दा से मोहन , 
दो पुष्प भाव के लाया हूँ . . .
दूध दही ना फल मेँवा ,
गंगाजल मेँ कैँसे लाऊँ ,
आँखन मेँ भक्ति का जल ,
मैँ तुझे चढ़ाने आया हूँ . . . .
"जय"
  06/10/13

आज के रावण


रावण कुम्भकरण के पुतले ,
सदियोँ से जलाये ,
इस दशहरा कुछ बदलना चाहिए . . . .
जिनने किया देश को शर्मसार ,
उन दिल्ली के दरिंद्रोँ के ,
पुतले जलने चाहिए . . . . .
राम का आचरण दुर्लभ ,
रावण के आचरण से भी,
नीचे जा रहा समाज ,
बुराई के प्रतीकोँ को अब , 
बदल देना चाहिए . . . . .
सदियोँ से पड़ी पुराणो पर ,
मैली हो चुकी चादर ,
उस चादर को अब ,
बदल देना चाहिए . . . . . ,
वश्त्र जोगी के पहनेँ ,
भोगोँ मेँ रहे जो लिप्त ,
बेईमान को सम्मान ,
समय बदल गया है अब ,
कुछ परंपराओ को ,
बदल देना चाहिए . . . . .
समाज की बीमारियोँ से ,
मुश्किल हुआ जीवन ,
करनी होगी सफाई ,
क्योँ ना इस बार से अब ,
आगाज कर देना चाहिए . . . 

"जय" 

देवी स्वरुपा नारी

क्यों  फरेब में जीती हो ,
शक्ति हो तुम . . . . . . 
आततायी हो जाये पुरुष, 
तो ज्वाला हो तुम . . . . . .
रक्षक जब लूटे मर्यादा ,
काल बनकर वरष पड़ो ,
महाकाली हो तुम . . . . . . 
लाशो से आशा निरर्थक ,
रक्षा स्वयँ करनी होगी ,
देवी स्वरुपा नारी , 
जगदाती हो तुम . . . . . ..
पुरुषत्हीन समाज हो जाए ,
ज्वाला वनकर दहको ,
कोई नजर बुरी ना होगी , 
यहाँ वीरांगना हो तुम . .. . .
"जय"

 03/10/13


मेरे भाव

जब लगे कुछ हासिल नही ,
दुनिया के रंग पाने के बाद . . 
समझना सुबह हो गई अब ,
एक अंधकारमय रात्रि के बाद . . 
"जय" 
 03/10/2013


जीवन मेँ है रंग निराले


जीवन मेँ है रंग निराले ,
इन रंगोँ मे रंग जाओ रे . . . . .
गम के बादल छट गये ,
अब सुंदर राग सुनाओ रे . . . . .
हम रहते उस धरा पर ,
जिस धरा पर जीवन पलता ,
छोड़कर अपनी नाकामी ,
जीत का जश्न मानाओ रे . . . .
बीत गया जो बीत गया ,
पीछे हुआ जो उसको छोड़ो ,
अब आगेँ बात चलाओ रे . . . .
अपने अंदर खुद झाँके हम ,
क्या सही और क्या गलत ,
ऐसा जीवन बहुत चल गया ,
अब ईमान की बात सुनाओ रे . . . .
इस जीवन की कड़ी परीक्षा ,
हमको आंगे निकलना है ,
कुछ ऐसा अब हम कर जाएँ
फिर अमर पद पाओ रे . . . .
"जय" 

25/09/13

   

फैसन

बिन्ना तोखो देख के ,
लड़कन को बुरो भयो हाल . . . .
तोरो तन कपड़ो मेँ दिखे ,
जो फैसन को कैंसो जाल . . . 
फैसन को जो जाल ,
बुन बुन कर रये घात ,
मुँह खो ढंको ,
तन खो उगेरो ,
जो  जंजाल . . . 
जो कैंसो जंजाल ,
तुम ओमे फँसतई जा रय ,
अपनी साख गमा केँ ,
बुन रय खुद खो जाल . . .
बुन रय खुद खो जाल ,
केँ जो जाल ,
एक दिन बन जाहे काल . . .
एक बन जाहे काल . . .
बन जाहे काल . . .
"जय"  

25/09/13

जीवन

हर दिल में  ,
जीवन की खान है . . .
जहाँ सुगंधित पुष्प ,
हर पल खिलते ,
गाते जीवन गान है . . . 
बस उन पुष्पो को देखो ,
काँटो से तुम्हारा ,
क्या काम है . . . .
क्य़ों भुल जाते हो ,
हमारे अंदर ,
अभी प्राण है . . . .
जहाँ आशा नहीँ ,
वहाँ महफिले भी ,
वीरान है . . . .
जब खुद ही ,
हथियार डाल दो ,
तो वहीँ शमशान है . . . .
मेरे तेरे और उसके ,
सबके अंदर ,
एक ही जान है . . . .
कभी पाँवो को ,
पीछे ना कर ,
हम सबका ,
एक मुकाम है . . . ."जय"  23/09/13


मेरे भाव

जीवन मेँ कुछ लोग ,
अपने योँ बन जाते है ।
हमारे बाग मेँ फूल बनकर ,
खिल जाते है . . .
याद आती है जब ,
वो मीठी सी यादे ,
कभी खुशी ,
कभी आँसु ,
निकल आते है . . . .
दोस्त बनकर आये थे ,
मेरी जिँदगी मेँ तुम ,
भावुक हो जाते है जब ,
भाई बन बिछड़ जाते है . . .
साथ ना रहा पर ,
दिल मेँ समा गये हो ,
जब याद आती है ,
तो अरमान मचल जाते है . . . .
"जय" शुभ संध्या मित्रो !  22/09/13


अपने शब्द

अपने शब्दोँ को इतना कठोर ना कर की , 
वह वाण बन जायेँ । 
अपने को इतना नरम ना करो , 
की वह छुई मुई का पेड़ बन जायेँ . . . . .
आग है तेरे दिल मेँ , मेरे दिल मेँ , 
और उसके दिल मेँ , 
इस आग को योँ ना भड़काओ कि उसमे , 
जलकर राख बन जायेँ . . . . 
स्वर बिखरे पड़े हैँ प्रकृति मेँ , 
उन्हे खोजना है , 
उनको योँ जोड़ेँ , 
कि वह राग बन जायेँ . . . . . 
मुश्किल लाख सही क्या होता है , 
हम रहना सीखले हर हाल मेँ , 
तो फिर हर बात बन जाये . . . . . 
"जय" शुभ संध्या मित्रोँ.  19/09/१३ 



मेरे भाव

सूरज की रोशनी से , 
तारोँ का आस्तित्व खत्म नहीँ होता । , 
तारे तो दिन मेँ भी चमकते हैँ ,
और रात मेँ भी जब सूरज नहीँ होता । । 
"जय"  18/09/2013



 

पाखण्ड

वेरंग कर दिया तूने , 
मेरी जिँदगी को , 
शर्मसार कर दिया तूने , 
मेरी बंदगी को . . . .
भरोसा शब्द से ही डरने लगे , 
अपना अक्श ही डरा जाता है , 
परछाई देख ही सहम जाते हैँ , 
काँटो से भर दिया तूने ,               
मेरी जिंदगी को . . . .
तुम व्यापार धर्म का करते हो , 
ईश्वर का सेवक बनकर के , 
आस्था ने ईश्वर बना डाला तुमे , 
जिसको मैँने पूजा ह्रदय से , 
उसने ही डस लिया , मेरी बंदगी को . . . .
अब भरोसा उठ गया है , 
इन डँकोशली बातोँ से , 
मैँ प्रेरणा बन जाऊँगी , 
इस जमाने की हर बेटी की , 
तुमसा कोई अब पाखंडी , 
अब लूट ना पायेगा , 
मेरी अस्मत को . . . .
"जय" 11/09/2013


क्योँ चिल्लाते रहते हो ,
भोँपू की तरह , 
कभी अपने आप मेँ भी , 
झाँक लिया कर , 
एक वार फिर , 
शून्य मेँ जाकर , 
कभी उससे मिल , 
जिसके लिये तू बना है , 
वहाँ से फिर यात्रा शुरु कर , 
अनन्त की , 
अनन्त की . . .

"जय" 12/09/2013


फाँसी नहीँ सरेआम सजा , अब मिलनी चाहिए । 
सदियोँ से जमीँ हुई बर्फ , अब पिगलनी चाहिए ।। 

"जय" 13/09/13


जिंदगी छोटी है , 
हर बात बड़ी । 
हर मोड़ पर , 
एक बात खड़ी । 
चलना ही इंसा का काम है , 
यहाँ चलता है , 
वह हर घड़ी । । 

"जय". . 13/09/2013


हिन्दी भारत के जीवंत प्राण हैँ ,
हर भारतीय की अमिट पहचान है . . . . 
भारत का ह्रदय हिन्दी की गोद मैँ वसता , 
इसमेँ सब भाषाओँ का रुप पनपता , 
भारत माँ का चंदन बनकर , 
यह तो भारत की शान है . . . .
वह निश्प्राण हो चुके हैँ , 
मुद्रा मेँ जो बिक चुके है , 
मातृ भाषा को छोड़कर , 
जिन्हे विदेशी भाषाओँ पर अभिमान है . . . .
लेँ प्रतिज्ञा इस अवसर पर , 
अब भारत का हर नागरिक , 
हिन्दी को अपना हक दिलवायेगेँ , 
इस भाषा की प्रतिष्ठा को बढ़ायेगेँ , 
यही हिन्दी का सच्चा सम्मान है . . . .

"जय" 
 14/09/2013


जिँदगी क्या है , 
यहाँ कोई कहाँ समजा है . . . 
जिसने जिँदगी को समजा , 
वह इस पर हँसा है . . . . 
कभी सामने गिरती बूँद को देखो , 
क्या हस्र होता है उसका , 
क्योँ गफलत जीता है , 
यहाँ तू जँजीरो मेँ फँसा है . . . .
जीता रहा तू हर वक्त अहम् मेँ , 
वक्त की चाल ना समझा तू , 
जब बक्त खत्म होता रहा , 
तब तू खुद पर रोया है . . . . 
उस बक्त हिसाब किया तूने , 
जब साँसे खत्म हो चली , 
जिँदगी से क्या पाया , 
और क्या खोया है . . . . 
इतिहास गवाह है , 
खोलकर देख ले , 
मगरुर ना हो जीवन मेँ , 
यहाँ सदा कौन रहा है . . . . 

"जय"  15/09/13


चेहरा ही जीवन का , बखान कर जाता है । 
मुझे अपना अक्स ही , परेशान कर जाता है । । 

"जय 15/09/13



यह राजस्थान की भूमि ,
पालन करती वीरोँ का । 
यहाँ पनपती है संस्कृति , 
जो सृजन करती हीरोँ का . . . . . . 
पग पग पर महल कोठरी , 
जन जन मेँ वसी वीरता , 
इतिहास अधूरा हो जायेगा , 
इस भूमि के वीरोँ के बिन , 
मरुभूमि नित वंदन करती वीरोँ का . . . . 
पृथ्वीराज से योध्दाओँ ने , 
इस धरा को खून से सीँचा था , 
राणा साँगा की वो तलवारेँ , 
अमर अमिट जीवन करती , 
लोहा लिया था जिनने , 
अन्याय की जंजीरोँ का . . . . . . . 
उस राजपूतानी पन्ना को , 
इतिहास भुला ना पायेगा , 
जब जब वलिदान की बात आयेगी , 
पन्ना माँ का नाम दुहरायेगा , 
जिसने ममता का गला घोँट , 
सामना किया था , 
वक्त की लकीरोँ का . . . . . . .
महाराणा प्रताप की भुजाओँ ने , 
जब अपनी हिम्मत दिखलाई थी , 
अकबर भी कांप उठा था , 
राज भक्त की भक्ति देख , 
मुगल सेना भी शरमाई थी , 
झुकना जिसने उचित ना समझा , 
वन वन घूमे , भेष रखा फकीरोँ का . . . . . 
यह राजस्थान की धरती , 
वीरोँ की जहाँ फसल उपजती , 
अभिनंदन करती वीरोँ का . . . .
अभिनंदन करती वीरोँ का . . .
अभिनंदन करती वीरोँ का . . . 

जय" यह छोटा सा प्रयास हमारे राजस्थान को समर्पित है . .  16/09/2013



जोगी तेरे जोग ने , यह कैँसा लगाया रोग । 
राजनीति तो सीख गये , सीखन आये थे योग ।। 
योग कहाँ रहा , अब राजनीति मेँ छाय । 
योग सीखन जो गया , राजनीतिज्ञ बनकर आय ।। 

"जय" 17/09/13



मेरे भाव

 मेरे भाव 


जोगी उतर गया , 
अब तेरा जोग ।  
शर्मिँदा आज संत , 
देखकर तेरा भोग ।। 

"जय" 31 /08/2013









वतन की शान


वतन की शान शौकत ,
कम होने ना देँगे । 
दुश्मनो को देश के , 
आँगे होने ना देँगे . . .
जहर देश की फिजाओँ मैँ , 
तुम घोल ना पाओगे , 
नफरत के बीजो को , 
अंकुरित होने ना देँगे . . . 
मुशकिले आये चाहे आये तूफान , 
अपने वतन के पत्तोँ को , 
हिलने ना देँगे . . . 
मुश्किल से सँभाला है , 
हमने चैनो अमन को , 
योँ खाक मैँ मिलने ना देँगे . . . 
दुश्मनी बैठा रखी है , 
तुने अपने दिल मैँ , 
क्योँ बार पीछे से करता ? 
हम अपने वीरो को , 
योँ शहीद होने ना देँगे....... "जय"


 

मेरे भाव

 जोगी भोगोँ मेँ फँसे , 
करते काले काम । 
अब किसको झूठा कहेँ , 
बताओ आसाराम . . . 
सारा जग शर्मिँदा है , 
सुनकर तुमरे काम । 
कैसेँ समझा सकेँ , मेरे भाव 
समझाओ आसाराम . . . 
वासनाओँ मेँ पड़कर , 
भूल गये तुम श्याम । 
विट्ठल्ला अब पूँछ रहे , 
बताओ आसाराम . . .
अपने ओछे काम से , 
तुम धर्म करो बदनाम । 
आज सब पूँछ रहे , 
सुनाओ आसाराम . . .
यह किसके है आश्रम , 
इनमेँ किसका दाम । 
पूँछे अब भक्त तुमारे  
समझाओ आसाराम . . . . . 
"जय" २/०९/१३ 


 

मेरे भाव

 ख्यालात को भी अपने , 
महफूज रखो , 
इस जमाने मेँ , 
क्या नही लुटता दोस्त ? . . .
"जय" ०३/०९/१३ 

मंदिर मस्जिद् बहुत वन गये , 
अब मानवता का एक घर , 
बनाना होगा . . . . 
जिसमेँ ना रह पाये कोई धर्म , 
इसमेँ सिर्फ मानव को , 
रहना होगा . . . . 
मिट जाएँ सब भेद भाव , 
जात क्षैत्र का भाव मिटे , 
ऊँच नीच की बात ना होवे , 
रंग रुप का भेद मिटे , 
ऐँसा एक दीपक , 
जलाना होगा . . . . 
"जय" ०५/०९/१३


 

मेरे भाव

अँधेरा होने से पहले , 
ज्ञान का दीपक जला लेना । 
वक्त रहते अपने आप से , 
मुलाकात कर लेना . . . .
मुशकिल से मिला है , 
कुछ करने का मौका , 
अपनी हिम्मत को , 
एक बार अजमा लेना . . . . .
तन मन की हैँ भ्राँतियाँ , 
असफल सफल के सवाल , 
साँस रहते हुए , 
मैँ और मुझमैँ के , 
अंतर को पहचान लेना . . . 
"जय"०६/०६/१३ 







मेरे भाव


एक दिन कुछ ऐसा हुआ , 
मैँने अपने मन को छुआ । 
मन कहने लगा तुम क्योँ , 
दौर के साथ नही चलते , 
योँ ख्वाबो की दुनिया , 
मैँ क्योँ मचलते । 
यहाँ सब ऐसा ही चलता है , 
बच्चा शेर का , 
कुत्तो के पास पलता है । 
मँदिर मेँ आ गये तो , 
प्रसाद तो चढ़ाना ही होगा , 
यहाँ के भगवान अब मँदिरोँ मेँ कम , 
कार्यालय मेँ ज्यादा वसते है , 
मुराद पूरी करना है , 
मेँवा तो चढ़ाने ही होगेँ । 
मैँने भी जवाब दे दिया , 
और उससे साफ कह दिया । 
हमारे ख्वाबो मेँ भविष्य छिपा है , 
हमने अपनी किस्मत को खुद लिखा है । 
कहदो अपने काजगो के देवताओ से , 
अब दौर बदलने वाला है , 
अपना ईमान बदलले , 
रात के पहर खत्म हुए , 
अब आशाओ का सूरज उगने वाला है . . . 
"जय" ०७ /०९ /१३




मेरे भाव

 आसाराम के काम पर , 
हंसते आज महंत । 
कुछ की बाते छिपी पड़ी , 
वो आज भी संत . . . 
जिनकी बाते निकल पड़ी , 
वो बहरुपिया , 
सफेद कपड़ोँ के तले , 
कुछ करते काले काम , 
ऐँसे और भी होँगे संत . . . .
लोगोँ का भरोशा उठा , 
क्योँ तुले हो आस्था का , 
करने को तुम अंत . . . .
हमेँ धर्म के ठेकेदारो से , 
धर्म मुक्त करना होगा , 
हम अपनी संस्कृति को , 
बदनाम ना होने देँगे , 
जिसका कोई आदि ना अंत . . . 
"जय" ११ /०९ /०३