Monday, 20 February 2017

तन्हा  अकेला   घूमता  हूँ  में  तेरे  शहर  में |
सहारा जीने का ढूँड  लेता हूं  तेरे  कहर  में ||

वक्त की मार है  या मेरा  कल  सामने  आया ,
टूटता जा  रहा हूँ दोस्त मैं हर इक  पहर  में |

जमाना हंसकर कहने लगा  दीवाना मुझको ,
मुहब्बत दिखती है मुझको क्यों तेरे जहर में |

पथराई नजरों का  कहर  झेल रहा  हूं दोस्त ,
नाम मेरा जबसे उछाल दिया है तूने शहर में |

दिल के  जज्वात आज भी हरे भरे बाग बने है ,
गिरा  लिया  हो  चाहे अब  तूने मेरी  नजर में |

सीख लिया है  हमने  जज्वातों  को समझाना ,
यादे ही काफी है जय इस जिंदगी के सफर में ||

  "जय कुमार"

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