साँझ ना देखी जिसने
वो भोर को क्या जाने
पतझड़ ना देखा जिसने
वो बसंत को कैंसे माने
सुख दुख की छाँव धूप
रात दिन का जोड़ा खूब
श्याम श्वेत के रंग निराले
जो जीवन के रंग ना जाने
वो जीवन को कैंसे माने
अंधेरो की राह जब तक
रोशनी की महफिल तब तक
कुछ अच्छा कुछ बुरा यहाँ
जो असत्य को ना पहचाने
वो सत्य को कैसे माने
ऊपर नीचे धरती आकाश
आंगे पीछे और दूर पास
ज्ञान अज्ञान साथ रहते
अपनी अपनी भाषा कहते
जिसे निशा का आभाष नहीँ
वह दिन को कैंसे माने
"जय कुमार"
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