गीत गजलों की भाषा हूँ
दर्द मजलूम का गाता हूँ
सूख गये आंखों से आंसू
उनका मैं मर्ज सुनाता हूँ
बना बिछोना धरती जिनका
बीच में उनके पाता हूँ
गीत शहनाई के न आते
मजबूरी मन की सुनाता हूँ
घोर निराशा के अंधेरों में
इक आशा दीप जलाता हूँ
जिन्हे जमाने ने धुतकारा
मैं गले उन्हे लगाता हूँ
लहू बहा वतन पर जिनका
उनको मैं शीश झुकाता हूँ
कदम मिलाकर चलने में ही
मैं जय विश्वास जताता हूँ
"जय कुमार
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