Saturday, 20 May 2017

किसी  राह में  मेरा भी  इक  घर  हो !
साथ  हो  तेरा  खूबसूरत  सफर  हो !!

मुकम्मल  हो   कैंसे   दुनिया  हमारी ,
परिन्द्रो को जब  सैय्याद का  डर हो !

जालिमों ने  लूटा  हो  दाना  पेट  का ,
सिर पर हो  आसमां कैंसे  बसर  हो !

जर्रे जर्रे  में  रब  का  नूर  दिखता  है ,
इंसां   गर   तेरी    पाक    नजर   हो !

खुदगर्जी की आग में  झुलझता रहा ,
इस जहां में  भी  इक  प्रेम  नगर  हो !

भरोसा किस  पे  करें  खुदगर्ज  जहां ,
राज  छुपाये  रखो राजदाँ  अगर  हो !

चल सके सुकूं से ईमान कि राह जय ,
जमाने  में  बता  गर  कोई  डगर  हो !!

"जय कुमार"

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