चल निकल जा अब अँधेरों से ,
उजालों को तेरा ही इंतजार है ।
नाकामी की जंजीरो को तोड़ दे ,
कामयाबी को तुझसे ही प्यार है ।
अपने बनाए जाल में फँसा तू ,
दुनिया के छोर बहुत दूर तलक ,
नाव को मोड़ धारा के विपरीत ,
तेरी मंजिल सितारों के उस पार है ।
निगाहों के धोखे से निकल के अब ,
दिल की आवाज भी तु सुन ले ।
जमाने की बातों के डर को छोड़ ,
सिर्फ अपने एहसासों को बुन ले ।
किसी की कथनी करनी ना होती
किसी के मत को बदल ना सकते ,
अंदर शक्ति का समुंदर भरा पड़ा ,
अपनी भूली क्षमताओं को गुन ले ।
किसी भ्रम में ना रहना अब तुम ,
मानव हो तुझे अमर पद पाना है ।
जब तक साँसे चलती तन जीवित ,
तब तक बस यही तेरा ठिकाना है ।
किसी मकसद से यहाँ आये हो तुम
उसको ही दिलेरी से निभाकर के
मिला है एक सफर पूरा कर लो ,
फिर एक नये सफर पर जाना है ।
"जय कुमार"22/07/14