अपनी चौखट कर लई , हमने फिर उजयार |
उनके दीपक भी जले , जिनके घर तिरपार ||
"जय कुमार "
आज दिवारी के दिना , राम राम कर लेत |
गौर साब की धरा से , जय शुभकामना देत ||
नमन जवानों को करें , भारत मां के लाल |
सीना ताने जब चले , डरता है फिर काल ||
नमन जवानों को करें , लड़े हमारी जंग |
रंगों को सब छोड़ के , खाकी जिनके संग ||
मौसम में ठंडी घुली , बोनी को भव टेम |
किसान खुश होने लगे, भरे देख रय डेम ||
कोयल मीठे बोल से , सबको रही रिझाय |
मोर मोरनी खेत में , देखत मन मुस्काय ||
अपने दुख सब भूल के , औरन का दे संग |
सारे रंगों में भला , केसरिया इक रंग ||
"जय कुमार"
समस्त सम्मानीय मित्रों को दीपावली की सपरिवार हार्दिक शुभकामनायें व बधाईयां !!
मित्रों
हमने पिछले १८ साल से पटाके नहीं फोड़े लेकिन हमारी अगली पीढ़ी के जो बच्चे है उनको हम एकाएक प्रतिबंद नहीं लगा सकते फिर भी
यह विडियो हमने अपने बच्चो को दिखाये तो वह बोले चाचा हमे इस बार पटाके नहीं चाहिए हम हमे बहुत खुशी हुई १२ साल का बच्चा समझ सकता है ,,,, लेकिन दुख तब होता है जब वो लोग जिनके बच्चे बड़े बड़े हो गये वह पटाके फोड़ते है ,,, !!
बीते हुए लम्हों की याद सताती रही |
गांव की वो गलियां रोज बुलाती रही ||
शहर में वेहयाई कि इंतिहां से मिले ,
पनघट की हमको गोरी रिझाती रही |
बूढे बरगद की छाया से ठंडक मिले ,
वो बापू की लकड़ी याद दिलाती रही |
ख्वाबों के शहरों से हम आकर मिले ,
मिट्टी के रिश्तों की बात जाती रही |
तंग गलियां संग दिल लोगों कि दुनिया ,
संस्कारों को जय दीमक सी खाती रही ||
"जय कुमार"२०/१०/१६
शहरों के सन्नाटे से जब , कोई पीर निकलती है |
भाव हिलोरे तब लेते है , मेरी कलम उबलती है ||
आह मुफलिसी की कांनों में , जब उत्पात मचाती है ,
जज्बातों की गहराई से , कोई नज्म निकलती है |
रोशनी में नहाया जब है , शहरों का कोना कोना
जहीं उजाला नहीं पुहुँचता ,वहां मुफलिसी पलती है |
कारोबार के कौशलों से ,विकसित हुआ समाज है ,
उँची इमारत के साये में , बैठी भूख मचलती है |
यारी हुई थी कल भूख की , राह पड़े कुछ टुकड़ो से ,
यार आज वेवफा हुआ है , यारी रोज न चलती है ||
"जय कुमार"18|10|16