ठोकर खाकर भी संभल जाते है
अंधेरी राहों से निकल जाते है
उनका वक्त भी कुछ नहीं बिगाडता
जो वक्त के साथ संभल जाते है
"जय कुमार "
चल निकल भी जा मानव अँधेरों से ,
उजाले को तेरा ही इंतजार है |
नाकामी की जंजीरों को तोड़ अब ,
कामयाबी को तुझसे ही प्यार है |
अपने बनाए जाल में फँसा रहा ,
दुनिया के छोर दूर तलक फैले हैं ,
नाव को मोड़ धारा के विपरीत ,
तेरी मंजिल सितारों के पार है |
निगाहों के धोखे से निकल के अब ,
अपने आप की भी आवाज सुन ले |
जमाने को जो कहना है कहने दे ,
अपने आपके एहसासों को चुन ले |
कथनी करनी एक नहीं होती हो ,
कुछ पहचानने की जरूरत लगती ,
तेरे अंदर शक्ति का समुंदर है ,
अपनी भूली क्षमताओं को गुन ले |
भ्रम कोई न पाल अपने जहन मैं ,
मानव हो तुमे अमर पद पाना है |
साँसे चलती ये तन जीवित रहता ,
तब तलक यही तेरा ठिकाना है |
किसी मकसद से यहाँ आया है तू ,
उसको ही दिलेरी से निभा लेना ,
मिला जो एक सफर पूरा करके ,
फिर एक नये सफर पर जाना है ||
"जय कुमार"
चल चला चल चाल बदल ले
उठ जाग अब हाल बदल ले
मंजिल तेरी रास्ता है तेरा
चल पंक्षी अब डाल बदल ले
कल की कल पर रहने भी दे
दुनिया को कुछ कहने भी दे
इस पल की खुशी में जीले
बंदे अपना आज बदल ले
जीवन जीना सीख न पाये
हरदम खुशियां भीख में पाये
विन स्वर बाजे खूब बजाये
चल प्यारे अब ताल बदल ले
मेरा तेरा करते करते
बडी तिजोरी भरते भरते
कब काल के मुंह में पुँहचे
अब तू अपना काल बदल ले
बैठ नाव मैं छेद किये क्यों
ऊँच नीच के भेद किये क्यों
खुद फंसने को बुनते रहे जो
वह अपना अब जाल बदल ले
"जय कुमार"१७/०७/१७