जमाने पुराने हम भुला न पाये
बिछड़े हुओं को फिर मिला न पाये
सोते थे सर रख कर उसकी गोद में
वैसा कभी खुद को फिर सुला न पाये
छोड़ गया हर मौसम को वह तन्हा
वफ़ा का हम ज़िन्दगी सिला न पाये
जला गया हर ख्वाब को मेरे कोई
जिसके लिए ज़हन में गिला न पाये
दिल को कचोटता रहा जो हर दिन
बेहयाई पे जिसकी अश्क बहा न पाये
रक़ीब से मिलकर साजिशें करते रहे
ख़िलाफ़त में उनके जुवां हिला न पाये
"जय कुमार "
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