Thursday, 10 November 2016

मेरी पीड़ा

गांव कि गलियां , भुला न   पाये |
शहर से  नजरे ,  लड़ा  न  पाये ||

सुलह करते है  , रोज रोज हम |
दिन को रात से , मिला  न पाये ||

खुशबू   अपनेपन   की   हममें |
कागजी  फूल , खिला  न  पाये ||

खरे  सोने  से  ,  मिलते   रहते |
खोटे   सिक्के ,  चला  न  पाये ||

निकल   गये   राहों  पर   ऐंसी |
गांव कि गोद में , सुला न  पाये ||

चकाचौंद  की  , गली  में  भूले |
अम्मा कि रोटी, खिला न पाये ||

जबसे छोड़कर , आये कुटिया |
सुकूं को खुदसे , मिला न पाये ||

"जय कुमार "

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