Saturday, 29 September 2018

आदमी  जमीर से आज गुमनाम दिखता है
नादान  क्यों  पाती  तू   बेनाम  लिखता  है

कोठियां,  कारे,   ऐशो    आराम    है   तेरा
कार्यालयों  में  कोढियों  के दाम बिकता है

"जय कुमार"

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