Sunday, 8 January 2017

कभी सोचा नहीं कितने सगे होगे।
जिनके हाथों से  ज़ख़्म  लगे होगे।।

मेरे  दामन  को   लहुलुहान  किया ,
उनके दामन पर भी दाग लगे होगे |

सोया  नहीं  इबादत  की  रात थी ,
सोये खुदा  शायद  अब  जगे होगे ।

गया  जो आया न  लौटकर  कभी ,
सच फरमाया जन्नत  में मजे होगे ।

वेवक्त  सोया  कफन  नसीब  नहीं ,
मुफलिसी के मर्ज  फिर  सजे होगे ।

तूफान  आया उड़  गई तेरी हस्ती ,
उँगली उठाने वाले  भी  सगे  होगे ।

अँधेरों में रहा शहनाई सुन अपनी ,
सोचता गैर के घर  बाजे बजे होगे ।

"जय कुमार"

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