Wednesday, 23 November 2016

आज सारे देश में एक ही बहस चल रही है कि नोट बंदी सही है या गलत ?

प्रश्न भी बाजिब है , लेकिन किसी नतीजे तक पुहुँचना जल्दबाजी हो सकती है |

किसी भी बदलाव के परिणाम त्वरित नहीं आ सकते , यह एक व्यापक प्रक्रिया होती है |
अभी से सही गलत का निर्णय उचित नहीं ||

हमारे अतीत से एक घटना लेकर अपनी बात रखना चाहता हूँ , सन १९९१ में व्यापक आर्थिक नीतियों में बदलाव व सुधार किये गये वैश्वीकरण, निजिकरण तथा उदारीकरण की नीति अपनाई गई |

तत्कालिक वित्तमंत्री तथा पूर्व गवर्नर रह चुके माननीय मनमोहन सिंह जी ने जब नई आर्थिक नीति की घोषणा की तो विरोधी दलों ने घोर विरोध किया तथा दुष्प्रचार किया गया |

लेकिन धीरे धीरे देश विकास के पथ पर चलने लगा | सन ८० के दशक में देश की विकास दर १.४९ थी वो २००१ आते आते ६.७८ तक पुहुँच गई |

इस विकास दर ने अभूतपूर्व बढत लेते हुए सन २००५ से २००८ तक लगातार तीन बर्ष ९ प्रतिशत विकास दर प्राप्त की |
२०१५ - १६ में यह विकास दर ७.६ है |

अब बात करते है नोट बंदी का फैसला सही है या गलत है इस बात का फैसला भविष्य के गर्व में छुपा है |

कुछ बाते है जो जरूर परेशान कर रहीं है |
आज भी ७० फीसदी से ज्यादा जनसंख्या ग्रामीण है |

क्या सभी ग्रामीण लोगों तक बैंकिंग सुविधा उप्लब्द है ?

क्या सभी ग्रामीण बैंकिग सुविधा का उपयोग करते है ?

क्या पूरा देश एजूकेटेड है ?

क्या सभी एजूकेट परसन इस लायक है कि वह करेंसी लेस व्वहार कर सके ?

क्या सरकार का सर्वे सिर्प उनके कुछ अनुआयी लोगो का सर्वे नही ?

क्या सारा मीडिया सिर्फ शहरो तक सीमित नहीं सिर्फ उनकी ही समस्याओं को दिखा व लिख रहा है ?

क्या गांव के लोगो की परेशानियों का ख्याल रखा गया ?

क्या कुछ असामाजिक लोग गांव के सीधे लोगों के धन का गलत उपयोग नही कर रहे ?
क्या गरीब आदमी की पूंजी का कहीं भी गलत उपयोग नहीं हुआ ?

क्या मध्यम वर्ग व गरीब आदमी ही हर बार की तरह पिस रहा है ?

क्या रोज ८० हजार करोड़ का व्यापार में जो नुकसान हो रहा है जो ४० लाख करोड तक के नुसान पर पुहुँच गया है आगे कितना नुकसान और होगा , उससे कहीं ज्यादा काला धन है ?

अगर सरकार ने काला धन खत्म भी कर दिया तो जब तक आर्थिक नुकसान ज्यादा हो चुका होगा |

क्या डुप्लीकेट करेंसी पर लगाम लग जायेगी ?
क्या आतंकवाद खत्म हो जायेगा ?

क्या देश कागजों व सोशल मीडिया पर बन रहा है ?

क्या हमारा पूरा देश करेंसी लेस व्यापार के लिए तैयार है ?

"जय कुमार "

आप सब अपनी राय जरूर व्यक्त करें !!

Saturday, 12 November 2016

राष्ट  हित में लड़त  रहे  , हम है उसके साथ !
नाहीं  है  हम  कमल  के , नाही  अपना   हाथ !!

"जय कुमार "

तमन्नायें खौफजदा  हो  गई
मुहब्बत की तासीर देखकर

उनको व्यथा सुनाइये , जिनको दिल से प्यार |
पीछे   तेरे   जो   हंसे  ,  वह   काहे  का   यार ||

"जय कुमार "

कड़वी बोली बोल के , आफत  लेते मोल |
मीठे  शब्दों  से भरा , मनके फाटक खोल ||

"जय कुमार "

Thursday, 10 November 2016

मेरी पीड़ा

गांव कि गलियां , भुला न   पाये |
शहर से  नजरे ,  लड़ा  न  पाये ||

सुलह करते है  , रोज रोज हम |
दिन को रात से , मिला  न पाये ||

खुशबू   अपनेपन   की   हममें |
कागजी  फूल , खिला  न  पाये ||

खरे  सोने  से  ,  मिलते   रहते |
खोटे   सिक्के ,  चला  न  पाये ||

निकल   गये   राहों  पर   ऐंसी |
गांव कि गोद में , सुला न  पाये ||

चकाचौंद  की  , गली  में  भूले |
अम्मा कि रोटी, खिला न पाये ||

जबसे छोड़कर , आये कुटिया |
सुकूं को खुदसे , मिला न पाये ||

"जय कुमार "

Saturday, 5 November 2016

गम के चंगुल कल थे ।
दर्द के सैकड़ो बल थे ।
जलकर राख हुए जो ,
खुशी के चार पल थे ।

"जय कुमार"6/11/14

टुकड़ो  पर  जीने से मर  जाना  अच्छा है |
जिल्लत के महलों से घर जाना अच्छा है |
जीना मौत  से  बत्तर  मत  बनाना  यारों ,
मौत से पहले खुदको अजमाना अच्छा है ||

"जय कुमार "

Thursday, 3 November 2016

नेनी  कल  बाजार  में , फिरती  रही  उदास |
बदी अब बनने लगी , सबकी खासम खास ||

"जय कुमार "

Tuesday, 1 November 2016

गधे को कुर्सी मिली , उल्लू को सम्मान |
कौआ गीत सुना रहे , देख रहे यजमान ||

"जय कुमार"

उल्लू  कुर्सी पर  चड़ा ,  सबको  रहा  चिड़ाय |
हमको जब पद  दे  दिया , अब  काहे पछताय ||

"जय कुमार "

काटे  नाहीं   कटत   है , बोये  करमन  बीज |
हमने खुद ही रच लिया , अच्छा बुरा नसीब ||

"जय कुमार "