तन्हा अकेला घूमता हूँ में तेरे शहर में |
सहारा जीने का ढूँड लेता हूं तेरे कहर में ||
वक्त की मार है या मेरा कल सामने आया ,
टूटता जा रहा हूँ दोस्त मैं हर इक पहर में |
जमाना हंसकर कहने लगा दीवाना मुझको ,
मुहब्बत दिखती है मुझको क्यों तेरे जहर में |
पथराई नजरों का कहर झेल रहा हूं दोस्त ,
नाम मेरा जबसे उछाल दिया है तूने शहर में |
दिल के जज्वात आज भी हरे भरे बाग बने है ,
गिरा लिया हो चाहे अब तूने मेरी नजर में |
सीख लिया है हमने जज्वातों को समझाना ,
यादे ही काफी है जय इस जिंदगी के सफर में ||
"जय कुमार"
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