Wednesday, 7 September 2022

मूल मे

मूल  में   मैंने  प्यार  किया  था,  ब्याज  भरती  रहीं  उम्र  भर आंखे ।
कुछ पलों का मिलन ही हुआ था, इंतजार करती रही उम्र भर आंखे ।।

तेरा आना यूं  बहकते हुए मेरा दिल भी  मचल कर उछलने लगा ।
संभाला बहुत संभल  न सका तेरी  बातों से ये मन बहकने लगा ।
सूरत सुहानी इक तेरी लगी, मुझसे  झगड़ती  रहीं  उम्र भर आंखें ।।


कुछ तेरे दिल में कुछ मेरे दिल में अहसासों की अंगड़ाई चली ।
खडे थे  दोनों ही  यौवन के द्वारे मधुमास में जैसे पुरवाई चली ।
दिलों की कहानी वक्त ने लिखी ,  दरिया बहाती  रहीं उम्र भर आंखे ।।

दुनिया के चलन पर चल न सके, इक दूजे से हम कभी मिल न सके ।
समय की चाल कुछ ऐसी चली, शाखों पर कभी  फूल खिल न सके ।
जाने के बाद भी पलके खुली थी, तुझको  बुलाती  रहीं  उम्र भर आंखे ।।

"जय कुमार"





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