मनोहर थारी मुरली मीठा राग सुनाये ।
मोहन मारो मन तोहे देख देख मुस्काये ।
थारी दीवानी मैं हो गई कान्हा मोरे ,
मनमोहन थारी मूरत मनईं में वसाये ।।
"जय कुमार"
तेरा यह आसियाना है जो
फूलों से घिरा ठिकाना है जो
खूबसूरत जमाने के सपने
फँसा इसमें दीवाना है जो
मिलकियत तेरी बस पानी है
एक दिन तो इसे बह जानी है
सोहरत में डूब गया इतना तू
यह पल दो पल की कहानी है
जाति धर्म के फंदो में फँसा
रंग रूप के कुंदो में फँसा
इस तन की विसात क्या है
चार दिन के चिन्हो में फँसा
रजनी भोर की निशानी है
भोर रजनी की कहानी है
दोपहर के सूरज की रोशनी
संध्या आने पर पुरानी है
"जय कुमार"01-08-14
चलो मिल बैठकर हम बात करते है |
पहली सी इक मुलाकात करते है |
बहुत हो चुका गलतफहमी का दौर ,
चलो फिर इक नई शुरूवात करते है ||
तूफानों का मौसम हम भुला देंगे |
प्रीत को प्रीत से फिर हम मिला देंगें |
वागवान बन जायेगें अब जिंदगी के ,
जिंदगी में नये हम फूल खिला देंगे ||
"जय कुमार "