जमे हिम के हिमालय को, पिगलना भी आता है जाम ए गम पीकर के, संभलना भी आता है कायर मत समझ लेना , मेरी इस खामोसी को नम्र होकर झुके सिर को, अकड़ना भी आता है
"जय कुमार "
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