Friday, 25 July 2014

दबे जज्वातों

दबे जज्वातों की यूँ
हिफाजत ना कर ।
बिखर जाने दे छिपाने की
हिमाकत ना कर ।
बहा दे दरिया गम का
समुंदर से जा मिले ,
आँखों में बसे आँसुयों को
हिरासत ना कर ।

"जय कुमार"24/07/14

भारत माता

भारत माता के चरणों में ,
तन था आजाद का ।
कण कण भारत भूमि का ,
मन था आजाद का ।
काल भी डर जाता
विकराल भी हिल जाता
महाकाल सा निडर ,
जीवन था आजाद का ।

माँ भारती समर्पित हर ,
पल था आजाद का ।
वीर महावीर सा ही ,
बल था आजाद का ।
कोई ना रोक पाया इन्हे
वक्त को पीछे कर ,
समय से आगे आज और ,
कल था आजाद का ।

महान क्राँतिकारी के चरणों में
शत शत नमन . . . .

"जय कुमार" 23/07/14

हिफाजत के

हिफाजत के दानवो से देश
हैरान हो गया ।
देखके दरिन्द्रगी जिंदा भी
मौन हो गया ।
रहम की भीख माँगता रहा
हाथ फैलाए ,
राम रहीम गंगा का वतन
वीरान हो गया ।

कदमों के निशान परछाई
मिटाने लगी है ।
अक्स को अंधेरे की साजिश
घेरने लगी है ।
मौका परस्ती मौके में बैठा
वो सियार अब ,
वजूद को मिटाने मीठा विष
घोलने लगी है ।

गैरत के पत्थरो से घायल
मकान हो गया ।
इंसान क्या इंसानियत से
अनजान हो गया ।
उठकर चलता चलकर रुकता
कुछ ना कहता ,
लगता वो बूढ़ा शहर अब
बेजान हो गया ।

"जय कुमार"24/07/14

Tuesday, 22 July 2014

कीचड़ के कमल

कीचड़ के कमल महलो में खिल गये ।
महलों के पुष्य अब कीचड़ से मिल गये ।
बदला रुख हवाओं ने दौर बदल गया ,
माहौल के हिसाब से हंस भी ढल गये ।

मजबूत इरादे भी ईमान के हिल गये ।
खूबसूरत दिखते रास्तो पर चल गये ।
सब ताक में बैठे पेट जेब भरने के लिए ,
बेमानी ना मिली ईमानदार निकल गये ।

"जय कुमार"22/07/14

चल निकल जा

चल निकल जा अब अँधेरों से ,
उजालों को तेरा ही इंतजार है ।
नाकामी की जंजीरो को तोड़ दे ,
कामयाबी को तुझसे ही प्यार है ।
अपने बनाए जाल में फँसा तू ,
दुनिया के छोर बहुत दूर तलक ,
नाव को मोड़ धारा के विपरीत ,
तेरी मंजिल सितारों के उस पार है ।

निगाहों के धोखे से निकल के अब ,
दिल की आवाज भी तु सुन ले ।
जमाने की बातों के डर को छोड़ ,
सिर्फ अपने एहसासों को बुन ले ।
किसी की कथनी करनी ना होती
किसी के मत को बदल ना सकते ,
अंदर शक्ति का समुंदर भरा पड़ा ,
अपनी भूली क्षमताओं को गुन ले ।

किसी भ्रम में ना रहना अब तुम ,
मानव हो तुझे अमर पद पाना है ।
जब तक साँसे चलती तन जीवित ,
तब तक बस यही तेरा ठिकाना है ।
किसी मकसद से यहाँ आये हो तुम
उसको ही दिलेरी से निभाकर के
मिला है एक सफर पूरा कर लो ,
फिर एक नये सफर पर जाना है ।

"जय कुमार"22/07/14

कुछ बोलूँ

कुछ बोलूँ तो बबाल करते हो ।
चुप रहूँ तो सवाल करते हो ।

कुआँ और खाई में फँसाकर हमें ,
जमाने वालों कमाल करते हो ।

फूलों की सौबत में जल गये हो ,
काँटों को क्यों हलाल करते हो ।

ख्वाहिश में था वो परिंद्रा उड़ गया ,
करीब ना उसका मलाल करते हो ।

फरेब खाने की आदत बन गई है ,
भरोसे में अपना क्या हाल करते हो ।

"जय कुमार"

Saturday, 19 July 2014

मझधार में फँसा

मझधार में फँसा तो किनारा भी होगा ।
तिनके का ही सही सहारा भी होगा ।
हौंसला रख कभी ना मान तू हार यार ,
आज नहीं एक दिन तुम्हारा भी होगा ।

चल चुका तो लौटने का सवाल ना कर ।
अपने आप से इतना तू बबाल ना कर ।
गया जो कभी वापिस आता नहीं यहाँ ,
छूट चुका है जो उसका मलाल ना कर ।

चलता रह तू तेरी मंजिल सितारों में है ।
तेरी पहचान तो सात्विक विचारो में है ।
मत हो मायूस खोज जारी रख यार मेरे ,
ढ़ूढ़ता रह तेरा आसियां तो बहारों में है ।

तूफान लौटेगा जरुर इरादे मजबूत रख ।
हवा दिशा बदल देखी इरादे मजबूत रख ।
सर उठाकर तो देख आसमान तेरा होगा ,
पर्वत झुकायेगा सिर इरादे मजबूत रख ।

"जय कुमार" 19/07/14

मेरी मुहब्बत के

मेरी मुहब्बत के छालों को , सरेआम ना करो ।
गुजरी जख्मों पर अरसे तक , बदनाम ना करो ।
मेरे अश्को के जज्वातों से खेलकर दुआ देते ,
मेरी महरुम दुआओं को ऐसे , बेनाम ना करो ।

"जय कुमार"18/07 /14

जब जब दोस्ती

जब जब दोस्ती की बात आई है ।
पीठ के जख्मों पर बहार आई है ।

"जय कुमार" 18/07/14

कर गुजर यहाँ

कर गुजर यहाँ कुछ ऐसा कि तेरा भी नाम आये ।
गुनाहों से कर तौबा ना कर कि नाम हराम आये ।
जिया करते यहाँ सभी पहिये की मगरुर जिंदगी ,
मिट्टी को ही बना तू ऐसा कि किसी के काम आये ।

"जय कुमार"18/07/14

"हाइकू"

\जल झड़ी में
भीगे मोरो अंग रे
आया साँवन

ताल तलैया
सरिता कल कल
करती गान

संगीत सुना
प्रकृति मनमोहे
साँवन संग

हरियाली ने
धरा पर ज्यों पैर
पसारे दूर

वन श्रँगार
कर प्रफुल्लित हो
मोर के संग

हरी चुनरी
ओढ़िके होती धरा
हरि तुल्य रे

मन ललचा
विरहन का अब
प्रीतम आस

कारे बदरा
कारी रातें करती
मन उदास

"जय कुमार"18/07/14

Thursday, 17 July 2014

कदमों की आहट

कदमों की आहट से जो
पहचान लिया करते थे
वो सामने आकर भी
अनजान बनते हैं
कभी साथ रहने के बहाने
ढूड़ा करते थे जो
वो साथ खड़े होकर भी
बेजान बनते हैं
पिछली रुत जो साथ
रहे मेरे हमदम बनके
पत्थर ही उनकी अब
एक पहचान बनते हैं
मंजर ना बदले कुदरत
एक सा सलीखा उसका
रंग तो बदलते जमाने में
जो इंसान बनते हैं

"जय कुमार"17/07/14

कुछ बोलते

कुछ बोलते तो बबाल करते हो ।
चुप रहते तो सवाल करते हो ।
कुआँ और खाई में फँसाकर हमे ,
जमाने वाले क्या कमाल करते हो ।

"जय कुमार"16/07/14

ख्वाव में रोज

ख्वाव में रोज आते दीदार हो जाये ।
किसी अजनबी से ही प्यार हो जाये ।
एक अरसे से दवा नहीं ली कोई मैंने ,
यह मासूम दिल भी बीमार हो जाये ।

किसी की मीठी बातियों में खो जाये ।
किसी की मस्त निगाही में सो जाये ।
केशों की लड़ी चेहरा हो खिला गुलाब ,
एक पुष्प का यह भौंरा भी हो जाये ।


"जय कुमार" 15/07/14

"आँसू"

क्रोध के दहकते आँसू
खुशी के महकते आँसू
पराये दर्द से निकले जो
मोती से चमकते आँसू
गम में बरसते आँसू
आभाव में मुरझाते आँसू
कोई अपना मिले तो
प्यार में खिलते आँसू
बिरह में मचलते आँसू
स्नेहस्पर्श से हँसते आँसू
बनावटी प्रेम सहन ना
स्पर्शखुरदरा सिसकते आँसू

"जय कुमार"15/07/14

दिल के मर्ज

दिल के मर्ज से निकल नहीं पाते ।
वक्त की मार से संभल नहीं पाते ।

उम्मीद जोश भरते रोज दिल में
खड़े होकर भी अब चल नहीं पाते ।

रुक रुक कर चलती नब्ज ए हयात
बच्चों की तरह उछल नहीं पाते ।

तसव्वुर में देखते कुदरत खूबसूरत
नादारी में सफर पर निकल नहीं पाते ।

नजाफत देखने को अब मिलती कहाँ
माँ की कोख में बच्चे पल नही पाते ।

"जय कुमार" 15/07/14

हिज्र में मेरी

हिज्र में मेरी याद के चिराग तूने जलाये होंगे ।
सोते हुए जज्वात वेवक्त तूने जगाये होगे ।

"जय कुमार"14/07/14

मेहनत के हाथ

मेहनत के हाथ पर छाले होंगे
उम्मीद होगी कल उजाले होंगे
चमकते बदन फूल से चेहरे ना
तोड़कर पत्थर हाथ मैले होंगे
गोरे बदन पर तिल काले होंगे
हर मुश्किल के हल पाले होगे
टूटके खुद जो जोड़ते है जमाने
ऐसे इंसान तो दिल वाले होंगे

"जय कुमार"14/07/14

Sunday, 13 July 2014

"हाईकू"

मेघ आते है
जल ना ला पाते
साँवन सूना

धरती पुत्र
आश लगाये बैठा
ना आयीं बूँदे

पहली बर्षा
सौंधी खुशबु कहाँ
सूखी धरा है

साँवन सूना
जंगल सुनसान
झरना सूना

सूना मन है
नयी दुल्हन का भी
साँवन सूना

पपीहा रुठा
ढ़ेर ना लगाये अब
साँवन सूना

अषाढ़ रोया
जल के बिन अब
साँवन सूना

पेड़ के पत्ते
पीले पीले दिखते
साँवन सूना

सरिता रुठी
जलधार कहाँ है
साँवन सूना

खलियान में
कालापन छाया है
साँवन सूना

मेघ कहाँ हो
जल भी तो लाओ
साँवन सूना

जल के बिन
सब सूना सूना है
साँवन सूना

साँवन सूना
हर पावन सूना
साँवन सूना

"जय कुमार"13/07/14

"हाइकू"

गुरु पूर्णिमा
गुरु ही पूरी माँ है
गुरु पूर्णिमा

गुरु बनाना
शिष्य नहीं बनता
कर्तव्य भूला

शिष्य बनना
पहले बाद गुरु
बनाना होगा

गुरु पिता माँ
कठोर व कोमल
भाव समाया

गुरु ज्ञान की
खान गुरु गुन ना
कोई बखान

गुरु शारदे
ज्ञान के वाहक है
शारदे सम

गुरु को हम
निश दिन करते
कोटि नमन

"जय कुमार"12/07/14

शहर के जख्मों

शहर के जख्मों ने बस्ती याद दिला दी ।
वजूद के जख्मों ने हस्ती याद दिला दी ।
चेहरे बहुत देखे हमने जमाने के यारो ,
पीठ के जख्मों ने दोस्ती याद दिला दी ।

"जय कुमार"12/07/14

अपने वादो से

अपने वादो से मुकर गया वो ।
मेरे दिल से ही उतर गया वो ।
जिसे जोड़ता रहा एक जमाने से
टूटा सीसा सा बिखर गया वो ।

"जय कुमार"11/07/14

जब दुआयें

जब दुआयें भी बेअसर होगी
तब वफायें भी बेखबर होगी

जय कुमार 11/07/14

तुम कभी यार

तुम कभी यार बनकर आये ।
कभी तुम प्यार बनकर आये ।
अब जुदा भी हो गये जो तुम ,
तो मेरे इंतजार बनकर आये ।

"जय कुमार"11/07/14

जब बात कोई

जब बात कोई आई तो तुम याद आये ।
जब मैं पड़ा अकेला तो तुम याद आये ।
कल यूँ ही चला गया उस पुराने शहर ,
सवाल किये राहों ने तो तुम याद आये ।

"जय कुमार" 11/07/14

Friday, 11 July 2014

भुनसारे से

भुनसारे से सकारे से सकारे से
काहे उड़ा दई चादरिया चादरियाँ
मोहे बतादे ते बाबर्रिया
काहे उड़ा दई चादरिया

भुनसारे से सकारे से सकारे से . . .

काल तलक तो संगे रओ
दिनभर खूबई बुलयाओ
भुनसारे ऐसों का हो गयो
जल्दई बतादे साँवर्रिया
काहे उड़ा दई चादरिया . . .

भुनसारे से सकारे से सकारे से . . .

दोपहरी में संगे रोटी खाई
बच्चन के संग खेलत रई
अब काहे मो लटकाये बैठो
मोहे सुनादे अब साँवर्रिया
काहे उड़ा दाई चादर्रिया

भुनसारे से सकारे से सकारे से . . .

मोसे कोनऊ गलती हो गई
जा बिटिया काहे को रो रई
सबर बदना टूटत जा रओ
सच्ची बता दे ते साँवरिया
काहे उड़ा दई चादरिया

भुनसारे से सकारे से सकारे से . .

गाँव भर जो काहे जुर रओ
मोरी बातें हर कोऊ कर रओ
ऐसो का अब अंधेर हो गयो
मोहे बता दे ते साँबरिया
काहे उड़ा दई चादरिया

भुनसारे से सकारे से सकारे से . . .

"जय कुमार" 10/07/14

" मुक्तक "

कौनने कई थी कौनने सुन लई ।
कौनसे कई थी कौनने गुन लई ।
उजारे की बतियाँ अंधयारो सुनत
कैंसी कई थी और कैंसी बुन लई ।

"जय कुमार"10/07/14

" मुक्तक "

तजुर्बा जिंदगी का बहुत खूब पाया है हमने ।
प्यार की ठंडी आग से दिल जलाया है हमने ।
रुश्वाई हिज्र वेहयाई देखी इतनी आज तक ,
मुहब्बत के टूटे अरमानों को सुलाया है हमने ।

"जय कुमार"9/7/14

मेरा खुदा

मेरा खुदा इतना बेरहम भी ना था ,
कभी रहम की भीख माँगी ही कहाँ ।

"जय कुमार"9/07/14

"हाइकू"

कर्म धर्म का
खेल खेला जीवन
आत्मा अकेली

पुण्य पाप के
बीज बोते हम जो
पौधे मिलते

बहती नदी
नाव खेना होगा ही
पार पाना जो

मिटे अज्ञान
ज्ञान भास्कर उगे
जो जीवन में

पावक जल
एक होते हो तब
वायु जलती

"जय कुमार"9/07/14

दरिया की दरियादिली

दरिया की दरियादिली देखिए
डूबने पर उछाल दिया
दोस्तों की दोस्ती देखिए
कफन में लिपटाये खाक डाल दिया
मुहब्बत की मेहरबानी देखिए
चेहरे पे नकाब डाल लिया
जमाने की जरुरत देखिए
बदबु ना आये सो इत्र डाल दिया
खुदगर्ज जमाने से आशा क्या करते हो
जय तुमने तो खुद ही अपने
राजों पर पर्दा डाल लिया

"जय कुमार"9/7/14

मुद्दतों बाद

मुद्दतों बाद आज सामने आया वो ,
मुद्दतों बाद चेहरा खुदका देखा मैंने ।

"जय कुमार"9/7/14

" मुक्तक "

पेड़ पौधे जीव जंतु सब बीमार दिखते है ।
पर्यावरण पर अब अत्याचार दिखते है ।
विकास की काली रोशनी ने कालक पोती ,
मानव भूख के आँगे सब लाचार दिखते है ।

"जय कुमार"9/07/14

" मुक्तक "

चलो फिरसे जन्नत की सैर करें ।
किसी जीते हुए जीव की खैर करें ।
कब तक अहं का पोषण करेंगे हम ,
अंदर छुपे बैठे दुर्गुणों से बैर करें ।

"जय कुमार" 9/07/14

" मुक्तक "

कभी बूढ़ा मिले तो झुरियों का मर्म समझ लेना ।
कभी भूखा मिले तो कोड़ियों का कर्म समझ लेना ।
उठे ज्वार मन में तेरा वजूद हो मिटने वाला तब ,
जब मौत मिले तो पोथियों का धर्म समझ लेना ।

"जय कुमार"9/07/14

"हाइकू"

आराम जहा
मेहनत का खात्मा
सफलता ना

चींटी चलके
लंबाई तय कर
संदेश देती

दौड़ने वाले
दूरी कम करते
लक्ष्य ना पाते

सदा चलना
अनन्त तक वो ही
लक्ष्य पाता है

सिर्फ सोचते
प्रयास ना करते
अधूरापन

कदम बढ़ा
दूरी कम हो जाती
मंजिल पास

मेहनत ही
मात्र सफलता का
एक साधन

"जय कुमार" 9/07/14

" मुक्तक "

खाईंयाँ गहरी बनी नजदीकियों के शहर में
चमक दमक की कालक पुत रही शहर में
इंसान का कद छोटा इमारतों का ऊँचा हुआ
दिलों में अँधेरा छाया अब रोशनी के शहर में

"जय कुमार"8/07/14

"हाइकु"

आशा किरण
चीरती अंधेरे को
संबल देती

किसी कोने में
दबी चिंगारी से ही
दहकी आग

स्वर्ण परीक्षा
दहकते अंगारों
में ही होती है

पवन वेग
पेड़ तो हिला देता
पर्वत नहीं

घोर अँधेरे
से मनुज हिलता
साहस नहीं

सूर्य कि चाल
सदैव समान है
तेज बदला

चाँद अथिति
कुछ दिनों का फिर
अँधेरा होता

साहस आशा
प्रेम बंधुत्व होता
जीवन मूल

"जय कुमार" 7/7/14

"हाइकु"

अहसास हो
ह्रदय का स्पंदन
होता प्रेम है

समर्पण हो
ईश्वर के समान
होता प्रेम है

खुशबु जैसा
महकता फिजा में
होता प्रेम है

बहता वह
शाँत जलधार सा
होता प्रेम है

निश्चल नित
पल पल जीता हो
होता प्रेम है

पलता है जो
ह्रदय में ही सदाँ
होता प्रेम है

अमृत बन
जीवन अमर हो
होता प्रेम है

"जय कुमार"06/07/14

" मुक्तक "

चल चुका हूँ लौटना नहीं चाहता ।
उठ चुका हूँ बैठना नहीं चाहता ।
हजारों वक्त के थपेड़े खाये जिंदगी ,
टूट चुका हूँ बिखरना नहीं चाहता ।

"जय कुमार"03/07/14

कभी राह

कभी राह ने साथ ना दिया
कभी मंजिल रुठ गई ।
कभी कदमों ने दम तोड़ दिया
कभी आशा टूट गई ।
बयावान में घिरे अंधेरी रात
बादलों ने डाला डेरा ,
चिरागो की दोस्ती अंधेरे से देख
अब रोशनी भी रुठ गई ।

"जय कुमार" 30/06/14

" मुक्तक "

कस्ती साथ थी साहिल दूर था ।
मेरी किस्मत का दरिया क्रूर था ।
छेदो से दर्द भरता चला जा रहा ,
हिम्मत का हाथ भी मजबूर था ।

"जय कुमार"

" मुक्तक "

खुशी चेहरे की आँखों से बरसने लगी है ।
कलियाँ फिजाओं की अब सिमटने लगी है ।
पिया आने की खबर रोम रोम रोमांचित ,
घरोंदें की हर चीज इत्र सी महकने लगी है ।

"जय कुमार"29/6/14

मुझसे झगड़ा वो

मुझसे झगड़ा वो , मुझे ही दुआयें देता रहा ।
जख्म झूठे वो , सच्ची मुझे दवायें देता रहा ।
हम समझ ना पाये उसको रंज आज भी है ,
छत बना वो सर पर बिपदायें लेता रहा ।

कमवक्त मेरी जह्रनी हालत समझा ना मैं ।
कड़कपन देखता नरमी को समझा ना मैं ।
अहसास कर ना सका उसकी चाहत को ,
सीने के अंदर नरम दिल को समझा ना मैं ।

वक्त निकला मुकम्मल राह अब कैंसे खोजू ।
मुकद्दर के खोये पन्नो को अब कैंसे खोजू ।
राही राह दिखाता रहा सच्ची चला ना मैं ,
भटक गया बयावान में मंजिल कैंसे खोजू ।

टृटकर चाहना चाहता उसके हर दर्द में मैं ।
चलना चाहता अफसाने के हर फर्ज में मैं ।
खुदा मेरी ना सुन उसकी वफाओं की सुन ले
डूबना चाहता हूँ जफाओं के हर कर्ज में मैं ।

"जय कुमार" 29/06/14