Thursday, 25 November 2021

जिंदगी  क्या  कटी  पतंग  बनकर रह गई 
सांसों  की  गली  क्यों तंग बनकर रह गई
जो  वादे  किये  थे  खुदसे   नाकाफी  रहे
हर कदम क्या मंजिल ज॔ग बनकर रह गई 

"जय कुमार "25/11/21

Tuesday, 16 November 2021

उनको  हमसे कोई अब  गिला नहीं रहा 
मुहब्बत  का  कोई अब सिला नहीं रहा

ऐसे  गुजरते  हैं  अनजान  बनकर  रोज
क्या मेरी  सांसों में कभी  घुला नहीं  रहा

जिस्म दिल का क्या, रूह में बसा रखा है
चाहत  के  बाग में  बबूल  उगा नहीं रहा 

पागल कहते हैं वो महफिल में आजकल 
क्या दूध में जहर तू अब  मिला नहीं रहा

आज ही तो  कफन के  साये  में आया हूं
आवाज तो दे, सोता है  जय तू जगा नहीं 

"जय कुमार "16/11/21




 













Thursday, 19 August 2021

अपने

अपने ही दिल में आग लगा जलता क्यों है ।
गिराकर  बार बार खुदको संभलता क्यों है । 
बैठा  रहा  जिस डाल पर काटता उसी को ,
मशल के  जज्वात  अपने  मचलता क्यों है ।।

"जय कुमार"

Saturday, 17 July 2021

मौत वेवजह

मौत  तो  वेवजह  ही  बदनाम  है
शिकायत तो जिन्दगी से तमाम है

गम बहुत हैं खुशी का  इल्जाम है

Wednesday, 7 July 2021

हर दर्द की जमाने में कहां दवा मिलती है
यार  के  जैसे  कहां  कोई अदा मिलती है
मुद्दते बीत गई झुर्रियों का बसेरा चेहरे पर 
मेरे जह्न से  उसकी  याद  जुदा नहीं होती 

"जय कुमार "

Friday, 28 May 2021

उसने  इंसान  बनाया है  यह  सम्मान की निशानी है
अकड़ रहा जिस तन पर वो चंद लम्हों की कहानी है
मिट्टी  का  मिट्टी  में   एक   दिन  सब मिल  जाना है
मौत  ही  बस  मुकम्मल  है  बाकी  तो  सब फानी है

"जय कुमार" 

Friday, 7 May 2021

लाश

उनकी इक फाइल में बदनाम की तरह हूं
जमाने  के  लिए अब बेनाम  की तरह हूं
लाश हूं  ये  शमशान  नाम दो हमको भी
आंकडों  के खेल  में गुमनाम की तरह हूं

"जय कुमार "


Saturday, 17 April 2021

मौके बहुत मिले।

मौका था 22 मार्च 2020 जब देश में जनता कर्फ्यू की घोषणा की गई फिर देशव्यापी तालाबंदी, मौका था हमारे पास और हमारी सरकारों के पास व्यवस्थाओं को दुरुश्त करने के लिए, मौका था महामारी की चपेट में आने पर कैंसे निपटा जाए इसके मजबूत प्रबंधन करने का। मौका था देश की जनता अपनी सरकारों से स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल करती, स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे को मजबूत करवाती। 
देश में महामारी का दूसरा दौर, मौत का कहर बरपा रहा दवाखानों की कमर टूट रही है लोंगों को पलंग उपलब्द नहीं हो पा रहे हैं।, जो पलंग पर हैं उनको दवा नहीं मिल पा रही है आक्सीजन के बिना लोग तडप तड़प कर जान खो रहे हैं। अपनों को जो खो रहे हैं उनकी पीड़ा समझ पाना संभव नहीं है। 
लोग सरकारों को कोस रहे हैं सरकारें आंकड़ों में उलझी हुई हैं आंकड़े अपनी कहानी सुना रहे हैं हकीकत अपना दर्द दिखा रही हैं। 
हम सरकारों को क्यों कोस रहे हैं, हमने अपना अमूल्य मत किस मुद्दे पर किस प्रत्यासी को दिया यह सवाल खुदसे करना होगा। हमने शिक्षा, स्वास्थ्य की मांग की ही कब है। हम पाकिस्तान, कश्मीर, हिंदू मुस्लिम, अगडा- पिछडा, रंग जाति, भाषा, कर्ज माफी, बिजली फ्री आदि बातों पर वोट करते रहे। प्रतिनिधि चुनते रहे, सरकारें बनाते रहे । 
मार्च 2020 में प्रकृति ने हमें संभलने का मौका दिया, हम कितना संभले ?  एक साल में कितने चुनाव हुए हमने स्वास्थ्य सेवाओं की बात की ? 
हमें अपने प्रतिनिधियों से सरकारों से उम्मीँद वही रखनी चाहिए जिसके लिए हम चुनते है, वह सब कर रहीं हैं। 
अपने आंसुओं को मजबूरी को व्यर्थ मत जाने देना कल फिर यह हमारे पास आयेगें, वोट मांगेगें । 

"जय कुमार "17/04/21