Wednesday, 18 December 2024

जमाने   पुराने   हम   भुला   न  पाये
बिछड़े  हुओं  को  फिर  मिला न पाये 

सोते  थे सर रख कर  उसकी  गोद में
वैसा कभी खुद को फिर सुला न पाये 

छोड़  गया  हर  मौसम  को वह तन्हा 
वफ़ा का हम ज़िन्दगी  सिला  न पाये 

जला  गया  हर ख्वाब  को  मेरे  कोई 
जिसके  लिए ज़हन में  गिला न  पाये

दिल को कचोटता  रहा  जो  हर  दिन
बेहयाई पे जिसकी अश्क बहा न पाये

रक़ीब  से मिलकर  साजिशें करते रहे
ख़िलाफ़त में उनके जुवां हिला न पाये 

 "जय कुमार "

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