रात निकल जाती है , ख्वाहिशों में मचलाते हुए ।
दिन निकल जाता है , नाकामी पर झुंझलाते हुए ।
खुशी की चाह में यार , रंज का मेला मिलता रहा ,
उम्र निकल जाती है , पहेलियों को सुलझाते हुए ।।
दिन निकल जाता है , नाकामी पर झुंझलाते हुए ।
खुशी की चाह में यार , रंज का मेला मिलता रहा ,
उम्र निकल जाती है , पहेलियों को सुलझाते हुए ।।
"जय कुमार"15/07/15
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