इक परिन्दे का दर्द भरा फसाना था
कटे थे पंख दूर तलक उड़ जाना था
आंधी के साथ बारिष घनघोर आई
बच्चे थे छोटे घौंसला पुराना था
सैय्याद की नजर थी बेदर्द जमाना था
कंधे झुक चुके थे बोझ तो उठाना था
भूख रोज लगती प्रकृति प्रतिकूल हुई
पेट में लगी आग घर में न दाना था
जिंदगी के कहर में फर्ज निभाना था
अपनों के लिए जीवन को खपाना था
टहनियों का साथ तेज हवा के झोके
जड़े उखड़ने लगी पेड़ भी पुराना था
जय कुमार
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