किसी राह में मेरा भी इक घर हो !
साथ हो तेरा खूबसूरत सफर हो !!
मुकम्मल हो कैंसे दुनिया हमारी ,
परिन्द्रो को जब सैय्याद का डर हो !
जालिमों ने लूटा हो दाना पेट का ,
सिर पर हो आसमां कैंसे बसर हो !
जर्रे जर्रे में रब का नूर दिखता है ,
इंसां गर तेरी पाक नजर हो !
खुदगर्जी की आग में झुलझता रहा ,
इस जहां में भी इक प्रेम नगर हो !
भरोसा किस पे करें खुदगर्ज जहां ,
राज छुपाये रखो राजदाँ अगर हो !
चल सके सुकूं से ईमान कि राह जय ,
जमाने में बता गर कोई डगर हो !!
"जय कुमार"
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