आदमी जमीर से आज गुमनाम दिखता है नादान क्यों पाती तू बेनाम लिखता है
कोठियां, कारे, ऐशो आराम है तेरा कार्यालयों में कोढियों के दाम बिकता है
"जय कुमार"
No comments:
Post a Comment