मजहब ने बाँट रखा है साहब
लहू का तो रंग एक जैसा है
लकीरों ने बाँट रखा है साहब
हवा पानी संग एक जैसा है
चमडी ने बाँट रखा है साहब
प्रत्येक तो अंग एक जैसा है
भाषा ने बाँट रखा है साहब
भाव का भंग तो एक जैसा है
पैसों ने बाँट रखा है साहब
मौत का तंग तो एक जैसा है
"जय कुमार "
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