कश्मीर सुलग रहा है फिरसे , आग लगी है घाटी में
खून की होली खिल रही है , कुन्डलवन की माटी में
लाल चौक से भाले चलते , ,,,हिंदुस्तान की छाती में
कहीं भूल तो बडी हुई है ,,,,,,,,,,,घाटी की परिपाटी में
कुर्सी दिल्ली की चुप रहती ,,, घाटी में नाग पलते हैं
दूध हमारा पी पी कर के ,, घाटी में जहर उगलते हैं
आतंकियों के समर्थन में ,,,,,,,,, घाटी में नारे लगते हैं
फूलों के बागों में आकर ,,,,,,,, कुकुरमुत्ता से बढ़ते हैं
नमन हमारा उस सेना को ,,,,,,, खडी हुई है घाटी में
छांट छांट कर गोली मारती ,,,, आतंकी की छाती में
कोई रंग रंग नहीं रहा ,,,,,,,,,,,,,,, रंग रंगीला खाकी में
गद्दारों के मंसूबों को ,,,,,,,,,,,,,,,,,, मिला रहा है माटी में
"जय कुमार" 13/07/16
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