वर्ष निकल गया एक और ।
जीवन का घटता जाये छोर ।
सत्य सुबह साँझ ना झूठी ,
चल जा अपने पथ की ओर ।।
जीवन का घटता जाये छोर ।
सत्य सुबह साँझ ना झूठी ,
चल जा अपने पथ की ओर ।।
तम छाये जब चारों ओर ।
रुठा मन निराशा हो घोर ।
इक सत्य दीप जला लेना ,
हार रजनी लायेगी भोर ।।
रुठा मन निराशा हो घोर ।
इक सत्य दीप जला लेना ,
हार रजनी लायेगी भोर ।।
अंर्न्तमन पर रखना जोर ।
नाचेगा तब ह्रदय में मोर ।
आये नये पलों का स्वागत ,
पिछले से ना तू मुह मोड़ ।।
नाचेगा तब ह्रदय में मोर ।
आये नये पलों का स्वागत ,
पिछले से ना तू मुह मोड़ ।।
"जय कुमार"31/12`/14
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