मुहब्बत का कोई अब सिला नहीं रहा
ऐसे गुजरते हैं अनजान बनकर रोज
क्या मेरी सांसों में कभी घुला नहीं रहा
जिस्म दिल का क्या, रूह में बसा रखा है
चाहत के बाग में बबूल उगा नहीं रहा
पागल कहते हैं वो महफिल में आजकल
क्या दूध में जहर तू अब मिला नहीं रहा
आज ही तो कफन के साये में आया हूं
आवाज तो दे, सोता है जय तू जगा नहीं
"जय कुमार "16/11/21
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