Tuesday, 24 January 2017

इक परिन्दे  का  दर्द  भरा  फसाना था
कटे थे पंख दूर तलक  उड़  जाना था
आंधी के  साथ  बारिष  घनघोर आई
बच्चे   थे  छोटे   घौंसला   पुराना  था

सैय्याद की नजर थी बेदर्द जमाना था
कंधे झुक चुके थे बोझ  तो उठाना था
भूख रोज लगती प्रकृति प्रतिकूल हुई
पेट में   लगी  आग घर  में न दाना था

जिंदगी  के  कहर  में फर्ज निभाना था
अपनों के  लिए जीवन को खपाना था
टहनियों  का साथ तेज  हवा के झोके
जड़े  उखड़ने लगी पेड़ भी पुराना था

जय कुमार

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