आओ प्रिये फिरसे सावन आ गया परदेश से अब घर साजन आ गया रिमझिम बारिश ने आग लगाई जो मिलने का मौसम मन भावन आ गया
"जय कुमार "
चमन की फिजाओं में अमन करना होगा अमन के पैगामों से अब गगन भरना होगा मजहबी नफरत न पले किसी के भी दिल में ईद व दिवाली का अब मिलन करना होगा
इक बूढ़ा बचपन में मर गया कम समय में बहुत कुछ कर गया चलता रहा बर्षो सोते हुए आंखें खुलते ही वह तर गया
"जय कुमार"
कदम बढे की कायनात साथ देने लगे उलझी हयात को मुकम्मल बात देने लगे नियत नेक हो जब तमन्नाओं की चाहत में फरिश्ते फलक उस पार से हाथ देने लगे
"जय कुमार "08/07/2018
कलम जब सियासत का नमक खाने लगे अपने आकाओं का गुणगान गाने लगे समझना उस देश के सब टूटे आईने लोग दुश्मन को मेहमान बनाने लगे
"जय कुमार"02/07/18
कटी पतंग का ठिकाना क्या होगा तुमारे बिन यह जमाना क्या होगा बिन बाती तेल का चिराग बन गया उस शख्स का अफसाना क्या होगा
"जय कुमार "१/७/१८