कभी सोचा नहीं कितने सगे होगे।
जिनके हाथों से ज़ख़्म लगे होगे।।
मेरे दामन को लहुलुहान किया ,
उनके दामन पर भी दाग लगे होगे |
सोया नहीं इबादत की रात थी ,
सोये खुदा शायद अब जगे होगे ।
गया जो आया न लौटकर कभी ,
सच फरमाया जन्नत में मजे होगे ।
वेवक्त सोया कफन नसीब नहीं ,
मुफलिसी के मर्ज फिर सजे होगे ।
तूफान आया उड़ गई तेरी हस्ती ,
उँगली उठाने वाले भी सगे होगे ।
अँधेरों में रहा शहनाई सुन अपनी ,
सोचता गैर के घर बाजे बजे होगे ।
"जय कुमार"
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