Tuesday, 31 December 2024

कबीलों से निकलकर हम

कबीलों  से निकलकर  हम क़ाबिल बने हैं 
ऐसे  ही  नहीं  जमाने  के  फ़ाजिल  बनें है

बिखरते अरमानों, चेहरों की उदासियां पड़ 
तूफानों  से लड़कर  ही हम साहिल  बनें हैं 

"जय कुमार "






 
साल  दर  साल यूं  ही  जाते  रहे 
उसके रिश्ते को  हम  निभाते रहे 

इस  तरह से मुहब्बत निभाई गई 
हम  याद  करते, वो  भुलाते   रहे 

"जय कुमार "३१/१२/२०२४

Wednesday, 18 December 2024

जमाने   पुराने   हम   भुला   न  पाये
बिछड़े  हुओं  को  फिर  मिला न पाये 

सोते  थे सर रख कर  उसकी  गोद में
वैसा कभी खुद को फिर सुला न पाये 

छोड़  गया  हर  मौसम  को वह तन्हा 
वफ़ा का हम ज़िन्दगी  सिला  न पाये 

जला  गया  हर ख्वाब  को  मेरे  कोई 
जिसके  लिए ज़हन में  गिला न  पाये

दिल को कचोटता  रहा  जो  हर  दिन
बेहयाई पे जिसकी अश्क बहा न पाये

रक़ीब  से मिलकर  साजिशें करते रहे
ख़िलाफ़त में उनके जुवां हिला न पाये 

 "जय कुमार "