झूठों को झूठ ही मन भाये
स्वार्थ सधता हो जिससे भी
उसके ही जग गीत गुनगुनाये
गिरगिट की तरह बदलते रूप
बाहर उजले अंदर से कुरूप
मक्कारी का लगे मीठा मीठा
मेहनत करने में लागे धूप
कचरा कर्कट मन में भरके
चापलूसी का सेहरा रखके
बनते फिरते वो ठेकेदार
ज़मीर को चरणों में धरके
"जय कुमार "
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