Tuesday, 28 March 2017

मनोहर  थारी मुरली मीठा  राग सुनाये ।
मोहन मारो मन तोहे देख देख मुस्काये ।
थारी  दीवानी  मैं  हो  गई  कान्हा  मोरे ,
मनमोहन  थारी मूरत  मनईं  में  वसाये ।।

"जय कुमार"

Tuesday, 21 March 2017

पत्थरों पर उसका नाम न लिख
सदियों का प्रेम बदनाम न लिख

दिल का दर्द बयाँ करने के लिए
शौक तेरा उसका जाम न लिख

मंजिल है तेरी तारों के उस पार
सफर में अपने ,,आराम न लिख

कुदरत से पाया ,,,अदा कर उसे
जिंदगी में अपनी हराम न लिख

शब्दों को जोड़ता ,,,,,जय नादान
दिल को न लगे ,,कलाम न लिख

"जय कुमार"

Tuesday, 14 March 2017

सुख  में   तेरे  साथ  चले  थे ,
दुख  में  सारे  मुह  मोड़  गये !
अपने  बनकर   रहने    वाले ,
दिल को तेरे  अब  तोड़  गये !
आया  मौसम   गर्मी  का जब ,
तेरा  घर   उसको  ना  भाया !
इक पल में तुझको छोड़ गये !!

"जय कुमार"

Saturday, 11 March 2017

तीली इसकी  हो या  उसकी हो ,
घर तो अपना ही जलता रहा है !
चोट सिर पर  लगे या छाती पर ,
लहु अपना ही निकलता रहा है !
राम  न  बदले   रहीम  न  बदले ,
गीता और  कुरान  भी  न बदले !
इंसान  बदलने   का  सिलसिला ,
यहां  सदियों  से  चलता  रहा है !!

"जय कुमार"


तेरा   यह  आसियाना  है  जो
फूलों  से घिरा ठिकाना  है जो
खूबसूरत   जमाने   के  सपने
फँसा   इसमें   दीवाना  है  जो

मिलकियत तेरी बस  पानी है
एक दिन तो इसे  बह जानी है
सोहरत में डूब  गया इतना तू
यह पल दो पल की कहानी है

जाति  धर्म  के  फंदो  में  फँसा
रंग   रूप  के   कुंदो   में  फँसा
इस  तन  की  विसात  क्या है
चार  दिन  के  चिन्हो  में फँसा

रजनी  भोर   की   निशानी है
भोर  रजनी   की   कहानी  है
दोपहर  के  सूरज की रोशनी
संध्या   आने   पर    पुरानी है

"जय कुमार"01-08-14

Tuesday, 7 March 2017

चलो फिर हम

चलो  मिल बैठकर हम बात करते है |
पहली  सी  इक  मुलाकात  करते  है |
बहुत हो चुका  गलतफहमी का  दौर ,
चलो फिर इक नई शुरूवात करते है ||

तूफानों  का   मौसम  हम  भुला  देंगे |
प्रीत को  प्रीत से फिर हम मिला देंगें |
वागवान बन जायेगें अब जिंदगी  के ,
जिंदगी  में  नये हम फूल खिला  देंगे ||

"जय कुमार "

Sunday, 5 March 2017

आंख से आंसु  निकलता क्यों है
दिल  में  दर्द  ये   पलता  क्यों  है

कसमें   वादों   का  मौसम    तेरा
वक्त के  साथ  बदलता   क्यों  है

बन   गया  पत्थर  दिल  हरजाई
आज  मोम  सा  पिगलता क्यों है

मुझसे  जब   ताल्लुक   ही  नहीं
मेरी  गलि   से  गुजरता  क्यों  है

कल खाख में जब  मिलना तय है
मन  बंदर   सा  उछलता   क्यों है

जय कुमार


Wednesday, 1 March 2017

निशा ने , नितदिन , निशान भोर के छोड़े होंगे ।
असत्य ने , अतिकर , सत्य के बीज छोड़े होंगे ।
अपने ह्दय में रख , अटल  विश्वास  मानव  तू ,
प्रश्न ने स्वयं ही , प्रकृति  में  उत्तर  छोड़े  होंगे ।।

"जय कुमार"

मैं  गधा हूं  गधा  ही  रहने  दे
सभी का बोझ लेकर चलने दे
सियासत में मत लेजाओ मुझे
काम  कर्म  काम मुझे करने दे

जय कुमार