Wednesday, 23 December 2020

साँझ ना देखी जिसने 
वो भोर को क्या जाने 
पतझड़ ना देखा जिसने 
वो बसंत को कैंसे माने 
   
सुख दुख की छाँव धूप 
रात दिन का जोड़ा खूब  
श्याम श्वेत के रंग निराले 
जो जीवन के रंग ना जाने 
वो जीवन को कैंसे माने 
   
अंधेरो की राह जब तक 
रोशनी की महफिल तब तक 
कुछ अच्छा कुछ बुरा यहाँ 
जो असत्य को ना पहचाने
वो सत्य को कैसे माने 
  
ऊपर नीचे धरती आकाश 
आंगे पीछे और दूर पास 
ज्ञान अज्ञान साथ रहते 
अपनी अपनी भाषा कहते  
जिसे निशा का आभाष नहीँ 
वह दिन को कैंसे माने 
  
"जय कुमार"

Monday, 14 December 2020

झूठ बिक जाता है अक्सर  हाट की शुरुवात होते ही
सच तरसता रहता है अक्सर दिन ढलते रात होते ही
बेंचकर जमीर कोई मुकम्मल कहां होता है
टूटकर बिखरना कबूल करते जमीर की बात होते ही

"जय कुमार" 

Saturday, 12 December 2020

बिन चाही राहो पर चलते गये

बिन   चाही   राहों  पर  चलते  रहे
ख्वाबों  से  दूर  हम  निकलते  रहे
कद्र  वक्त  की  कब  की  है  हमने 
हम खुदको खुद ही क्यों छलते रहे

"जय कुमार "